बुधवार, 31 दिसंबर 2014

नए साल के संकल्प

नए साल के पहले दिन लोग तरह-तरह के 'संकल्प' लेते हैं। कोई सिगरेट-शराब त्यागने का संकल्प लेता है। कोई दूसरे की बीवी पर शरारती निगाहें न डालने का संकल्प लेता है। कोई अच्छा एवं नेक इंसान बनने का संकल्प लेता है। कोई रिश्वत न मांगने और भ्रष्टाचार न फैलाने का संकल्प लेता है। कोई विवादों में न पड़ केवल रचनात्मक लेखन करने का संकल्प लेता है। कोई स्मार्टफोन की बैट्री या चर्जर बदलने का संकल्प लेता है। कोई फेसबुक, टि्वटर पर गंदी बातें न करने का संकल्प लेता है। कोई चाय की जगह ग्रीन-टी पीने का संकल्प लेता है। आदि-आदि।

मतलब, जित्ती तरह के लोग उत्ती तरह के उनके संकल्प। हालांकि- अपवादों को छोड़कर- नए साल पर लिए गए संकल्प महीने का अंत आते-आते 'धूल खाते' नजर आते हैं। क्योंकि संकल्पों को त्यागना हमारा 'पुश्तैनी अधिकार' जो है। और, संकल्प लेने में न पैसे लगते हैं न ही टैक्स देना पड़ता है। इसीलिए तो नए साल का सबको इंतजार रहता है।

अब 'देखा-देखी' कह लें या फिर 'फैशन का हिस्सा' नए साल पर मैंने भी 'मात्र तीन' संकल्प (!) ले ही लिए हैं।

मेरे संकल्प ये हैं-

संकल्प नं. वन- छिपकली एवं कॉकरोच प्रजाति से न डरूंगा।

मुझे लाइफ में सबसे अधिक डर छिपकली और कॉकरोच से ही लगता है। घर-बाहर उनके एहसास भर से मेरे 'रोंटे' खड़े हो जाते हैं। फिर न मैं सही से कुछ खा पाता हूं, न पहन पाता हूं, न लिख पाता हूं, न सो पाता हूं, न हवा-पानी को जा पाता हूं। हर वक्त यही डर दिल में बैठा रहता है कि कोई छिपकली या कॉकरोच कहीं से न निकल आए और मुझे 'नुकसान' न पहुंचा दे। इसीलिए मैं अपने कने हर समय फरस्ट-एड बॉक्स रखता हूं। इस डर की वजह से एकाध बार तो मैं 'डिप्रेशन' में भी जा चुका हूं।

लेकिन अब बहुत हुआ। डर की भी एक सीमा होती है पियारे। वो धोनी महाराज ने कित्ता उचित कहा है कि डर के आगे जीत है। इसीलिए नए साल पर मैं संकल्प लेता हूं- चाहे जित्ता ही नुकसान क्यों न हो जाए- छिपकली और कॉकरोच से नहीं डरूंगा। न उन पर 'हिट' की बौछार करूंगा, न 'लक्ष्मण-रेखा' खीचूंगा, न कहीं 'मोरपंखी' रखूंगा। अगर नजर आए तो सीधा हाथों से पकड़कर बोतल में बंद कर दूंगा। फिर पूछूंगा- बताओ, पाटनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? बात-बेबात मुझे डराते थे, अब बोतल में बंद रहकर खुद डरो।

संकल्प नं. दो- चिंताप्रधान लोगों से दूर रहूंगा।

मुझे हर वक्त की चिंता करने वालों से बड़ी 'एलर्जी' है। खास बात यह है कि वे अपनी चिंता बहुत कम दूसरे (मतलब पड़ोसी) की चिंता अधिक किया करते हैं। जित्ता बेफिकर वे अपनी निजी एवं पारिवारिक जिंदगी में कुछ न जानने के लिए रहते हैं, उससे कहीं बेकरार दूसरी की जानने में रहते हैं। दखलअंदाजी यों करते हैं मानों वे दूसरे के 'गॉडफादर' हों।

इसीलिए मैं संकल्प लेता हूं- ऐसे सियाने चिंताप्रधान लोगों से नए साल से 'उचित दूरी' बनाकर रहूंगा। न अपनी चिंता उन्हें बताऊंगा, न ही उनकी चिंता का सबब जानूंगा। अपने में ही 'मस्त' रहना, मुझे खुद की सबसे बड़ी आजादी लगती है।

तीसरा और अंतिम संकल्प- घर वापसी करूंगा।

न न चौंकिए नहीं। मैं वो (धर्म वाली) घर वापसी की बात नहीं बल्कि 'राजनीतिक' घर वापसी की बात कर रहा हूं। अमां, बहुत अरसा हो गया पन्ने रंगते-रंगते। अब थोड़ा राजनीति करके भी देख ली जाए। आखिर जनसेवा के बहाने निजसेवा करने में क्या हर्ज है! सब कर रहे हैं।

अतः मैं संकल्प लेता हूं कि मैं घर वापसी उसी पार्टी में करूंगा जिसका सिक्का आजकल सबसे अधिक मजबूत है। हो सकता है, इस बहाने मेरी लाइफ भी बन जाए, जैसे अन्य नेताओं-मंत्रियों-विधायकों की बनी है। राजनीति में जाने में हर्ज ही क्या है? लेखक भी भला राजनीति से कौन-सा अलग हैं? नेता जनता की राजनीति कर रहा है और लेखक लेखन की।

नए साल पर मैंने ये तीन संकल्प ले तो लिए हैं। अब आप भी दुआ कीजिए कि मैं लिए गए संकल्पों पर 'खरा' उतरूं। संकल्प कहीं 'फैशन' बनकर ही न रह जाएं। बाकी तो जो है सो है ही पियारे।

मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

कोई शिकायत नहीं 2014 से

अब जिन्हें हो उनकी वे जानें पर मुझे जाते हुए साल (2014) से कोई 'शिकायत' नहीं। शिकायत अगर होगी भी तो उसमें साल बिचारा क्या कर लेगा? न मेरी शिकायत में 'हथेली' लगा लेगा न फार्मूला लगाकर 'सॉल्व' कर देगा। मेरी शिकायत का निपटारा मुझे ही करना होगा पियारे। अपनी शिकायत का लोड खामखां साल के मथ्थे क्यों डालूं?

लोग बाग फिर भी नहीं मानते अपनी शिकायत का गुबार साल को गरियाकर निकालते हैं। वाह! गलतियां तुम करो और जब न संभाल पाओ तो साल को बुरा-भला कहने लगो। यह कौन-सी और कहां की 'अक्लमंदी' है पियारे। साल तो हमें चांस देता है- हर दिन, हर पल, हर मूममेंट को भरपूर जीने का। अब हम ही न जी पाएं तो इसमें भला साल की क्या गलती?

