मंगलवार, 4 नवंबर 2014

पाई-पाई काला धन!

चित्र साभारः गूगल
अब तो कलेजे में 'ठंडक' पड़ी होगी न। अब तो प्रधानमंत्रीजी ने स्वयं सीना ठोककर कह दिया कि पाई-पाई काला धन लाकर रहेंगे। या अब भी कोई शक-वक बचा है दिल-दिमाग में?

अमां, इत्ते दिनों से सरकार और प्रधानमंत्री एंवई हवा में थोड़े फेंक रहे थे कि काला धन वापस लाएंगे। इसी नारे और वायदे के दम पर ही उन्हें इत्ता विशाल जन-समर्थन मिला है। पार्टी के दिन बहुरे हैं। नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं। जनता में उम्मीदें जागी हैं। फिर भला वो कैसे उम्मीदों पर पानी फेर सकते हैं? अगर पानी फेरा तो जनता अगले चुनावों में पानी के साथ-साथ फेरों का भी हिसाब चुकता कर लेगी। इस मामले में देश की जनता बहुत समझदार है। कब, कहां, किससे, कैसा बदला लेना है, सब जानती है। काम करने वाले और काम न करने वाले नेता-मंत्री-विधायक-सभासद सबको पहचानती है। जनता की निगाह से बचके कहां जाइएगा साहेब।

लग तो साफ रहा है कि काले धन के 'भूत' ने न केवल सरकार बल्कि प्रधानमंत्री को भी काफी परेशान किया हुआ है। सरकार के भीतर और विपक्ष ने बाहर दिन-रात काले धन पर 'बहस' छेड़ रखी है। हर कोई सवाल पर सवाल दागे जा रहा है कि मान्यवर, कब तलक ला पा रहे हैं काला धन वापस? बहुतों ने तो वो लाख रुपए की रकम भी अब मांगना शुरू कर दी है, जिसका वायदा मोदीजी ने अपने किसी भाषण में काला धन वापस लाने पर किया था।

न जी न जनता कुछ नहीं भूलती। इसको सब याद रहता है कि किस नेता ने कब और कहां क्या बोला था। यही तो जनता की खूबी है।

खैर इसमें रत्तीभर शक नहीं कि काले धन के मसले ने सरकार की नाक में नकेल डालकर रख दी है। ऊपर से कार्ट की हड़काई के बाद से तो मसला और भी 'पंगात्मक' हो गया है। सरकार ने सोचा था कि सात-आठ नाम खोलकर बात रफा-दफा हो जाएगी। लेकिन क्या मालूम था कि इस तरह से उल्टी पड़ जाएगी। अब सरकार के प्रत्येक नेता-मंत्री को सपने भी काले धन के ही आते होंगे? क्या कीजिएगा, जो वायदा किया, वो निभाना तो पड़ेगा ही। नहीं तो पिछली सरकार महंगाई पर गाई, यह सरकार कहीं काले धन पर न हिल जाएगी!

अब यह भी एक बड़ा मसला है कि पाई-पाई काला धन वापस कैसे आएगा? पाई-पाई का मतलब है न एक पैसा इधर न एक पैसा उधर। हिसाब-किताब एकदम चोखा। लेकिन अभी तो सौंपी गई लिस्ट में ही पूरे नाम नहीं हैं। जित्ते का वायदा किया गया था, उससे भी कम हैं। किसके कने कित्ता काला धन है न यह बात जनता को अभी मालूम चली है। अभी यहां-वहां सिर्फ हवा में ही तीर छोड़े जा रहे हैं। फिर भी, सरकार कह रही है कि काला धन लाएंगे। जरूर लाएंगे। काला धन रखने वालों को सबक भी सिखाएंगे।

यों भी, हमारे देश में किसी बात या मुद्दे का जल्द हकीकत में तब्दील होना इत्ता आसान नहीं होता। कोई न कोई पेंच या पंगा फंस या फंसा ही जाता है। रौ में आकर नेता लोग वायदे बहुत ऊंचे-ऊंचे कर जाते हैं किंतु जब निभाने का नंबर आता है, सिट्टी-पिट्टी गुम। फिर बगलें झांकते फिरते हैं कि कहां मुंह छिपाएं। सब जानते हैं, मुंह छिपाने की कला में हमारे देश के नेताओं का जवाब नहीं। महंगाई, घोटाले, बदजुबानी, अफसरशाही, काला धन आदि पर कोई न कोई रास्ता तलाश ही लेते हैं मुंह छिपाने का।

फिलहाल, प्रधानमंत्री के कहे 'पाई-पाई' शब्दों को हम 'दिमाग' और 'ध्यान' में रखे हुए हैं। उनके किए गए वायदे पर भरोसा बैठाए हुए हैं। काला धन जब पाई-पाई के साथ वापस आ जाएगा तब ही समझेंगे कि उनके कहे पाई-पाई शब्द 'सार्थक' हुए। वरना... तो जो है सो है ही प्यारे।

1 टिप्पणी:

Digamber Naswa ने कहा…

पहले पता तो चले कितना है ... तःही तो पाई पाई का हिसाब रख पायेंगे ...