मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

कोई शिकायत नहीं 2014 से

अब जिन्हें हो उनकी वे जानें पर मुझे जाते हुए साल (2014) से कोई 'शिकायत' नहीं। शिकायत अगर होगी भी तो उसमें साल बिचारा क्या कर लेगा? न मेरी शिकायत में 'हथेली' लगा लेगा न फार्मूला लगाकर 'सॉल्व' कर देगा। मेरी शिकायत का निपटारा मुझे ही करना होगा पियारे। अपनी शिकायत का लोड खामखां साल के मथ्थे क्यों डालूं?

लोग बाग फिर भी नहीं मानते अपनी शिकायत का गुबार साल को गरियाकर निकालते हैं। वाह! गलतियां तुम करो और जब न संभाल पाओ तो साल को बुरा-भला कहने लगो। यह कौन-सी और कहां की 'अक्लमंदी' है पियारे। साल तो हमें चांस देता है- हर दिन, हर पल, हर मूममेंट को भरपूर जीने का। अब हम ही न जी पाएं तो इसमें भला साल की क्या गलती?

इसीलिए अपने लेबल से जित्ता हो सकता था मैंने साल 2014 को 'भरपूर जिया'। घर-परिवार के साथ जिया। समाज के साथ जिया। लेखन के साथ जिया। हंसी-ठहाकों-व्यंग्य के साथ जिया। हॉलीवुड-बॉलीवुड की सुंदरमत सुंदरियों को देखकर जिया। सोशल नेटवर्किंग के प्लेटफार्म पर जिया। यारों-दोस्तों, असहमति-आलोचना रखने वालों के साथ जिया। कभी रायता फैलाकर तो कभी रायता सिमेटकर जिया। कभी अपनी बेटियों के साथ मुस्कुराकर जिया। अपने में 'महानता' का नहीं 'साधारण व्यक्ति' का विश्वास रखकर जिया। साल को रचनात्मकता के साथ जीना ही तो जिंदगी है पियारे। नहीं तो अपनी-अपनी जिंदगियां हम यों भी जीते ही रहते हैं।

साल 2014 में बनी हवाबाजियों और किस्म-किस्म के बेतुके विरोधों को मैंने 'एंजॉय' ही किया। एंजॉय करते रहने से दिमाग पर लोड कम पड़ता है न। देखिए, ईमानदारी पर कैसी-कैसी ऊंची हवाएं बांधी थीं केजरीवालजी ने मगर जनता ने उनका ही बोरिया-बिस्तरा समेट दिया। काला धन के बहाने अच्छे दिन लाने वाली सरकार फिलहाल अभी तलक तो 'काले' का 'क' भी न ला सकी है। हां, तीर-तुक्के खूब पेल के छोड़े जा रहे हैं। घर वापसी पर तरह-तरह के नाटकनुमा विवाद कायम हैं।

और, साल के खत्म होते-होते मनोरंजन में मसाला इत्ता बढ़ा दिया गया कि पीके 'अड़ियल किस्म' के विवादों में आकर घिर गई। लोगों ने फिल्म को फिल्म की तरह न लेकर 'धर्म की तौहिन' के तहत ले लिया। बहस का केंद्र बिचारा 'ट्रांजिस्टर' नहीं, अब 'धर्म' है। कमाल है पियारे कमाल। भांति-भांति के भक्त भांति-भांति के करतब करने पर उतारू हैं।

पर मुझे क्या, मैं तो लल्ला बनकर सबकुछ को एंजॉय कर रहा हूं। किसी से किसी तरह की कोई शिकायत न किए हुए। क्योंकि यह समय और जमाना अब शिकायत वाला रहा ही नहीं! जरा देर में तो यहां चक्कू-भाले निकल आते हैं। तो पियारे जो चल रहा है, उसे चलते रहने दो क्योंकि समय सबकी 'हिस्ट्री' लिख रहा है।

फिलहाल, जाते हुए साल 2014 को 'हंसकर अलविदा' बोलो और नए साल 2015 का 'खुलकर स्वागत' करो। हां, उम्मीद बनाए रखो कि बिगड़ी चीजें एक दिन जरूर सुधरेंगी।

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