गुरुवार, 27 नवंबर 2014

न नजरें मिलीं न मिले हाथ

चित्र साभारः गूगल
दुआ न सलाम। न हाय न हैलो। न हाल न चाल। न मुस्कुराहट न रिस्पेक्ट। यानी, दोनों के दिलों में इत्ती 'तल्खियां' बढ़ गईं कि एक दूसरे को नजर भर देखा तलक नहीं। ऐसा व्यवहार प्रेमी-प्रेमिकाओं के बीच तो समझ में आता है किंतु दो देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच ऐसा... लाहौल वला कूवत।

सार्क के बहाने मिले चांस को दोनों ने यों गवां दिया- मानो अब से न हम तुम्हें जानें, न तुम हमें। अमां, ऐसा भी कहीं होता है! रिश्तों में थोड़ी 'गर्मी' की गुंजाइश तो बनी रहनी ही चाहिए। दिल से बेशक न मिलते किंतु नजरों-नजरों में हल्की मुस्कुराहट के साथ तो मिल ही सकते थे। पर गालिब वो भी मिले।

माना कि तल्खियां दोनों तरफ हैं। माना कि रिश्तों में दरारें गहरी हैं। माना कि तोपें अक्सर दोनों तरफ से तन जाती हैं। माना कि कट्टरपंथियों-चरमपंथियों की पौ बारह है। मगर फिर भी एक बड़े मंच पर दो देशों के आला मालिक पहुंचे और एक दूसरे को देखें भी नहीं... मन के भीतर 'तिल्ली' सी लग गई, कसम से। घर के बच्चे रह-रहकर सवाल पूछ रहे हैं कि क्या इत्ते बड़े-बड़े नेताओं के बीच भी कट्टा-कुट्टी चलती है? इत्ता तो हम स्कूल में अपने साथियों के साथ भी नहीं करते। देर-सवेर देख और हंस-बोल लेते ही हैं। अब उनको क्या समझाएं कि यहां माजरा ही दूसरा है। दोनों देशों के अहम इस कदर 'हरे' हो चुके हैं कि गुंजाइश खत्म-सी हो गई है।

बड़े भाई और छोटे भाई के बीच 'समाप्त' होता यह 'शिष्टाचार' दिल पर कई-कई छुरियां चला रहा है। मगर मीडिया या अति-राष्ट्रवादियों को इससे क्या? वो तो जैसे हर बात, हर तल्खी पे बस 'मजा' लेने के लिए ही बने हैं। मोदी-शरीफ के बीच आई बेरूखी को कुछ यों दिखलाया जा रहा है कि मानो यह दुनिया का 'आठवां आश्चर्य' हो। इसे गिनिज बुक ऑफ रिकार्ड में दर्ज करवाया ही जाना चाहिए। इस देश के मीडिया और उस देश के मीडिया के बीच टीवी पर जमकर 'बचकानी किस्म' की बहसें हो-चल रही हैं। बहसों को देखकर लग रहा है कि किसी सब्जी मंडी में खड़े हैं और आलू-प्याज पर जबरन मौल-भाव हो रहे हैं। मिले आपस में वे दोनों नहीं हैं, दर्द इनके और उनके पेटों में उठा रहा है। हद है प्यारे।

यों भी, भारत-पाकिस्तान के बीच कुछ होने या न होने वाला मीडिया के लिए महज 'मसाला' भर होता है। ऊपर से सोने पे सुहागा विकट किस्म के देशप्रेमी लोग कर देते हैं। अभी कुछ दिनों तलक मीडिया इसी बेरूखी के बहाने हमें-आपको पकाएगा।

