मंगलवार, 25 नवंबर 2014

बग्घी पर सवार समाजवाद

चित्र साभारः गूगल
बबुआ, धीरे-धीरे आने वाले समाजवाद के दिन लद चुके। अबकी समाजवाद विक्टोरियाई शैली की बग्घी पर सवार होकर आया है। बग्घी पर समाजवाद पूरी शान, पूरी ताकत के साथ आया है। और, क्यों न आए? जमाने में जब वक्त के साथ सबकुछ अदल-बदल रहा तो क्या समाजवाद नहीं बदलेगा? अमां, कब तलक समाजवाद बैलगाड़ी या रिक्शे की सवारी करता रहेगा? समजावाद ने खुद को लैपटॉप से लेकर मेट्रो ट्रेन तक खूब बदला है। न न अब इस मुद्दे पर बहस बे-मानी है कि बदले हुए इस समाजवाद ने समाज या जनता का कित्ता भला किया? ऐसी बहसों में समाजवादियों का मन नहीं लगता।

बग्घी पर सवार होकर आए समाजवाद को 'सामंती' कतई न कहें। यह हमारे नेताजी के 75 के होने का 'सुअवसर' था। 75 का होना और इत्ते सालों तलक समाजवाद को देश-समाज के भीतर जिंदा (!) रखना, कोई 'मजाक' थोड़े था प्यारे। लोग बाग जाने कहां-कहां जाकर अपना बर्थ डे मानते हैं। मगर नेताजी ने तो इसे हमारे (जनता के) बीच बग्घी पर सवार होकर मनाया। 75 फुट लंबा केक भी काटा। और, बर्ड डे को नाम दिया- 'समता दिवस'। यानी, नेताजी बर्ड डे पर भी समता, समानता और जनता को न भूले! बड़ी बात।

अब कहने वाले नेताजी के बर्ड डे को लेकर कुछ भी कहते रहें। यहां कौन-सा समाजवाद या समाजवादी की सेहत पर कोई 'फर्क' पड़ रहा है। जब बड़ा पेड़ हिलता है, तो कुछ अवाज तो होती ही है। और फिर बबुआ यह समाजवाद है समाजवाद। समाजवादी राज में जो कुछ भी किया जाता है जनता के हितों और समाजवाद को मजबूती देने के लिए ही किया जाता है। बग्घी पर आए इस समाजवाद को जनता के हित में ही देखा-समझा जाना चाहिए!

जनता के पैसे का इससे बेहतर 'समाजवादी इस्तेमाल', मुझे नहीं लगता, दूसरा कुछ होगा! नेताजी केवल समाजवाद के नेता थोड़े ही हैं, जनता के भी तो नेता हैं। तो क्या जनता का मन नहीं करता, अपने प्रिय नेताजी के तईं थोड़ा-बहुत खर्च करने का। सो, 'समता दिवस' (बर्ड डे) के बहाने कर दिया। समाजवाद को मजबूती देने में जनता का बहुत बड़ा हाथ रहा है। बग्घी पर सवार होकर नेताजी ने सबको यह बता-दिखा दिया है।

मुझे पक्का विश्वास है कि बग्घी पर सवार समाजवाद को देखकर लोहिया की 'आत्मा' जरूर 'निहाल' हुई होगी! मन में एक दफा सोचा जरूर होगा कि काश! ऐसा समाजवाद हमारे समय में आ पाता। लेकिन लोहिया ने दूसरे ही पल संतोष कर लिया होगा- तब के समाजवाद और अब के समाजवाद में वक्त के साथ बदलाव तो आएगा ही। अब जो है वो बस यही है।

लोहिया के दौर को बीतते साफ देख पा रहा हूं। यह दौर एक नए समाजवाद का है। जोकि बग्घी पर सवार होकर आता है और बर्ड डे भी सेलिब्रेट करता है। जय हो समाजवाद की।

1 टिप्पणी:

Vikram Pratap singh ने कहा…

Accha Likha aapne, uttar pradesh ke dasha, durdasa samajwadi baggi ka hi inaam hai. Lohia ji ghar hanme samajwaad ko jab se samajwaad yadav ka darja mila hai tab se halaat bekaboo hai ji .