शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

दांतों की फिक्र में...

चित्र साभारः गूगल
दंत्त-डॉक्टर ने मुझे चेताया है- 'मेरे दांतों पर पान-मसाले का 'पीलापन' लगातार बढ़ता जा रहा है। दांत देखने में भद्दे और चेहरा उजड़ा सा लगने लगा है। अगर दांतों पर गंदगी यों ही बढ़ती गई तो धीरे-धीरे कर मैदान साफ हो लेगा। फिर मैं कहीं का भी नहीं रहूंगा।'

दंत्त-डॉक्टर की चेतावनी के बाद से दांतों के प्रति मेरी 'फिक्र' बढ़ गई है। मैं रात-दिन दांतों के 'भविष्य' के बारे में सोचने लगा हूं। मेरा अत्याधिक सोचना मुझे धीरे-धीरे कर 'डिप्रेशन' की ओर धकेल रहा है। मुझे दांतों पर पड़े पीलेपन की इत्ती फिक्र नहीं है, जित्ती कि झड़ने की। मैं दांत ही क्या, किसी भी प्रकार के झड़ने-झगड़ने से घबराता हूं।

दांतों के प्रति मेरी फिक्र तब और दोगुनी हो जाती है, जब मैं मेरे मोहल्ले के पोपलों को देखता हूं। भाग्य या दुर्भाग्य से- मेरे मोहल्ले में जित्ते पोपले हैं, उत्ते ही गंजे भी। बिन चारे पोपलों को जुगाली भरते और बिन बाल गांजों को खोपड़ी पर हाथ फेरते जब देखता हूं, तो वीपी यकायक 'लो' हो जाता है। मुझे अजीब-अजीब से ख्याल आने लगते हैं। उनमें खुद को देखना शुरू कर देता हूं।

अभी मेरी उम्र ही क्या है? और अभी से दांतों की जुदाई, बर्दाशत से बाहर है प्यारे। इसीलिए मैंने मोहल्ले के पोपलों और गंजों के बीच उठना-बैठना 'न' के बराबर कर दिया है। कभी कहीं किसी पोपले ने मेरे दांतों के बाबत पूछ ही लिया तो...।

मैं बार कोशिश कर चुका हूं पान-मसाले से छूटकारा पाने की। लेकिन ससुरा छूटता ही नहीं। जिस दिन न खाओ, ऐसा लगता है, कोई बेहद 'महत्त्वपूर्ण चीज' खाने-चबाने से रह गई। मैं जानता हूं, मेरे किए की सजा, मेरे दांत भुगत रहे हैं। लेकिन आदत तो आदत है, क्या कीजिएगा। एकाध दफा तो मैं पल्ले मोहल्ले के झाड़-फूंक विशेषज्ञ कने भी जा चुका हूं मगर उससे भी कुछ हासिल नहीं हुआ। घर-परिवार में मजाक और बनने लगी कि मैं झाड़-फूंक में यकीन करता हूं। अब उन्हें क्या समझाऊं, जब पड़ती है तो इंसान सब में यकीन करने लग जाता है।

फिर सोचता हूं, मुझे ले-देके मात्र एक ही तो शौक है- पान-मसाले का। और दांतों की फिक्र में उसे भी छोड़ दूं! कल को ऊपर वाले को क्या मुंह दिखाऊंगा! कहीं उसने मुझसे मेरे 'प्रिय शौक' के बारे में पूछ लिया तो... क्या मना कर दूंगा, मेरा कोई शौक नहीं! तब कित्ती 'भद्द' पिटेगी मेरी उसके सामने।

लेकिन दूसरी तरफ दांतों पर पड़े पीलेपन की फिक्र भी मुझे दुबला किए जा रही है। फिलहाल, उधेड़-बुन में हूं कि दांतों की फिक्र करूं या शौक को जिंदा रखूं। अगर आप राय दे सकें तो बेहतर होगा। इंतजार में...।

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