कहें कुछ न मगर मियां नवाज शरीफ चेहरे से और चाल में काफी बुझे-बुझे से नजर आ रहे थे। मानो- कोई उनके खेत से मूली चुराकर ले भागा हो। मियां को गलती का एहसास है मगर कबुलेंगे क्यों कर... नाक न छोटी हो जाएगी उनकी। सारा मसला तो आखिरकार नाक की चौधराहट का ही है। मियां चाहते हैं, उनकी नाक पाकिस्तान से लेकर कश्मीर तलक ऐसे ही फैली रहे। वे नुथने फुलाते रहें और हम 'सहम' से जाते रहें। हम दोस्ती का हाथ दें और वे ऐंठ में झिड़क दें।

मियां ऐसे तो न चलेगा। आखिर हम भी लोकतांत्रिक मुल्क हैं। हमारी भी साख है दुनिया में। साख को यों शर्मसार कर क्या हासिल?

खैर, इस दफा हमारी-उनकी न नजरें न हाथ मिले पर इत्ती सलाकत तो दोनों के दरमियां रहनी ही चाहिए कि मन भर मुस्कुरा दें। उम्मीद ही कर सकते हैं कि आगे ये आपसी कड़वाहटें थोड़ी कम होकर रिश्तें सुधरेंगे। बाकी तो जो है सो है ही प्यारे।

मंगलवार, 25 नवंबर 2014

बग्घी पर सवार समाजवाद

चित्र साभारः गूगल
बबुआ, धीरे-धीरे आने वाले समाजवाद के दिन लद चुके। अबकी समाजवाद विक्टोरियाई शैली की बग्घी पर सवार होकर आया है। बग्घी पर समाजवाद पूरी शान, पूरी ताकत के साथ आया है। और, क्यों न आए? जमाने में जब वक्त के साथ सबकुछ अदल-बदल रहा तो क्या समाजवाद नहीं बदलेगा? अमां, कब तलक समाजवाद बैलगाड़ी या रिक्शे की सवारी करता रहेगा? समजावाद ने खुद को लैपटॉप से लेकर मेट्रो ट्रेन तक खूब बदला है। न न अब इस मुद्दे पर बहस बे-मानी है कि बदले हुए इस समाजवाद ने समाज या जनता का कित्ता भला किया? ऐसी बहसों में समाजवादियों का मन नहीं लगता।

बग्घी पर सवार होकर आए समाजवाद को 'सामंती' कतई न कहें। यह हमारे नेताजी के 75 के होने का 'सुअवसर' था। 75 का होना और इत्ते सालों तलक समाजवाद को देश-समाज के भीतर जिंदा (!) रखना, कोई 'मजाक' थोड़े था प्यारे। लोग बाग जाने कहां-कहां जाकर अपना बर्थ डे मानते हैं। मगर नेताजी ने तो इसे हमारे (जनता के) बीच बग्घी पर सवार होकर मनाया। 75 फुट लंबा केक भी काटा। और, बर्ड डे को नाम दिया- 'समता दिवस'। यानी, नेताजी बर्ड डे पर भी समता, समानता और जनता को न भूले! बड़ी बात।

अब कहने वाले नेताजी के बर्ड डे को लेकर कुछ भी कहते रहें। यहां कौन-सा समाजवाद या समाजवादी की सेहत पर कोई 'फर्क' पड़ रहा है। जब बड़ा पेड़ हिलता है, तो कुछ अवाज तो होती ही है। और फिर बबुआ यह समाजवाद है समाजवाद। समाजवादी राज में जो कुछ भी किया जाता है जनता के हितों और समाजवाद को मजबूती देने के लिए ही किया जाता है। बग्घी पर आए इस समाजवाद को जनता के हित में ही देखा-समझा जाना चाहिए!

