सोमवार, 10 नवंबर 2014

पत्नी और आत्मकथा

चित्र साभारः गूगल
जिंदगी में मैंने कभी 'कथा' नहीं लिखी, 'आत्मकथा' क्या लिख पाऊंगा? लेकिन पत्नी का हुकम है- मैं आत्मकथा लिखूं। वो भी अंगरेजी में। आत्मकथा की मार्केटिंग चेतन भगत स्टाइल में करूं। आत्मकथा का विमोचन सचिन तेंदुलकर स्टाइल में।

पत्नी को कित्ती ही दफा प्यार से समझा चुका हूं- आत्मकथा लिखना मेरे बस की बात नहीं। न ही मेरे जीवन में ऐसा कुछ घटा है, जिसे आत्मकथा में दर्ज करवा सकूं। अरे, आत्मकथा तो वे लोग लिखते हैं जिनके जीवन में तमाम तरह के प्रसंग, किस्म-किस्म के संघर्ष, तरह-तरह के अनुभव होते हैं। या फिर वे लिखते हैं, जिन्हें महसूस होने लगता है कि बस जीवन और लेखन का यही 'दी ऐंड' है, अब आत्मकथा लिख ली जाए।

किंतु प्रियवर, मेरे साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं है। मैंने आत्मकथा के लायक न जीवन जिया है न ही लेखन में ऐसा कोई बड़ा तीर मारा है। वो तो 'संपादकों के रहम' और 'भगवान की किरपा' के भरोसे मेरे लेखन की गाड़ी चल रही है। वरना, मेरी औकात तो लेखन का 'ल' लिखने तक की नहीं।
और, तुम कहती हो, मैं अंगरेजी में आत्मकथा लिखूं। अंगरेजी और मैं...। क्या तुम्हें पता नहीं कि बेटी की स्कूल डायरी में तुम्हारे नाम की स्पेलिंग तुमसे पूछकर लिखता हूं? क्या तुम्हें पता नहीं कि मोहल्ले की सोसाइटी-मीटिंग में मैं सिर्फ इसलिए नहीं जाता कि वहां सब अंगरेजी में टॉक-शॉक करते हैं? क्या तुम्हें पता नहीं कि मैं अक्सर अपने नाम की स्पेलिंग भी भूल जाया करता हूं? क्या तुम्हें पता नहीं कि मैं अंगरेजी फिल्में वॉल्यूम बंद करके देखता हूं? क्या तुम्हें यह भी नहीं पता कि हमारी शादी के कार्ड में मेरी बेअक्ली के कारण तुम्हारे पिताजी के नाम की स्पेलिंग गलत छप गई थी? तब कित्ता हंगामा हुआ था बिरादरी में। सबने कहा था, दामाद बाबू का हाथ अंगरेजी में कित्ता तंग है। इत्ते पर भी तुम कहती हो कि मैं आत्मकथा जैसी 'ऊंची चीज' अंगरेजी में लिखूं। यार, क्यों लेखक बिरादरी के बीच मेरी भद्द पिटवाने पर तुली हुई हो। कुछ तो रहम करो मेरी रेप्यूटेशन पर।

मेरे इत्ता समझाने का पत्नी पर कोई असर न था। उसका एक ही हुकम है- मैं आत्मकथा लिखूं केवल अंगरेजी में।

उसने फिर से अपनी टोन में मुझे हड़काया- तुम न केवल शक्ल बल्कि अक्ल से भी हिंदी के ही लेखक नजर आते हो। जरा दिमाग लगाया करो। अगर अंगरेजी नहीं आती तो 'ट्रांसलेट' करवा लो। मैंने कब कहा- आत्मकथा में अपने जीवन या संघर्ष का चिट्ठा खोलकर रख दो। आत्मकथा में अपने लेखन के सबसे विवादस्पद (कंट्रोवशल) हिस्से को लिखो। कब, कहां, किस संपादक, लेखक, साहित्यकार, पाठक से तुम्हारी झड़पें हुईं। किस नुक्कड़ या चौराहे पर तुमको तुम्हारे लेखक साथियों द्वारा हड़काया गया। किन-किन लोगों ने तुम्हारी हूटिंग-बूटिंग की। किस प्रकाशक ने तुम्हारी किताब को छापने से मना कर दिया। किसने तुम्हारी रॉयल्टी का पैसा हजम कर लिया। किस समीक्षक या आलोचक ने तुम्हारे संपूर्ण लेखन को कूड़ा-करकट करार दिया। मतलब, आत्मकथा में कुछ ऐसा 'सनसनीखेज' हो जिसकी खबर बने। रातों-रात विवादों के सहारे तुम स्टारर लेखन पहचाने जाने लगो।

प्यारे पतिदेव, 'कंट्रोवर्सी' ही लेखक को 'ऊंचा' और 'महान' बनाती है। देख लो, सचिन को। एक आत्मकथा के दम पर ही सचिन ने हिंदी-अंगरेजी के बड़े से बड़े लिक्खाड़ लेखकों को पछाड़ दिया है। अपनी किताब की ऐसी मार्केटिंग की- आज हर तरफ सचिन ही सचिन है। सचिन खिलाड़ी होकर भी आज लेखक के रूप में जाना-पहचाना जा रहा है। वही हाल चेतन भगत का है। 'हाफ गर्लफ्रेंड' लेखन जगत में तहलका मचाए हुए है। इन लेखकों के हिसाब से अपना लेखन तय करो।

और हां एक बात कान खोलकर अच्छी तरह से सुन लो- आत्मकथा तो तुम्हें लिखनी ही पड़ेगी (अंगरेजी) में। वरना, तलाक से नीचे अब बात न होगी। समझे।

लेखक होने की इत्ती बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ेगी प्यारे कभी सोचा न था।

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