इसीलिए अपने लेबल से जित्ता हो सकता था मैंने साल 2014 को 'भरपूर जिया'। घर-परिवार के साथ जिया। समाज के साथ जिया। लेखन के साथ जिया। हंसी-ठहाकों-व्यंग्य के साथ जिया। हॉलीवुड-बॉलीवुड की सुंदरमत सुंदरियों को देखकर जिया। सोशल नेटवर्किंग के प्लेटफार्म पर जिया। यारों-दोस्तों, असहमति-आलोचना रखने वालों के साथ जिया। कभी रायता फैलाकर तो कभी रायता सिमेटकर जिया। कभी अपनी बेटियों के साथ मुस्कुराकर जिया। अपने में 'महानता' का नहीं 'साधारण व्यक्ति' का विश्वास रखकर जिया। साल को रचनात्मकता के साथ जीना ही तो जिंदगी है पियारे। नहीं तो अपनी-अपनी जिंदगियां हम यों भी जीते ही रहते हैं।

साल 2014 में बनी हवाबाजियों और किस्म-किस्म के बेतुके विरोधों को मैंने 'एंजॉय' ही किया। एंजॉय करते रहने से दिमाग पर लोड कम पड़ता है न। देखिए, ईमानदारी पर कैसी-कैसी ऊंची हवाएं बांधी थीं केजरीवालजी ने मगर जनता ने उनका ही बोरिया-बिस्तरा समेट दिया। काला धन के बहाने अच्छे दिन लाने वाली सरकार फिलहाल अभी तलक तो 'काले' का 'क' भी न ला सकी है। हां, तीर-तुक्के खूब पेल के छोड़े जा रहे हैं। घर वापसी पर तरह-तरह के नाटकनुमा विवाद कायम हैं।

और, साल के खत्म होते-होते मनोरंजन में मसाला इत्ता बढ़ा दिया गया कि पीके 'अड़ियल किस्म' के विवादों में आकर घिर गई। लोगों ने फिल्म को फिल्म की तरह न लेकर 'धर्म की तौहिन' के तहत ले लिया। बहस का केंद्र बिचारा 'ट्रांजिस्टर' नहीं, अब 'धर्म' है। कमाल है पियारे कमाल। भांति-भांति के भक्त भांति-भांति के करतब करने पर उतारू हैं।

पर मुझे क्या, मैं तो लल्ला बनकर सबकुछ को एंजॉय कर रहा हूं। किसी से किसी तरह की कोई शिकायत न किए हुए। क्योंकि यह समय और जमाना अब शिकायत वाला रहा ही नहीं! जरा देर में तो यहां चक्कू-भाले निकल आते हैं। तो पियारे जो चल रहा है, उसे चलते रहने दो क्योंकि समय सबकी 'हिस्ट्री' लिख रहा है।

फिलहाल, जाते हुए साल 2014 को 'हंसकर अलविदा' बोलो और नए साल 2015 का 'खुलकर स्वागत' करो। हां, उम्मीद बनाए रखो कि बिगड़ी चीजें एक दिन जरूर सुधरेंगी।

रविवार, 28 दिसंबर 2014

कंबल बनाम रजाई

ठंड में कंबल मुझे रजाई से अधिक 'सुख' देता है। कंबल में गर्मी का एहसास रजाई से 'दोगना' होता है। कंबल 'सर्वहारा' की निशानी है जबकि रजाई 'प्रगतिशीलता' की प्रतीक। कंबल का वजन रजाई के मुकाबले कम पर सहने लायक होता है। कंबल के साथ धोने-निचोड़ने की 'सुविधा' रहती है जबकि रजाई को सिर्फ 'धुना' जा सकता है, धोया नहीं। खास बात, कंबल- चाहे हल्की ठंड हो या हाड़तोड़- तापमान के अनुरूप 'मस्त मजा' देता है जबकि रजाई का ज्यादातर उपयोग हाड़तोड़ ठंड में ही किया जाता है। कंबल को तीन-चार तहों में सिमेट कर आसानी से पलंग के भीतर सरकाया जा सकता है मगर रजाई हाथी के आकार सी जगह लेती है। इसीलिए परिवारों में अब रजाई के मुकाबले कंबल की 'डिमांड' तेजी से बढ़ी है। बाजार भी अब कंबल की तरफ 'आकर्षित' हो रहा है।

किंतु व्यंग्य-लेखन में कंबल को अभी उत्ती जगह नहीं मिली पाई है, जित्ती की रजाई को। ठंड में ज्यादातर व्यंग्यकारों को रजाई की तो याद रहती है मगर कंबल को भुला देते हैं। कंबल पर व्यंग्य लिखना तो छोड़िए, अपने फेसबुक स्टेटस पर भी उसका जिक्र नहीं करते। रजाई में चिंतन, रजाई की जरूरत, सर्दी और रजाई, रजाई में मस्तियां टाइप तो लिखते रहते हैं मगर कंबल को 'उपेक्षित' रख छोड़ देते हैं। जबकि- मेरा दावा है- रजाई से कहीं ज्यादा बेहतरीन चिंतन कंबल में बैठकर किया जा सकता है। पर क्या कीजिएगा, लेखक का मन है, कब, कहां, किस पर डोल जाए!

जो हो- पर न मेरी निगाह न मेरे लेखन में- कंबल कभी 'उपेक्षित' नहीं रहा। कंबल की गर्महाट को मैंने व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक जीवन में बरकरार रखा है। सच कहूं, ठंड में मेरा ज्यादातर लेखन और चिंतन कंबल की 'गुलाबी गर्माहट' में से ही निकलता है। चाहे पारा माइनस में ही क्यों न पहुंच जाए या चाहे कोहरा कित्ता ही अपनी आगोश में क्यों न ले ले पर मेरे कंबल के आगे सब 'फेल' हैं। एक दफा कंबल में घुस जाओ फिर ठंड तो क्या ठंड का बाप भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। कंबल ठंड को ऐसे 'पछाड़' लगाता है जैसे- बाजार यथास्थितिवादियों की।

रजाई चूंकि 'प्रगतिशीलता' की प्रतीक है इसीलिए ज्यादातर प्रगतिशील लोग ही उसमें बैठकर 'चिंतन' किया करते हैं। यही वजह है, जाड़ों में उनका चिंतन और लेखन ज्यादा भारी और अपच-सा हो जाता है। दरअसल, लिखते वक्त अपनी विचाराधारा के साथ-साथ रजाई का वजन भी वे अपने दिमाग पर ओढ़ लेते हैं। अब ठंड में इत्ता भारी-भरकम लेख लिखेंगे तो पियारे ऐसा कैसे चलेगा? ठंड में दिमाग, शरीर, चिंतन और लेखन जित्ता 'हल्का' रहे उत्ता ही भला।