जनता के पैसे का इससे बेहतर 'समाजवादी इस्तेमाल', मुझे नहीं लगता, दूसरा कुछ होगा! नेताजी केवल समाजवाद के नेता थोड़े ही हैं, जनता के भी तो नेता हैं। तो क्या जनता का मन नहीं करता, अपने प्रिय नेताजी के तईं थोड़ा-बहुत खर्च करने का। सो, 'समता दिवस' (बर्ड डे) के बहाने कर दिया। समाजवाद को मजबूती देने में जनता का बहुत बड़ा हाथ रहा है। बग्घी पर सवार होकर नेताजी ने सबको यह बता-दिखा दिया है।

मुझे पक्का विश्वास है कि बग्घी पर सवार समाजवाद को देखकर लोहिया की 'आत्मा' जरूर 'निहाल' हुई होगी! मन में एक दफा सोचा जरूर होगा कि काश! ऐसा समाजवाद हमारे समय में आ पाता। लेकिन लोहिया ने दूसरे ही पल संतोष कर लिया होगा- तब के समाजवाद और अब के समाजवाद में वक्त के साथ बदलाव तो आएगा ही। अब जो है वो बस यही है।

लोहिया के दौर को बीतते साफ देख पा रहा हूं। यह दौर एक नए समाजवाद का है। जोकि बग्घी पर सवार होकर आता है और बर्ड डे भी सेलिब्रेट करता है। जय हो समाजवाद की।

रविवार, 23 नवंबर 2014

संकट में बाबा लोग

चित्र साभारः गूगल
पहले बाबा आसाराम अब बाबा रामपाल। एक-एक कर हमारे देश के बाबा लोग अगर यों ही अंदर होते रहे तो संपूर्ण बाबा-बिरादरी पर 'संकट के बादल' गहरा जाएंगे! सबकुछ 'तहस-नहस' हो जाएगा। सनातनी परंपरा बिन बाबा लोगों के 'बेसहारा' हो जाएगी। धर्म का क्या होगा? भक्त लोग किस बाबा के दरबार अपना और अपने कष्टों का निवारण करवाने को जाएंगे।

कभी सपने में भी न सोचा था कि बाबा लोगों का ऐसी 'दुर्गत' होगी। आलिशान आश्रमों में रहने वाले बाबा लोग जेल की काल-कोठरी में रहेंगे। भक्त-समाज को उसके कष्टों से मुक्ति दिलाने वाले बाबा लोग आज खुद ही कष्ट में हैं। जेल के भीतर खड़े इत्ते बेचारे नजर आ रहे हैं- मानो कोई 'शातिर अपराधी' खड़ा हो। ऐसे में तो ध्यान लगाने पर भी आंखें बंद न होती होंगी उनकी।

निश्चित ही यह बाबा लोगों की इज्जत पर संकट का समय है। ताज्जुब है, संकट के इस समय में उनका ईश्वर भी कोई चमत्कार-वमत्कार नहीं दिखा रहा। जिस ईश्वर की किरपा की खातिर बाबा लोगों ने अपनी इत्ता बड़ी सल्तनत खड़ी की। देश से लेकर विदेश तक में इत्ते सारे भक्त-चेले बनाए। इत्ती जमीन और धन अर्जित किया। राजनीति और नेताओं के बीच पक्की सांठ-गांठ स्थापित की। इत्ता सब करने के बाद भी ईश्वर बाबा लोगों के संकट में उनके साथ नहीं है। हद है। फिर काहे की बाबागिरी और काहे की ईश्वर-भक्ति?

यह सही है कि अब बाबा लोग पहले जमाने जैसे न रहे। काफी बदल गए हैं। आराम-तलबी और एय्याशी बाबागिरी के साथ-साथ चलती रहती है। तो क्या हुआ...। जमाना बदला, वक्त बदला तो क्या बाबा लोग नहीं बदलेंगे? बाबा लोगों के रहन-सहन का इस्टाइल न बदलेगा। आखिर बाबा लोगों का भी तो मन करता ही होगा भौतिक एवं सामाजिक सुखों को भोगने का। बाबागिरी तो पूरे जनम का खेला है ही। ऐसे में अगर बाबा लोग कुछ संपत्ति या अपने आश्रम को महलनुमा बना लेते हैं, तो क्या गलत करते हैं। यह सब उनके भक्तों का ही तो दिया होता है। दुकान चलाने के लिए संसाधनों की जरूरत तो पड़ती ही है। क्या नहीं...।

