रविवार, 23 नवंबर 2014

संकट में बाबा लोग

चित्र साभारः गूगल
पहले बाबा आसाराम अब बाबा रामपाल। एक-एक कर हमारे देश के बाबा लोग अगर यों ही अंदर होते रहे तो संपूर्ण बाबा-बिरादरी पर 'संकट के बादल' गहरा जाएंगे! सबकुछ 'तहस-नहस' हो जाएगा। सनातनी परंपरा बिन बाबा लोगों के 'बेसहारा' हो जाएगी। धर्म का क्या होगा? भक्त लोग किस बाबा के दरबार अपना और अपने कष्टों का निवारण करवाने को जाएंगे।

कभी सपने में भी न सोचा था कि बाबा लोगों का ऐसी 'दुर्गत' होगी। आलिशान आश्रमों में रहने वाले बाबा लोग जेल की काल-कोठरी में रहेंगे। भक्त-समाज को उसके कष्टों से मुक्ति दिलाने वाले बाबा लोग आज खुद ही कष्ट में हैं। जेल के भीतर खड़े इत्ते बेचारे नजर आ रहे हैं- मानो कोई 'शातिर अपराधी' खड़ा हो। ऐसे में तो ध्यान लगाने पर भी आंखें बंद न होती होंगी उनकी।

निश्चित ही यह बाबा लोगों की इज्जत पर संकट का समय है। ताज्जुब है, संकट के इस समय में उनका ईश्वर भी कोई चमत्कार-वमत्कार नहीं दिखा रहा। जिस ईश्वर की किरपा की खातिर बाबा लोगों ने अपनी इत्ता बड़ी सल्तनत खड़ी की। देश से लेकर विदेश तक में इत्ते सारे भक्त-चेले बनाए। इत्ती जमीन और धन अर्जित किया। राजनीति और नेताओं के बीच पक्की सांठ-गांठ स्थापित की। इत्ता सब करने के बाद भी ईश्वर बाबा लोगों के संकट में उनके साथ नहीं है। हद है। फिर काहे की बाबागिरी और काहे की ईश्वर-भक्ति?

यह सही है कि अब बाबा लोग पहले जमाने जैसे न रहे। काफी बदल गए हैं। आराम-तलबी और एय्याशी बाबागिरी के साथ-साथ चलती रहती है। तो क्या हुआ...। जमाना बदला, वक्त बदला तो क्या बाबा लोग नहीं बदलेंगे? बाबा लोगों के रहन-सहन का इस्टाइल न बदलेगा। आखिर बाबा लोगों का भी तो मन करता ही होगा भौतिक एवं सामाजिक सुखों को भोगने का। बाबागिरी तो पूरे जनम का खेला है ही। ऐसे में अगर बाबा लोग कुछ संपत्ति या अपने आश्रम को महलनुमा बना लेते हैं, तो क्या गलत करते हैं। यह सब उनके भक्तों का ही तो दिया होता है। दुकान चलाने के लिए संसाधनों की जरूरत तो पड़ती ही है। क्या नहीं...।

बेचारे रामपाल की अच्छी-खास चलती दुकान को पलभर में जमींदोज करवा दिया। आलिशान आश्रम को कबाड़ बना दिया। भक्तों को निकाल बाहर किया। और, संत रामपाल को सलाखों के पीछे खड़ा कर दिया। सलाखों के पीछे खड़े रामपाल किसी हारे हुए जुआरी से कम न लग रहे थे। देखते ही देखते दुकान भी गई और संतई भी। मिला क्या... जेल की हवा और चक्की का आटा।

यही समय है बाबा लोगों के एकजुट होने का। सरकार के साथ-साथ बाबा-विरोधियों का 'प्रतिकार' करने का। तलाब में अगर एक मछली गंदी निकल आई इसका मतलब यह थोड़े है कि पूरा तलाब ही 'अपवित्र' हो गया। यों भी, गलतियां किससे नहीं होतीं। कभी-कभी बाबा लोग भी गलतियां कर बैठते हैं। लेकिन दुकानदारी तो बंद नहीं होनी चाहिए न। अगर बाबागिरी की दुकान बंद हो गई तो अंध-भक्त श्रद्धालु लोग कहां जाएंगे? मेहनत की कमाई (!) किसको दान करेंगे? किसके आगे दंडवत्त हो आर्शीर्वाद लेंगे।

बाबा लोगों की पीड़ा मुझसे देखी नहीं जाती। इत्ती मेहनत करके तो बाबा बने। अब जब बाबागिरी की दुकान चलाने का समय आया तो धरकर अंदर कर दिया। ऐसे ही अगर चलता रहा तो एक दिन हमारे देश में बाबा लोग ढूंढें से न मिलेंगे। फिर मंदिरों और मठों का क्या होगा? ईश्वर भी अकेले पड़ जाएंगे तब तो।

मेरी चिंता को यों हलके में न लें। केस को समझें। बाबा लोगों के दम पर ही हमारी सभ्यता-संस्कृति और धर्म की बुनियाद टिकी है। बाबा लोगों पर आया संकट समूची बाबा-बिरादरी के तईं खतरे की घंटी है। दुआ करें, यह घंटी अधिक तेज न हो। बाकी तो जो है सो है ही।

3 टिप्‍पणियां:

yashoda agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना बुधवार 26 नवम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

Digamber Naswa ने कहा…

ऐसे बाबा लोगों की पोल जितना जल्दी हो खुले ... समाज के लिए, धर्म के लिए उतना ही अच्छा है ...

Madan Saxena ने कहा…

बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको . कभी यहाँ भी पधारें