मगर कंबल के साथ ऐसा कोई रगड़ा नहीं है। कंबल के भीतर बैठकर आराम से जित्ता चाहे उत्ता हल्का-फुलका चिंतन एवं लेखन कीजिए- मजा आएगा। कंबल किसी किस्म का न कोई बोझ देता है न लेता। इसीलिए तो रैन-बसेरों से लेकर गरीब-मजदूरों तक के घरों में कंबल ही अधिक पाए जाते हैं। सरकार भी, ठंड में, गरीबों-बेसहारों को- कैमरों के आगे- कंबल ही तो बांटती-बंटवाती है। कथित समाजसेवक भी कंबल बांटकर ही अपनी समाजसेवा के वजन को बढ़ाते हैं।

कवियों-कहानीकारों की जाने दीजिए पर व्यंग्यकारों को कंबल पर 'उचित फोकस' करना चाहिए। लिखें रजाई पर भी लिखें पर कंबल के असर को भी साथ लेकर चलें। कंबल में बैठकर रजाई की तारीफ करना, कंबल के प्रति 'सौतेला' व्यवहार सा लगता है। सोचिए, अगर कंबल न होते तो आज पूरी कायनात ही ठंड में सिमटी-सिकुड़ी बैठी होती। रजाई में गर्माहट की अपनी सीमाएं हैं पियारे।

इस कड़कड़ाती व कोहरायुक्त ठंड में मेरा व्यंग्य लेखन कंबल को ही 'समर्पित' है। यह कंबल की गर्माहट का ही असर है, जो इत्ती ठंड में भी मेरे लेखन में गर्माहट बनी हुई है। बाकी तो जो है सो है ही। क्यों पियारे...।

मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

खुदा बचाए वरिष्ठों की सोहबत से

मेरे मोहल्ले में एक से बढ़कर एक वरिष्ठ (प्रगतिशील) हैं। सभी की आपस में खूब यारी है। लगभग हर रोज मोहल्ले के नुक्कड़ पर वरिष्ठों (प्रगतिशील) की मीटिंग जुड़ा करती है। मीटिंग में आपस में न कोई हंसता है न मुस्कुराता। हर किसी के चेहरे पर 'गंभीरता' का गहरा भाव ही विराजमान रहता है। मानो, अभी-अभी किसी मुरदे को शमशान का रास्ता दिखाकर आए हों।

खैर, मीटिंग में 'साहित्यिक' चर्चाएं न के बराबर पर 'राजनीतिक' चर्चाएं खूब होती हैं। खासकर, वर्तमान सरकार पर। यों भी, वर्तमान सरकार और प्रधानमंत्री से उनका 'साढ़े छत्तीस' का आंकड़ा है। इसीलिए वे चर्चा में ऐसा कोई अवसर अपने हाथों से जाने नहीं देते, जब वर्तमान सरकार के काम-काज से 'असहमति' न जतलाते हों। उनकी असहमतियां भी इत्ती 'विकट' किस्म की होती हैं कि अगर सरकार सुन ले तो, कमस से, 'गश' खा जाए।

हालांकि मेरी कोशिश उनके ग्रुप से दूर ही रहने की रहती है फिर भी कभी-कभार 'समय काटने' के लिए उनके साथ हो लेता हूं। इस नाते वे भी मुझे 'आंशिक' किस्म का 'प्रगतिशील' ही समझते हैं। (बतला दूं, अभी मेरे वरिष्ठ होने में बहुत समय है।) लेकिन, इत्ता मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि वरिष्ठों की सोहबत में रहना 'हंसी-खेल' नहीं है। एक्चुली, वरिष्ठ लोग 'पकाते' बहुत हैं। हंसते बहुत कम बस मुंह ही बिगाड़े रहते हैं। न समाज, न साहित्य, न राजनीति, न परिवार, न फिल्म, न उत्सव उन्हें कुछ 'अच्छा' ही नहीं लगता। हर वक्त हर किसी में कोई न कोई 'नुक्स' निकालने बैठ जाते हैं। और, नुक्स भी ऐसे-ऐसे कि न सिर दर्द की गोली न लेना पड़े तो मेरा नाम बदल दीजिएगा!

अरे, मैं तो उनके ग्रुप में जरा-बहुत देर ही रहकर इत्ता पक जाता हूं कि घर आकर दिमाग को 'कूल' करने के वास्ते मुझे सनी लियोनी की फिल्म देखनी पड़ती है। तब कहीं जाकर दिमाग थोड़ा नॉर्मल हो पाता है।

वरिष्ठों (प्रगतिशीलों) का बस चले तो पूरी दुनिया केवल अपने दम और अपनी विचारधारा पर चलाएं। अव्वल तो ऐसा संभव नहीं लेकिन अगर कभी ऐसा हुआ तो दुनिया में दो चीजें कभी न रह पाएंगी; एक- 'हंसी' और दूसरी- 'प्रगति'। वरिष्ठों को इन्हीं दो चीजों से सबसे अधिक 'एलर्जी' रहती है। बदलाव से 'डरते' हैं इसीलिए 'यथास्थितिवाद' के साथ रहना ज्यादा पसंद करते हैं।

इसीलिए मैं हर किसी से यही कहता हूं कि चाहे 'बदनाम' की सोहबत कर लेना किंतु 'वरिष्ठों' (प्रगतिशील) की सोहबत में कभी न पड़ना। कसम से, न केवल दिमाग बल्कि चेहरा भी 'मातमी' हो जाएगा। (चाहो तो एक दफा आजमा कर देख लो...)

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

मैं और मेरा कंबल

...मगर मुझे मेरा ही कंबल सबसे प्रिय है। जी हां 'कंबल', 'रजाई' नहीं। मेरा कंबल मुझे न केवल 'सर्दी' बल्कि 'आवारार्दी' से भी बचाता है। न जाने कित्ते ही भयंकर से भयंकरतम जाड़े मैंने मेरे कंबल के साथ काट दिए। मजाल है, जो सर्दी ने मुझे एक दिन भी 'परेशान' किया हो। मुझे मेरे कंबल में बैठकर वो सुकून मिलता है, जो महंगी से महंगी और गर्म से गर्मतर रजाई नहीं दे सकती।

सच बोलूं, अपने लेखकीय और पारिवारिक जीवन में आज जो कुछ भी मैं हूं सिर्फ मेरे कंबल के कारण ही हूं। अपने जीवन की पहली कविता और पहला व्यंग्य मैंने कंबल में बैठकर ही लिखा था। जित्ते किस्म के 'आइडिए' मुझे कंबल में रहकर आते हैं, उत्ते रजाई में बैठकर नहीं। रजाई दिमाग के साथ-साथ लेखन पर भी भारी 'बोझ' डालती है। रजाई में प्रगतिशील चिंतन एवं लेखन तो आराम से किया जा सकता है किंतु सर्वहारा-लेखन कंबल में ही आकार लेता है।

कंबल जन और समाज से जुड़ने की 'स्वतंत्रता' देता है। हल्का होने के कारण न दिमाग पर अतिरिक्त बोझ डालता है न कलम पर। इसीलिए मैं न केवल अपने बल्कि प्रत्येक कंबल पर 'गर्व' करता हूं।