बेचारे रामपाल की अच्छी-खास चलती दुकान को पलभर में जमींदोज करवा दिया। आलिशान आश्रम को कबाड़ बना दिया। भक्तों को निकाल बाहर किया। और, संत रामपाल को सलाखों के पीछे खड़ा कर दिया। सलाखों के पीछे खड़े रामपाल किसी हारे हुए जुआरी से कम न लग रहे थे। देखते ही देखते दुकान भी गई और संतई भी। मिला क्या... जेल की हवा और चक्की का आटा।

यही समय है बाबा लोगों के एकजुट होने का। सरकार के साथ-साथ बाबा-विरोधियों का 'प्रतिकार' करने का। तलाब में अगर एक मछली गंदी निकल आई इसका मतलब यह थोड़े है कि पूरा तलाब ही 'अपवित्र' हो गया। यों भी, गलतियां किससे नहीं होतीं। कभी-कभी बाबा लोग भी गलतियां कर बैठते हैं। लेकिन दुकानदारी तो बंद नहीं होनी चाहिए न। अगर बाबागिरी की दुकान बंद हो गई तो अंध-भक्त श्रद्धालु लोग कहां जाएंगे? मेहनत की कमाई (!) किसको दान करेंगे? किसके आगे दंडवत्त हो आर्शीर्वाद लेंगे।

बाबा लोगों की पीड़ा मुझसे देखी नहीं जाती। इत्ती मेहनत करके तो बाबा बने। अब जब बाबागिरी की दुकान चलाने का समय आया तो धरकर अंदर कर दिया। ऐसे ही अगर चलता रहा तो एक दिन हमारे देश में बाबा लोग ढूंढें से न मिलेंगे। फिर मंदिरों और मठों का क्या होगा? ईश्वर भी अकेले पड़ जाएंगे तब तो।

मेरी चिंता को यों हलके में न लें। केस को समझें। बाबा लोगों के दम पर ही हमारी सभ्यता-संस्कृति और धर्म की बुनियाद टिकी है। बाबा लोगों पर आया संकट समूची बाबा-बिरादरी के तईं खतरे की घंटी है। दुआ करें, यह घंटी अधिक तेज न हो। बाकी तो जो है सो है ही।

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

काले धन का रूतबा

चित्र साभारः गूगल
काले धन ने अपना क्या 'रूतबा' गांठा है। आज हर किसी की जुबान पर बस काले धन के ही चर्चे हैं। चाहे किसी के पास हो या न हो लेकिन 'चाहत' यही है कि थोड़ा काला धन हमारे पास भी होना चाहिए था! काला धन पास होता तो सरकार से लेकर मीडिया तक में नाम के चर्चे होते। चार लोग एक-दूसरे को जानते। न केवल देश बल्कि विदेशी अखबारों में भी मय सेल्फी नाम छपता।

न जी न अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस मामले में किस तरह से 'बदनाम' हो रहे हैं। बदनामी बंदों के लिए अब 'सेकेंडरी' चीज हो गई है। मतलब तो नाम होने से है। चाहे काला धन रखने पर हो या कोयला। तरह-तरह के घपलों-घोटालों में अब तलक न जाने कित्तों के नाम सामने आए हैं, कुछ तो जेल की हवा भी खा आए हैं लेकिन मजाल है उनके चेहरों पर किसी ने 'शिकन' तक देखी हो। या उन्हें अपनी बदनामी का अहसास भी हुआ हो। चाहे जेल जाकर ही सही पर नाम तो हुआ न। अब नाम होना बदनाम होने से कहीं ज्यादा जरूरी है प्यारे।

