बुधवार, 19 नवंबर 2014

28 हजारी सेंसेक्स

चित्र साभारः गूगल
दलाल पथ पर घी के दीए जलाइए। मिठाइयां बांटिए। जश्न मनाइए। आतिशबाजी छोड़िए। क्योंकि... हमारा प्यारा सेंसेक्स 28 हजारी हुआ है। स्टॉक मार्केट में 2008 के बाद फिर से तेजी का माहौल बनने लगा है। लोगों के चेहरों पर पड़ी हताशा की धूल छंटने लगी है। लंबे समय बाद अर्थव्यवस्था में 'गुलाबी सुधार' के 'अच्छे दिन' दिखना शुरू हुए हैं। महंगाई ने अपने तेवर ढीले किए हैं। घर का बजट भी अब संभलने लगा है।

सेंसेक्स को यों 'मुस्कुराते मूड' में देखना कित्ता सुखद प्रतीत होता है, यह कोई मुझसे पूछे। पिछली काले दिनों को बिसरा सेंसेक्स अपनी गति बढ़ता ही चला जा रहा है। सेंसेक्स में खुद को संवारने का जित्ता साहस दिखता है, उत्ता तो हम इंसानों में नहीं होता। एक लिमिट के बाद हम इंसान भी 'डू' बोल देते हैं मगर सेंसेक्स का न केवल खुद से बल्कि बिगड़ैल आर्थिक परिस्थितियों से भी संघर्ष करना जारी रहता है। यह लगातार संघर्ष करते रहने का ही परिणाम है कि आज हमारा सेंसेक्स 28 हजार के शिखर पर है। अमेरिकी और यूरोपिए बाजारों से खासा आगे।

पेट्रोल-डीजल के दामों का लगातार कम होना और महंगाई दर का लुढ़ना, साफ बताता है, कि सेंसेक्स में बनी तेजी कित्ता असर जमा रही है। हर ओर से हमारे सेंसेक्स की शान में तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही है। मौहल्ले के नुक्कड़ से लेकर चौकी चौराहे तलक हर किसी की जुबान पर बस सेंसेक्स के ही चर्चें हैं। लोग बाग सेंसेक्स की तेजी में अब अपना 'भविष्य' देखने लगे हैं। जिन दीवानों ने अभी तलक शेयर बाजार में अपनी पूंजी को डूबोया ही डूबोया था, अब कमाई के फंडे तैयार करने में जुटे हैं।

देखा दुनिया वालों ऐसे आते हैं 'अच्छे दिन'! अब तो मानोगे न, प्रधानमंत्री का अच्छे दिनों का नारा कोरी हवाबाजी नहीं था। जब पूरी दुनिया प्रधानमंत्री के काम को मान रहिए तो क्या हमारा सेंसेक्स न मानेगा! सेंसेक्स की अच्छी चाल हमेशा अच्छे कामों पर ही निर्भर रही है। सेंसेक्स जब चलता है तभी अर्थव्यवस्था का इंजन भी दौड़ता है। अर्थव्यवस्था के इंजन के दौड़ने में ही आम आदमी की तरक्की के रास्ते खुलते हैं।

कोई शक नहीं कि सेंसेक्स को सरकार का मूड भा गया है। सेंसेक्स की सरकार के साथ जुगलबंदी निभने लगी है। तो अच्छा ही है न। इत्ते सालों बाद सेंसेक्स को सरकार के रूप में एक 'सहारा' मिला है, जिसे वो अपना कह सकता है। वरना पिछली सरकार ने तो बेचारे सेंसेक्स की कमर ही तोड़कर रख दी थी। सेंसेक्स न इधर का रहा था न उधर का। दुनिया भर में भद्द पिटी थी सो अलग।

टूटी कमर को फिर से सीधा करने में सेंसेक्स ने सात साल का समय जरूर लिया पर अंततः करके दिखा ही दिया। एक ही झटके में मंदड़ियों को ऐसा ध्वस्त किया कि अब बाजार में नजर ही नहीं आते। बुल-बियर की दौड़ में फिर से बुल आगे निकल गया। बेचारा बियर अपनी किस्मत पर रो रहा है कि हाय! मैं बियर क्यों हुआ।

गुजरे समय और खराब वक्त पर खाक डालते हुए यह समय सेंसेक्स के 28 हजारी होने पर 'सेलिब्रेट' करने का है। नई-नई उम्मीदें बांधने का है। अर्थव्यवस्था की गुलाबियत बरकार रहे, यह 'दुआएं' मांगने का है। सेंसेक्स के सहारे आम आदमी के चेहर पर बनी हंसी पर कुर्बान जाने का है। काली अंधेरी कोठरी में से उजले सवेरे की किरणें देखने-दिखाने का। उत्साह जगाने और उमंगें पैदा करने का। यह सब सिर्फ और सिर्फ प्यारे सेंसेक्स के ही तो कारण है।

बाजार में हमारे सेंसेक्स की 'बादशाहत' यों ही बरकरार रहे। बस यही दुआ है।

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