हम लेखकों ने कंबल के साथ कुछ कम 'अन्याय' नहीं किए हैं। सर्दियों में लेखन चाहे कंबल में बैठकर किया हो मगर जिक्र रजाई का ही आया है। न जाने कित्ते ही व्यंग्य, कथाएं, कविताएं, किस्से रजाईयों को समर्पित किए हैं। कंबल को यों 'उपेक्षित' रख छोड़ा मानो यह कोई बिरादरी से बाहर की चीज हो। जबकि जित्ती 'ताकत' कंबल की 'गर्माहट' से मिलती है, उत्ती रजाई में कहां! कंबल के प्रति लेखक-बिरादरी का 'सौतेलापन' मुझे हर पल 'अखरता' रहा है।

नेताओं और कथित समाजसेवकों ने भी कंबल का कम 'शोषण' नहीं किया है। अक्सर सर्दियों में ही उन्हें कंबल के बहाने गरीबों-मजबूरों की याद आती है। कैमरों के आगे कंबल बांट-बंटवाकर वे अपनी राजनीति और कथित समाजसेवा को चमकाते हैं। खुद चाहे घरों में रजाईयों में सोते हों मगर बाहर कंबल की तारीफ में कसीदे गढ़ते हैं। कंबल को गरीबों-बेसहारों का 'मसीहा' बताते हैं। लेकिन कंबल-उद्योग के लिए दिल से कभी कुछ करते हुए नहीं दिखते।

फिर भी, हमारे कंबलों का दिल बहुत बड़ा है। कंबलों का हमेशा एक ही उद्देश्य रहा है- गरीबों-मजबूरों-बेसहारों को सर्दियों में गर्माहट देना। इसीलिए मेरा दिल भी हमेशा कंबल के करीब रहने का ही करता है। मुझे किसी तरह की रजाई की दरकरार नहीं। मैं मेरे कंबल के साथ 'खुश' हूं। मेरा कंबल सर्दियों की जान और मेरे लेखन की पहचान है।

जय हो।

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

जीरो महंगाई दर और आम आदमी

अजीब विडंबना है पियारे। महंगाई दर बढ़े तो मुश्किल। घटे तो मुश्किल। सब परेशान। सबसे ज्यादा परेशान, आम आदमी है, जिसे महंगाई दर का क ख ग तक नहीं मालूम। मगर परेशान है। अखबार हाथ में थामे महंगाई दर पर खबर पढ़ता रहता है। जैसा अखबार लिख देता है, उसी हिसाब से महंगाई दर पर सोचने-विचारने लग जाता है। कभी सरकार को कोसता है। कभी अमीरों को। कभी पहले और अब के जमाने को। यों भी, कहने, सोचने और कोसने पर टैक्स थोड़े है।

महंगाई दर पर खबर के हिसाब से वो अपने घर-बाहर के बजट का ग्राफ तैयार करता है। कभी बाहर की चीजों में कटौती करता है, कभी अपनी आदतों में। तब भी, महंगाई दर उसे और उसके बजट को पछाड़ ही जाती है। वो उसके जोड़-घटाने पर मन ही मन मुस्कुराती है। अब मुस्कुराने के अतिरिक्त वो कर भी क्या सकती है? दरअसल, उसे आम आदमी की बेचारगी पर मुस्कुराने पर बड़ा मजा आता है। नेताओं की तरह वो भी जानती है कि यहां का आम आदमी हमेशा ऐसे ही रोता-कलपता रहेगा। इसे कम मिले तब भी रोएगा और ज्यादा मिले तब भी। रोना-झिकना आम आदमी की फितरत जो है।

महंगाई और महंगाई दर को सबसे ज्यादा आम आदमी ही बदनाम कर रहा है। बिना कुछ जाने-समझे वो उस पर अपनी राय कायम कर देता है। सीधी-सी बात है, जब तलक महंगाई नहीं बढ़ेगी अमीरों के शुभ-लाभ में बढोत्तरी कैसे होगी? उनकी तिजोरियां कैसे वजनदार होंगी? कैसे उनका समाज और देश में 'सबसे बड़े अमीर' के रूप में रूतबा बढ़ेगा? अब महंगाई आम आदमी के लिए भले ही दुख का सबब हो, परंतु नेताओं और अमीरों को इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। वे महंगाई दर के बढ़ने और घटने दोनों में सुखी और मस्त हैं।

अरे, आम आदमी को तो महंगाई दर के जीरो होने पर खुशी जतानी चाहिए। महंगाई दर का जीरो होना उसकी सफलता है। अब अगर महंगाई दर के जीरो होने पर भी महंगाई कम नहीं हो रही तो इसमें भला महंगाई दर का क्या दोष? महंगाई दर ने तो अपना काम कर ही दिया न! आम आदमी की आम आदमी जाने।  

देखिए न, आम आदमी खूब दबाकर खा-पचा रहा है फिर भी रो रहा है हाय महंगाई। अगर आम आदमी वकाई महंगाई से त्रस्त है, तो जीना क्यों नहीं छोड़ देता? न रहेगा सांप, न टूटेगी लाठी। हमें यह सच स्वीकार कर लेना चाहिए कि महंगाई हकीकत है। महंगाई का काम ही महंगा होना है। फिर उस पर इत्ता रोना-झिकना क्यों? हमें महंगाई दर को नहीं आम आदमी की मानसिकता को कोसना चाहिए। क्या नहीं...?

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

क्यों न खुदकुशी ही कर ली जाए!

बैठे-ठाले, यों ही, एक विचार दिमाग में आ गया- क्यों न खुदकुशी कर ली जाए। क्या हर्ज है...? यों भी, खुदकुशी करना अब न 'पाप' रहा न 'अपराध'! हालांकि मैं मरने से बहुत डरता हूं पर बिना सजा अगर कोई अपराध करने की छूट मिल रही है, तो क्यों न करूं। दो चीजें छोड़ना मैं कभी पसंद नहीं करता- एक मुफ्त में मिल रहा माल और दूसरा- बिन सजा का अपराध। जब सरकार ही खुदकुशी को अपराध मानने के कानून को खत्म करने का मन बना चुकी है फिर मैं क्यों अपने दिल-दिमाग पर ज्यादा 'लोड' लूं या अपराध-बोध जैसा महसूस करूं। खुदकुशी करने में अगर सफल हो गया तो दुनिया से निकल लेंगे नहीं तो जिंदगी जीएंगे ही। बाद में, फिर कभी, मन बनने पर दोबारा ट्राइ मार लेंगे। अब तो 'खुली छूट' है।