देखिए न, कित्ता हंगामा मच रहा है काले धन पर। तमाम तरह की चीजें-बातें एक-एक कर सामने आ रही हैं। काला धन रखने वालों के कुछ नाम भी सामने आए हैं। समाज के ईमानदार लोग उन पर 'लानत' भेज रहे हैं। मगर क्या उनकी 'सेहत' पर कोई असर पड़ा? क्या उनके चेहरे बुझे हुए से दिखे? क्या उन्हें अपने करेक्टर की चिंता हुई? नहीं न। तो फिर हम-आप क्यों परेशान हैं कि हाय! उनके कने काला धन है। हाय! उनके पास नंबर दो की कमाई है।

सच यह है कि अब कोई अपनी बदनामी पर 'शर्मसार' नहीं होता। बदनामी अब 'उच्च-चरित्र' का 'प्रमाणपत्र' बन गई है। बेशक आपके कने काला धन हो या आपकी करतूतें काली हों- समाज में 'इज्जत' आपकी वैसी ही बनी रहेगी। यहां आपसे आपकी बदनामी का सबब पूछने कोई नहीं आएगा। क्योंकि लोगों कने इत्ता समय ही कहां है, जो बेफालतू के कामों में अपना कीमती समय खोटी करें।

यह तो सिर्फ काला धन है समाज में अपने रूतबे की ठसक बरकरार रखने के लिए इंसान क्या-क्या नहीं करता। रूतबा गांठने के लिए वो अपने घर का कूड़ा पड़ोसी के दरवाजे पर डालने तक में शर्म महसूस नहीं करता। चाहे विधायक या सभासद ही क्यों न हो- रूतबा गांठने के लिए उसे अपनी गाड़ी की नेमप्लेट पर लिखना कभी नहीं भूलता।

प्यारे, पूरी दुनिया ही रूतबे के जलवे के बल पर चल रही है। रूतबा चाहे काला धन रखकर बने या काला जादू चलाकर कौन 'परवाह' करता है यहां?

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

अजी, भगवान रोहित शर्मा बोलिए

चित्र साभारः गूगल
बस मौका मिलना चाहिए हम तुरंत अपने 'भगवान' गढ़ लेते हैं। भगवान गढ़ने के लिए हमें ज्यादा सोचना-समझना नहीं पड़ता। जहां बाजार का रूख और दीवानों की चाहत होती है, उसी में से एक भगवान निकल आता है। फिर जमकर भगवान को दोनों तरफ से भुनाया जाता है। मीडिया से लेकर विज्ञापन जगत तक में भगवान की पूछ होती है।

अभी तलक हमारे कने सचिन तेंदूलकर नाम के भगवान हुआ करते थे। कुछ समय विराट कोहली में भी भगवान का अक्स देखा गया। लेकिन श्रीलंका के खिलाफ 264 रन की 'चमकदार' पारी खेलकर अब हमें रोहित शर्मा के रूप में एक 'नया भगवान' मिला है। आइए, हम सब क्रिकेट के इस नए भगवान का स्वागत-सत्कार करें।

सही है न, कुछ दिन रोहित शर्मा को भी 'आनंद' ले लेने दीजिए अपने भगवान सरीखा होने का। कुछ दिन मीडिया को रोहित शर्मा के बहाने अपनी टीआरपी बढ़ाने और बाजार व विज्ञापन जगत को अपने नए ब्रांड हीरो से नोट कमा लेने दीजिए। क्या हर्ज है। बाजार का सीधा-सा फंडा है, जो चमकता है वो ही बिकता है।

रोहित शर्मा ने श्रीलंका के खिलाफ 264 रन ही नहीं बनाए बल्कि अपनी तरक्की, अपने मजबूत पैर जमाने के तमाम रास्ते खोले दिए हैं। देखते रहिए, अब रोहित शर्मा की पहचान एक क्रिकेटर के रूप में कम विज्ञापन के एंटरटेनर के रूप में ज्यादा होगी। क्योंकि हमारी टीम इंडिया के खिलाड़ियों का यह गुडलक रहा है कि वे अच्छी परफारमेंस देने के बाद तुरंत किसी न किसी कंपनी के ब्रांड या विज्ञापन जगत के हीरो हो-बन जाते हैं। यह परंपरा सचिन से लेकर विराट कोहली तक कायम है।

