बुधवार, 5 नवंबर 2014

'जॉली मूड' में सेंसेक्स

चित्र साभारः गूगल
चढ़ते सेंसेक्स ने केवल दलाल पथ बल्कि अर्थव्यवस्था का मूड भी 'जॉली' बना दिया है। जित्ती रौनक दलाल पथ पर देखने को मिली रही है, उत्ती ही अर्थव्यवस्था में भी। ऊपर से कच्चे तेल का नरम पड़ना और पेट्रोल-डीजल की कीमतों का घटना, साफ बता रहा है कि अब 'अच्छे दिन' आने से कोई माईकालाल नहीं रोक सकता। देखते जाइए, महंगाई अपनी किस्मत पर रोने लायक भी नहीं रहेगी। और, सोने-चांदी के खराब हुए दिमाग जल्द ही ठिकाने आ जाएंगे।

अब दलाल पथ पर जो भी मिलता है बड़े 'जॉली मूड' में दिखता है। हर तरह की आर्थिक फिक्र से बेफिक्र। चेहरे की रंगत गुलाबी और चलने का ढंग नबाबी। बंबई स्टॉक एक्सचेंज की बिल्डिंग को कुछ इस नजाकत से देखता है, मानो बहुत जल्द उसका भी कद इत्ता ही ऊंचा होने वाला है। सेंसेक्स के दम पर दुनिया हमारे कदमों में आने वाली है। क्यों न हो, अब तो अमेरिका भी हमारे सेंसेक्स का 'लोहा' मानने को मजबूर हो गया है।

इसमें कोई शक नहीं कि जब सेंसेक्स का मूड जॉली होता है तो अंदर-बाहर बहुत कुछ बदलता है। सेंसेक्स हमारी अर्थव्यवस्था का 'बूस्टर' है प्यारे। सेंसेक्स की तेज चाल को अब राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तरजीह मिलने लगी है। न केवल हमारे देश बल्कि अन्य देशों के लोग भी हमारी ओर उम्मीद भरी निगाहों से देखने लगे हैं। जाहिर है, उम्मीद रखने से ही किस्मत बदलती है।

लोग ऐसा मानते नहीं पर सेंसेक्स हमेशा हमारा भला सोचता है। अपने लुढ़ने से उसमें नाराजगी रहती है पर उठने की उम्मीद कभी नहीं त्यागता। सेंसेक्स की इसी 'पॉजीटिविटी' का तो मैं कायल हूं। अगर सोच और इरादे पॉजीटिव हैं फिर महंगाई तो क्या दाऊद को भी गिराया जा सकता है। सेंसेक्स ने यह करके दिखला भी दिया है।

आज मेरे भीतर जो 'पॉजीटिविटी' है सब सेंसेक्स के 'जॉली मूड' की ही देन है। सेंसेक्स के मूड से ही मैंने सीखा है, 'कूल' रहना और खामखां के पचड़ों से दूरी बनाए रखना। हां, सेंसेक्स का मूड बिगड़ता तब ही है, जब बेकारण कॉन्ट्रावर्सी पैदा होती है। तब फिर सेंसेक्स को वित्तमंत्रालय तो क्या वित्तमंत्री भी काबू नहीं कर पाते। हर तरफ हाहाकार-सा मच जाता है। कलेजा मुंह को आ जाता है कि हाय! सेंसेक्स ने यह क्या किया।

वैसे सेंसेक्स हमेशा 'जॉली मूड' में रहता है। अच्छे नजीतों पर झूमता है और अच्छी योजनाओं का खुश होकर स्वागत करता है।

हमें सेंसेक्स का यही 'जॉली मूड' तो चाहिए। ताकि बुरे दिन फिर से वापस न लौट सकें।

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