खुदकुशी के मसले पर सरकार ने काफी देर से 'संज्ञान' लिया जबकि मैं तो हमेशा से ही खुदकुशी के पक्ष में रहा हूं! सच्ची...। पता है, खुदकुशी करना एक गंभीर कविता या एक हिट कहानी लिखने से कहीं ज्यादा कठिन काम है। जित्ते पापड़ बीवी को मनाने में नहीं बेलने पड़ते, उससे कहीं ज्यादा मन को खुदकुशी के लिए मनाने में बेलने पड़ते हैं। क्या पता कब-किस वजह से मन बिदक जाए और खुदकुशी की कोशिश 'सपना' ही बनकर रह जाए। इसीलिए खुदकुशी करने से पहले दिमाग से कहीं ज्यादा जरूरी है मन को मनाना। मन चंगा तो प्यारे हर-हर गंगा।

न जी न मैं खुदकुशी पर केवल बातें ही नहीं छौंक रहा- एक दफा ऐसा करने की कोशिश खुद भी कर चुका हूं। पर क्या करूं, मन ने किस्म-किस्म के डर-अपराध का रायता फैला दिया और मैं एक नेक काम को अंजाम देते-देते नाकाम रह गया।

पता है, मैं खुदकुशी क्यों करना चाहता था। मैं खुदकुशी इसलिए करना चाहता था क्योंकि दर्जा दस में मैं पांच दफा फेल हो चुका था। एक ही क्लास में- वो भी पांच दफा- फेल होने वाले बंदे की मनोस्थिति को आप समझ ही सकते हैं। जित्ता मुझे घर में सुनने को नहीं मिल करती थी, उससे कहीं ज्यादा बाहर वाले सुनाते थे। अपने बच्चों के फेल होने की फिक्र से कहीं ज्यादा चिंता मेरे फेल होने की किया करते थे। फेल होने के तुरंत बाद जब भी मुझे छत पर पतंग उड़ाते या गली में गुल्ली-डंडा खेलते हुए देख लेते थे, तुरंत पिताजी के कान भर देते थे कि आपका 'बेशर्म लड़का' फेल होने के बावजूद पतंग उड़ा रहा है और गिल्ली-डंडा खेल रहा है। उसके बाद पिताजी मेरा जो 'हाल' किया करते थे, यहां बतला पाना बेहद मुश्किल है।

इसीलिए मन बनाया था कि क्यों न खुदकुशी कर सारे झंझटों पर ही खाक डाल दी जाए। न रहेगा बांस, न बजेगी बंसुरी। मगर क्या करूं, मन ने बीच में साथ देने से मना कर दिया और खामखां मुझे अपनी खुदकुशी की कोशिश को 'कैंसल' करना पड़ा।

अब एक दफा फिर से सरकार के मार्फत खुदकुशी करने की लाइन क्लियर सी हुई है। सोच रहा हूं, इस बार पक्की ट्राई मार ही ली जाए। किंतु अभी तलक मेरे हाथ ऐसा कोई कारण नहीं आ पाया है, जिनके दम पर मैं खुदकुशी करने का मन बना सकूं। मैं एंवई, बेफालतू मुद्दे पर, खुदकुशी नहीं करना चाहता। खुशकुशी के लायक कोई 'मस्त कारण' तो हो। ताकि लोग-बाग भी मेरी खुदकुशी पर आंसू बहाने के बजाए जश्न मना सकें। सरकार के कानों तलक भी यह बात पहुंचे कि बंदे ने खुदकुशी कित्ती 'एंजॉयफुली' की है।

तो आगे से अगर किसी मजदूर, किसान या गरीब की खुदकुशी की खबर अखबार में छपी मिले तो उस पर 'अफसोस' न जतलाइएगा, बस यह मानकर 'संतोष' कर लीजिएगा कि यह तो 'सरकार का वरदान' और 'बिन दर्द का एहसास' है। फिर कोई भी खुदकुशी 'खुदकुशी' न लगकर 'खुशखबरी' जैसी ही लगेगी। संभव है, मेरी खबर भी ऐसी ही लगे!

फिलहाल, मैं अपनी खुदकुशी की वजह को तलाशने में लगा हूं।

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

आइफोन-6 और पत्नी की जिद्द

मुझे मेरी 'औकात' मालूम है इसीलिए न घर न बाहर न ज्यादा बोलता हूं न टहलता। यों भी, मुझे मेरी औकात में रहकर चीजों-बातों को देखने-पहचानने में ज्यादा 'सुकून' मिलता है। मगर पत्नी का क्या करूं, जिसे अपनी तो छोड़िए मेरी औकात का भी एहसास नहीं। एक दफा मुंह से जो बात निकल गई तो निकल गई। बात को पूरा करने की मेरी औकात चाहे हो या न हो पर जिद्द करनी है। मैं, सच कहूं, जित्ता अपनी औकात से नहीं घबराता उत्ता पत्नी की जिद्द से घबराता हूं।

मंगल ग्रह पर ब्यूटी पार्लर खोलने की जिद्द से जैसे-तैसे पार पाया हूं कि अब पत्नी ने आइफोन-6 लेने की ठान ली है। पत्नी ने दो-टूक कह दिया है कि उसे आइफोन-6 चाहिए ही चाहिए। चाहे कुछ करो।

पत्नी को कित्ती ही दफा प्यार-दुलार से समझा चुका हूं कि 'प्रिय, आइफोन-6 तो क्या नोकिया लूमिया तक लेने की मेरी औकात नहीं और तुम आइफोन-6 लेने की जिद्द कर रही हो। कुछ पता भी है, आइफोन-6 की कीमत के बारे में! जित्ती आइफोन-6 की कीमत है, इत्ता तो मैं दस जनम लिखकर भी न कमा सकता। मुझ जैसा टटपूंजिया किस्म का लेखक आइफोन-6 लेना तो छोड़ो देखने तक की कल्पना नहीं कर सकता। और तुमको आइफोन-6 चाहिए। यार, कुछ तो मेरी औकात का ध्यान रखा करो।'

मगर पत्नी कुछ सुनने-समझने को तैयार नहीं। कहती है, 'तुम्हारी औकात, बतौर लेखक, मुझे बहुत अच्छे से पता है। दुनिया जहान में बड़े-ऊंचे व्यंग्य-लेखक बने फिरते हो और पत्नी को आइफोन-6 दिलवाने के लिए तुम्हारे कने पैसे नहीं। अपनी किताब अपने खरचे पर छपवाने के लिए तुम्हारे कने पैसे हैं। यहां-वहां से छोटा-बड़ा पुरस्कार-सम्मान लेने के लिए तुम्हारे कने पैसे हैं। पैसा देकर अखबारों-पत्रिकाओं में व्यंग्य छपवाने के लिए तुम्हारे कने पैसे हैं। यारों-दोस्तों के साथ बार में रंगीन महफिलें सजाने के तईं तुम्हारे कने पैसे हैं। दहेज में मिली कार में तेल डलवाने के लिए तुम्हारे कने पैसे हैं। बस सिर्फ मेरी छोटी-छोटी ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए तुम्हारे कने पैसे नहीं हैं।'

