गुरुवार, 27 नवंबर 2014

न नजरें मिलीं न मिले हाथ

चित्र साभारः गूगल
दुआ न सलाम। न हाय न हैलो। न हाल न चाल। न मुस्कुराहट न रिस्पेक्ट। यानी, दोनों के दिलों में इत्ती 'तल्खियां' बढ़ गईं कि एक दूसरे को नजर भर देखा तलक नहीं। ऐसा व्यवहार प्रेमी-प्रेमिकाओं के बीच तो समझ में आता है किंतु दो देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच ऐसा... लाहौल वला कूवत।

सार्क के बहाने मिले चांस को दोनों ने यों गवां दिया- मानो अब से न हम तुम्हें जानें, न तुम हमें। अमां, ऐसा भी कहीं होता है! रिश्तों में थोड़ी 'गर्मी' की गुंजाइश तो बनी रहनी ही चाहिए। दिल से बेशक न मिलते किंतु नजरों-नजरों में हल्की मुस्कुराहट के साथ तो मिल ही सकते थे। पर गालिब वो भी मिले।

माना कि तल्खियां दोनों तरफ हैं। माना कि रिश्तों में दरारें गहरी हैं। माना कि तोपें अक्सर दोनों तरफ से तन जाती हैं। माना कि कट्टरपंथियों-चरमपंथियों की पौ बारह है। मगर फिर भी एक बड़े मंच पर दो देशों के आला मालिक पहुंचे और एक दूसरे को देखें भी नहीं... मन के भीतर 'तिल्ली' सी लग गई, कसम से। घर के बच्चे रह-रहकर सवाल पूछ रहे हैं कि क्या इत्ते बड़े-बड़े नेताओं के बीच भी कट्टा-कुट्टी चलती है? इत्ता तो हम स्कूल में अपने साथियों के साथ भी नहीं करते। देर-सवेर देख और हंस-बोल लेते ही हैं। अब उनको क्या समझाएं कि यहां माजरा ही दूसरा है। दोनों देशों के अहम इस कदर 'हरे' हो चुके हैं कि गुंजाइश खत्म-सी हो गई है।

बड़े भाई और छोटे भाई के बीच 'समाप्त' होता यह 'शिष्टाचार' दिल पर कई-कई छुरियां चला रहा है। मगर मीडिया या अति-राष्ट्रवादियों को इससे क्या? वो तो जैसे हर बात, हर तल्खी पे बस 'मजा' लेने के लिए ही बने हैं। मोदी-शरीफ के बीच आई बेरूखी को कुछ यों दिखलाया जा रहा है कि मानो यह दुनिया का 'आठवां आश्चर्य' हो। इसे गिनिज बुक ऑफ रिकार्ड में दर्ज करवाया ही जाना चाहिए। इस देश के मीडिया और उस देश के मीडिया के बीच टीवी पर जमकर 'बचकानी किस्म' की बहसें हो-चल रही हैं। बहसों को देखकर लग रहा है कि किसी सब्जी मंडी में खड़े हैं और आलू-प्याज पर जबरन मौल-भाव हो रहे हैं। मिले आपस में वे दोनों नहीं हैं, दर्द इनके और उनके पेटों में उठा रहा है। हद है प्यारे।

यों भी, भारत-पाकिस्तान के बीच कुछ होने या न होने वाला मीडिया के लिए महज 'मसाला' भर होता है। ऊपर से सोने पे सुहागा विकट किस्म के देशप्रेमी लोग कर देते हैं। अभी कुछ दिनों तलक मीडिया इसी बेरूखी के बहाने हमें-आपको पकाएगा।

कहें कुछ न मगर मियां नवाज शरीफ चेहरे से और चाल में काफी बुझे-बुझे से नजर आ रहे थे। मानो- कोई उनके खेत से मूली चुराकर ले भागा हो। मियां को गलती का एहसास है मगर कबुलेंगे क्यों कर... नाक न छोटी हो जाएगी उनकी। सारा मसला तो आखिरकार नाक की चौधराहट का ही है। मियां चाहते हैं, उनकी नाक पाकिस्तान से लेकर कश्मीर तलक ऐसे ही फैली रहे। वे नुथने फुलाते रहें और हम 'सहम' से जाते रहें। हम दोस्ती का हाथ दें और वे ऐंठ में झिड़क दें।

मियां ऐसे तो न चलेगा। आखिर हम भी लोकतांत्रिक मुल्क हैं। हमारी भी साख है दुनिया में। साख को यों शर्मसार कर क्या हासिल?

खैर, इस दफा हमारी-उनकी न नजरें न हाथ मिले पर इत्ती सलाकत तो दोनों के दरमियां रहनी ही चाहिए कि मन भर मुस्कुरा दें। उम्मीद ही कर सकते हैं कि आगे ये आपसी कड़वाहटें थोड़ी कम होकर रिश्तें सुधरेंगे। बाकी तो जो है सो है ही प्यारे।

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