इत्ता ही नहीं, आगे भी पत्नी का लेक्चर जारी रहा, 'महज 55-60 हजार कीमत का आइफोन-6 ही तो मांगा है मैंने कौन-सी जमीन-जायदाद मांग ली है! तुम्हारी बड़े-बड़े संपादकों-लेखकों-साहित्यकारों से इत्ती जान-पहचान है, ले लो किसी से कुछ उधार। बाद में अपने लेखों के पेमेंट में से कटवाते रहना। या फिर, बैंक से लोन ले लो। अब पांच मिनट से ज्यादा नहीं लगते बैंक से लोन लेने में। जमाना जाने कहां से कहां पहुंच चुका है मगर तुम हो कि अभी भी टिपिकल हिंदी के लेखक (व्यंग्यकार) बने हुए हो।'

अब पत्नी क्या जाने हिंदी के लेखक की व्यथा-कथा। मैं चार-पांच बड़े अखबारों में छप क्या लेता हूं, वो समझती है कि मैं चेतन भगत जित्ता बड़ा लेखक हो गया हूं। आइफोन-6 लेना मेरे बाएं हाथ का खेल है। जैसे पूरी हिंदी बिरादरी के लेखक-संपादक मुझे ही उधार देने को बैठे हैं। आज जमाना चाहे कित्ता ही क्यों न बदल गया हो पर हिंदी के लेखक का आर्थिक दायरा उत्ता नहीं बदल पाया है प्रिय।

कभी-कभी सोचता हूं, हिंदी के लेखक को शादी करनी ही नहीं चाहिए। या फिर उसे हिंदी छोड़कर अंगरेजी में लिखना चाहिए। अंगरेजी में पैसा खूब है।

बहरहाल, डरते-डरते पत्नी को बोल दिया है कि 'मेरी औकात नहीं तुम्हें आइफोन-6 दिलवाने की। चाहो तो सस्ता-सा कोई फोन ले सकती हो, दिलवा दूंगा।'

इत्ता सुन पत्नी ने भी साफ बोल दिया है, 'ठीक है। कोई नहीं। अब घर में सोने को और मेरे हाथ का बना खाना तुम्हें तब ही मिलेगा जब मुझे आइफोन-6 दिलवा दोगे। तुम्हें क्या पता आइफोन-6 न होने पर बिरादरी में मेरी कित्ती 'बेइज्जती' होती है। मेरी फ्रैंड्स मेरे बारे में जाने क्या-क्या कहती हैं। अगर आइफोन-6 दिलवाना हो तो बोलो नहीं तो कट लो।

क्या कहूं, कुछ कहने की स्थिति में ही नहीं हूं। जित्ता गुस्सा मुझे पत्नी पर नहीं आ रहा, उससे कहीं ज्यादा स्मार्टफोन बनाने वालों पर आ रहा है, ससुरे इत्ता महंगा फोन बनाते ही क्यों है कि मुझे जैसे गरीब पतियों की शादी-शुदा जिंदगी खतरे में पड़ जाए। आइफोन-6 न हुआ, कोहिनूर हो गया।

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

टाइम मैगजीन और मेरी पर्सनेल्टी

मेरे भीतर हर वो खूबी है, जिसके दम पर मैं टाइम मैगजीन का पर्सन ऑफ द इयर खिताब पा सकता हूं। मगर टाइम मैगजीन वालों की नजर अभी तलक मुझ पर क्यों नहीं पड़ी, इस पर मुझे 'आश्चर्य' है! हो सकता है, निगाह पड़ने के बावजूद, भूल गए हों। या फिर मेरी पर्सनेल्टी का वजन मैगजीन के अनुरूप फिट न बैठा हो। या फिर, क्या भरोसा, किसी ने मेरे खिलाफ चुगली-शुगली ही कर दी हो। जैसा, अभी मोदीजी के साथ हुआ। अच्छा खासा मोदीजी का नाम सलेक्ट होने के बावजूद निकाल दिया गया। संभव है, ऐसा 'अंदरूनी पॉलिटिक्स' के कारण हुआ होगा!

यहां एक-दूसरे की प्रतिष्ठा से जलने-भुनने वालों की कोई कमी थोड़े न है। हर कोई इस जुगाड़ में तैयार बैठा है कि बस उसका काम बन जाए फिर दुनिया जाए भाड़-चूल्हे में। किसी और का क्या कहूं, इस मामले में, मेरे अनुभव ही बहुत हैं। न जाने कित्ती ही दफा मुझे घोषित हुए पुरस्कारों-सम्मानों पर दाएं-बाएं के लोगों ने भांजी मार ली है। न जाने कित्ती दफा ऐसा हुआ है कि मेरे नाम का इस्तेमाल लोगों ने अपनी जुगाड़ के लिए कर लिया।

किंतु मैंने कभी किसी पॉलिटिक्स का बुरा नहीं माना। बुरा मानकर खामखां खुद का ही खून जलाने से क्या फायदा? मेरी पर्सनेल्टी ऐसी-वैसी बातों या राजनीति का बुरा मानने की है भी नहीं। अरे, कहां मैं और कहां दूसरे लोग।

पर टाइम वालों को तो मेरे नाम पर विचार अवश्य ही करना चाहिए था! मुझे पर्सन ऑफ द इयर चुनकर न केवल टाइम बल्कि मेरे देश, मेरे शहर का मान भी बढ़ता। लेखकीय बिरादरी में मेरा पौव्वा और अधिक ठसक के साथ जमता। घर-परिवार, नाते-रिश्तेदारों के बीच अच्छी-खासी पूछा-पाछी बढ़ती सो अलग। टाइम मैगजीन का पर्सन ऑफ द इयर बनना कोई हंसी-ठिठोली थोड़े है। बंदे के भीतर प्रसिद्धि का माल-मसाला भी देखना पड़ता है। जोकि मेरे भीतर पहले से मौजूद है।

मोदीजी का नाम कट जाने का मतलब यह नहीं है कि कोई भारतीय पर्सन ऑफ द इयर का खिताब पा ही नहीं सकता। इसके लिए मैं हूं न। दोबारा से मैंने टाइम वालों के यहां जुगाड़ बैठाई है। मुझे पक्की उम्मीद है कि टाइम वाले मान जाएंगे। आखिर मेरी पर्सनेल्टी में कम दम थोड़े है।

जहां इत्ते बड़े-बड़े सम्मान-पुरस्कार मुझे मिल गए, एक टाइम मैगजीन का पर्सन ऑफ द इयर और सही। इस बहाने सूची में एक सम्मान और बढ़ जाएगा। है कि नहीं।

फिलहाल, प्रतीक्षा की कतार में हूं।

मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

शादी और नागिन डांस

नागिन डांस करने का मुझे हल्का-सा अनुभव है- सिर्फ अपनी शादी का। उसके बाद फिर कभी मैंने नागिन डांस किया हो, ऐसा ख्याल नहीं पड़ता। हां, जब कभी खुद की 'बेवकूफियों' पर हंसने का दिल करता है तो अपनी शादी में किए गए नागिन डांस की तस्वीरें-विडियो देखने बैठ जाता हूं। बनाने वाले ने भी कहीं कोई कसर बाकी नहीं रख छोड़ी थी, मेरे नागिन डांस को कैमरे में उतारने की। तब न जाने कहां से अंदर इत्ता 'जोश' भर गया था कि नागिन डांस खुद-ब-खुद हुए चला जा रहा था। यों भी, अपनी शादी में दुल्हे द्वारा किया गया हर डांस 'नागिन डांस' की श्रेणी में ही आता है! क्योंकि फिर ताउम्र उसे अपनी पत्नी के कहे पर डांस जो करना होता है।

बहरहाल...।

समय और इंसान चाहे कित्ती ही क्यों न बदल गया हो किंतु शादियों में नागिन डांस करने का 'स्टाइल' अब भी वही है। चाहे दुल्हा हो या बाराती या घराती या दोस्त-नाते-रिश्तेदार- एक दफा जब नागिन डांस करने उतरते हैं तो फिर अपनी पूरी उतारकर ही दम लेते हैं। खास बात, लगा लेने के बाद नागिन डांस की मस्ती और भी अधिक बढ़ जाती है। फिर चाहे आप कोई सा भी डांस करें, खुद-ब-खुद नागिन डांस में परिवर्तित हो ही जाता है।

सच बोलूं, मैं शादियों में जाता ही इसलिए हूं ताकि नागिन डांस करते लोगों को देख 'एंजॉय' कर सकूं। नागिन डांस का असली लुत्फ सड़क पर आड़े-तिरछे हाथ-पैर मारकर करने में है, वो डीजे पर थिरकने में नहीं। डीजे पर आप उत्ती 'बेसुधगी' और 'आवरगी' के साथ डांस कर ही नहीं सकते जैसा सड़क पर कर सकते हैं। दोनों हाथों को नागिन स्टाइल में सिर पर रख, कोट उतार, टाई की नॉट को ढीला कर, मस्त नागिन धुन पर डांस करने में जो 'आनंद' मिलता है, उसे शब्दों में बयां करना वाकई मुश्किल है। उस वक्त नागिन डांस करने वाला भले ही आपको बेवकूफ-सा नजर आए पर होता कमाल का है।

मैंने देखा है, अब तो लड़कियां-औरतें भी शादियों में सड़क पर नागिन डांस करने लगी हैं। पर वे अपने नागिन डांस में थोड़ी 'शीलनता' बरतती हैं। फिर भी कोशिश उनकी यही रहती है कि नागिन डांस की मस्तियों का खुलकर आनंद लिया जाए। शादियों में जिसने डांस करने में कोताही बरती या शर्म-हया का ख्याल रखा फिर उसने कुछ भी एंज‌‌ॉय नहीं किया। शादियां सिर्फ लिफाफा देने या बढ़िया खाना खाने के लिए ही नहीं होतीं मस्त नागिन डांस के साथ-साथ अपने भीतरी डांसिंग हुनूर को सामने लाने के लिए भी होती हैं।

उन लोगों के प्रति मैं 'सम्मान' का भाव रखता हूं, जो शादी चाहे किसी की भी हो मगर डांस या नागिन डांस करना नहीं भूलते। न केवल खुद पूरे जोश के साथ नाचते हैं बल्कि आजू-वाजू वालों को भी नचाते हैं। भीड़ में से खिंचकर किसी बंदे या बंदी को लाना और उससे डांस करवाना वाकई बहुत 'क्रांतिकारी टास्क' है। उनके किए नागिन डांस को खुद अगर नागिन कहीं देख ले, तो मेरा दावा है, 'शर्मा' जाएगी।

मेरे विचार में- नागिन डांस पर 'गहन शोध' की आवश्यकता है। नागिन डांस पर न केवल गोष्ठियां बल्कि अखबारों-पत्रिकाओं में बहसतलब लेख भी जरूर आने चाहिए। ताकि जिन्होंने शादियों में कभी नागिन डांस न किया हो, उन्हें ऊर्जा मिल सके, इसको करने की। खास बात, शादी के कार्ड में भी नागिन डांस करने का जिक्र अवश्य होना चाहिए। ताकि बंदा-बंदी घर से ही प्रिपेयर होकर चले। क्योंकि शादियों का सबसे 'हिट डांस' तो 'नागिन डांस' ही है।

रविवार, 7 दिसंबर 2014

दाएं-बाएं की कमाई वाले यादव सिंह

ऐसा लोगों को लगता है कि सरकारी पद पर रहकर 'दाएं-बाएं' से पैसा कमाना बहुत 'आसान' होता है जबकि यह इत्ता आसान होता नहीं। तमाम तरह की नजरों और संबंधों का खास ख्याल रखना पड़ता है। हर प्रकार की जवाबदेही हर वक्त सिर पर सवार रहती है। अगर औहदा ऊंचा है फिर तो जिम्मेवारी और अधिक बढ़ जाती है।

लेकिन फिर भी यादव सिंह जैसे वीर सरकारी बाबू दाएं-बाएं से बड़ी होशियारी से पैसा कमा ही जाते हैं। और, थोड़ा-बहुत नहीं कमाई का आंकड़ा करोड़ों में पहुंचा देते हैं। कमाल यह है कि दाएं-बाएं से कमाए धन की रत्तीभर 'शिकन' उनके चेहरे पर नजर नहीं आती। न स्वभाव न व्यवहार में ही कभी लगता है कि मियां इस या उस कमाई से 'परेशान' हैं। हर वक्त हंसते-मुस्कुराते और अपने पद की जिम्मेवारी को मुस्तैदी से निभाते रहते हैं! सरकारी पदों की कमाईयुक्त प्रतिभा एवं प्रतिष्ठा यादव सिंहों के कारण ही तो बरकरार है! पिछले दिनों शायद इसी को लेकर नेताजी ने सरकार एवं अधिकारियों को चेताया व हड़काया था। मगर यहां अपनी 'कमाईखोर आदतों' से बाज कौन आया है?

इसी व्यवस्था में कुछ जलनखोर टाइप के लोग भी होते हैं, जिन्हें दाएं-बाएं से कमाई गई दौलत 'पाप' नजर आती है। यह जलनखोरों की 'कु-दृष्टि' का ही नतीजा रहा कि बेचारे यादव सिंह की अभी तलक दाएं-बाएं से कमाई दौलत को 'ग्रहण' लगा गया। यादव सिंह की काली कमाई का सारा चिट्ठा अब सरकार और जनता के सामने है। दाएं-बाएं से कमाई करने के मामले में यादव सिंह ने ऊंचे-ऊंचे अधिकारियों तक को मात दे दी। दो किलो हीरे और 11 करोड़ तो नगद ही मिले हैं। बाकी लाखों की तो बात ही छोड़िए।

वाकई इत्ती कमाई करने में यादव सिंह को कित्ती 'मेहनत' करनी पड़ी होगी! कित्ते ही अफसरों-अधिकारियों-बाबूओं-नेताओं-मंत्रियों का 'ख्याल' रखना पड़ा होगा! न जाने कित्ती ही दफा ईश्वर को भी 'खुश' करना पड़ा होगा! भजन-जागरण-दान न जाने क्या-क्या करना-करवाना पड़ा होगा! मुझे यादव सिंह की इस दाएं-बाएं से की गई कमाई पर 'फख्र' है! ऐसी 'स्मार्टनेस' हर किसी में न होती है प्यारे।

जरूर यह 'भेदिया' यादव सिंह की 'लंका' का ही रहा होगा- जो आज उन्हें फंसाकर खुद 'हंस' रहा होगा।

फिलहाल, अभी यादव सिंह को कुछ दिनों 'रोना' होगा। थोड़े दिनों बाद लोग बाग सब भूल जाएंगे। फिर कोई नया यादव सिंह अपनी करोड़ों की कमाई के साथ सामने आ जाएगा और सारा ध्यान उस पर केंद्रित हो लेगा। हमारे यहां प्रायः ऐसा ही होता चला आया है। इसीलिए तो भ्रष्टाचार अपने पर हर समय हंसता-मुस्कुराता रहता है।

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

ज्योतिष और शिक्षा मंत्री

चित्र साभारः गूगल
तो क्या हुआ अगर वो शिक्षा मंत्री हैं? तो क्या हुआ अगर वो हाथ दिखलाने ज्योतिषी महाराज कने चली गईं? तो क्या हुआ अगर उनके हाथ और भाग्य में 'राष्ट्रपति' बनने की 'लकीरें' हैं? तो क्या हुआ अगर उनकी ज्योतिष और ज्योतिषी में 'अगाध श्रद्धा' है?

लेकिन मीडिया को इस सब से क्या! उसे तो बस हर बात और हर मुद्दे को 'ब्रेकिंग न्यूज' बनाकर चलाने से मतलब। 'टीआरपी' बढ़नी चाहिए, चाहे शिक्षा मंत्री के ज्योतिषी के पास जाने से बढ़े या अपने चैनलों पर कथित ज्योतिषियों को बैठाकर। जबकि शिक्षा मंत्री खुलकर यह कह चुकी हैं कि उनका ज्योतिषी महाराज कने जाना, हाथ दिखलाना, भाग्य जानना, ज्योतिष में आस्था रखना नितांत 'व्यक्तिगत' मामला है। पर भाई लोगों को तो 'चिकोटी' काटने से मतलब। जिसके जो मन में आ रहा है- फेसबुक और टि्वटर पर कथित फोटू को शेयर कर लिखे चला जा रहा है। बताइए, क्या समय आ गया है, मंत्री लोग व्यक्तिगत तौर पर ज्योतिषियों या बाबाओं के पास भी नहीं जा सकते? उनसे कथित आर्शीर्वाद भी नहीं ले सकते? हद है यार।

वैसे, ज्योतिषियों और बाबाओं से नेताओं-मंत्रियों-फिलमी सितारों का पुराना नाता-रिश्ता रहा है। ऐसे तमाम नेता-मंत्री-फिलमी लोग हैं, जो अपने 'अच्छे' की शुरूआत पंडित-ज्योतिषी-बाबा से पूछकर ही किया करते हैं। ग्रहों की चाल-ढाल की जानकारी जित्ती खुद ग्रहों को नहीं रहती, उनके ज्योतिषियों को रहती है। चंद्रास्वामी से लेकर संत रामपाल तक लंबी फेहरिस्त है। और सभी के साथ किस्म-किस्म की कहानियां-विवाद जुड़ें हैं। मगर फिर भी शिक्षा मंत्री का ज्योतिषी महाराज कने जाना, व्यक्तिगत मामला भले ही हो, किंतु उद्देश्य तो 'अगला पद' कौन-सा ही रहा होगा?

कोई आश्चर्य नहीं अगर शिक्षा मंत्री ज्योतिष से प्रभावित होकर संस्कृत की तरह ज्योतिष को भी पाठ्यक्रम में शामिल करवाने की पहल कर दें। आखिर भाग्य जानने की तमन्ना किसके दिल में नहीं होती? अगर इस बहाने ज्योतिषियों की दुकानदारी और अच्छे से चल पाती है तो क्या हर्ज है? आखिर बाजार में कमाई का हक सबको है।

बात जब चली है तो फिर मैं क्यों छिपाऊं कि मेरी 'आस्था' भी ज्योतिष और ज्योतिषियों में अपार है। मैं तो हर हफ्ते सनिचर वाले दिन अपने मोहल्ले के ज्योतिषी महाराज कने जाया करता हूं, अपने भाग्य का उलटा-सीधा जानने। आज जो मैं इत्ता बड़ा लेखक बन पाया हूं, यह सब मेरे मोहल्ले के ज्योतिषी महाराज की किरपा से ही है। उन्होंने बहुत समय पहले ही मेरा हाथ देखकर मुझे बतला दिया था- 'बेटा, एक दिन तुम जरूर 'ऊंचे दर्जे' के लेखक बनोगे। हर अखबार में छपोगे। लेखन से तुम्हें वो प्रसिद्धि मिलेगी, जैसे बड़े-बड़े लेखकों को मिला करती है। बस प्रत्येक सनिचर तुम नीला वस्त्र धारण किया करो। सांप को दूध और गाय को देसी घी की डेढ़ रोटी खिलाया करो। फिर देखना तुम्हारा भाग्य और ग्रह हर वक्त तुम पर 'मेहरबान' रहेंगे।' तब से अब तलक मैं लगातार यही करता चला आ रहा हूं। ज्योतिषी महाराज की किरपा से मेरी लेखन की दुकान मस्त चल रही है। (लेकिन यह मेरा नितांत व्यक्तिगत मामला है। कृपया, इसमें राजनीति कतई न खोजें।)

देख लीजिएगा, अगर शिक्षा मंत्री के ज्योतिषी महाराज ने कहा है कि वे राष्ट्रपति बनेंगी तो अवश्य बनेंगी। क्योंकि नेता-मंत्री लोगों के ज्योतिषी कभी झूठ (!) नहीं बोलते। राजनीति में जाने कित्ती कुर्सियां ज्योतिषियों की भविष्यवाणी पर ही टिकी हैं।

भाई लोगों दिमाग पे अधिक लोड न लो। वे देश की शिक्षा मंत्री हैं। उन्हें मालूम है कि शिक्षा का भाग्य और उनके हाथों की लकीरें ज्योतिष से कैसे संवर-सुधर सकती हैं।