जबकि अन्य खेलों में खिलाड़ी कित्ता ही जोर क्यों न लगा ले उसे केवल जरूरत के मुताबिक ही पूछा या समझा जाता है। कुछ इनाम-इकराम देकर उस खिलाड़ी से किनारा कर लिया जाता है।

किंतु क्रिकेट के खिलाड़ी होने का अपना अलग ही सुख है। यहां एक अच्छी पारी में ही बंदा भगवान और बुरी पारी में खाक में मिला दिया जाता है। बेचारे अपने वीरेंद्र सहवाग को ही देख लो। आज सहवाग न बाजार में है न विज्ञापन में। मगर सचिन रिटायर्ड होने के बाद भी दोनों जगह डटे हुए हैं। भगवान होने का फायदा।

बहुत संभव है कि अब कुछ रोहित शर्मा जैसा बनना चाहते चाहेंगे। उनके जैसा खेलना चाहेंगे। क्यों न हो, आखिर रोहित शर्मा ने वन डे में 264 रन जो ठोके हैं। जो ठुकाई करेगा उसे पूजा जाएगा। यही क्रिकेट की चाहत का रूल है प्यारे।

चलो खैर रोहित अभी तुम कुछ दिन खुद में भगवान होने जैसा फील करो। हमने तुम्हें भगवान जैसा मान लिया है। तुम्हारी असली किस्मत तो अभी बाजार और विज्ञापनों की चकाचौंध से चमकने वाली है। हम क्रिकेट के गढ़े हुए भगवानों को प्रायः ऐसे ही सिर पर बैठाते हैं।

अगर सरकार न होती तो जनता भी कहां होती!

चित्र साभारः गूगल
भला ऐसी कौन-सी सरकार होगी जो जनता की चिंता न करती हो? दिन-रात जनता की फिक्र में न लगी रहती हो? जनता के जागने से पहले न जागती और जनता के सोने से पहले न सोती हो? जनता की तरक्की पहले अपने हित बाद में देखती हो?

जी हां, यकीन कीजिए, बरसों से हम ऐसी शालीन-सुशील सरकारों के बीच ही तो रहते चले आए हैं! न जी मैं झूठ नहीं सौ टका सच बोल रहा हूं। सरकार है तो जनता हैं। वरना, जनता को कौन पूछता है?

खैर जाने दीजिए पिछली सरकार ने जो किया सो किया। वैसे इत्ता बुरा भी न किया! ठीक है.. कुछ घपले-घोटाले अवश्य किए पर बदले में मनरेगा, आधार, आरटीआइ आदि भी तो दिया। यों, कमियां किस सरकार या नेता में नहीं होतीं। जनता का फर्ज है, सरकार और नेता लोगों की कमियों पर परर्दा डाल केवल अपने काम से मतलब रखना। भई, मैं तो यही करता हूं। अपनी इज्जत के माफिक ही सरकार को इज्जत देता हूं। आखिर सरकार मेरी माई-बाप जो ठहरी।

अब वर्तमान सरकार को ही लीजिए। क्या 'चकाचक' सरकार (अ-भक्तों से माफी साहित) है। पहले दिन से ही- प्रधानमंत्री के साथ- सिर्फ और सिर्फ जनता के भले में जुट गई है। गजब यह है कि सरकार से कहीं ज्यादा, जनता के प्रति फिकरमंद, प्रधानमंत्री हैं। पहले दिन उन्होंने संसद की सीढ़ियों पर मत्था क्या टेका जनता उनकी 'मुरीद' हो गई। न केवल अपनी बल्कि विदेशी घरती पर भी अपनी छवि की धाक जमा आए। आजकल जिधर देखो उधर बस प्रधानमंत्री के ही चर्चे हैं। अब सरकार से ज्यादा महत्त्वपूर्ण प्रधानमंत्री हो गए हैं। इससे भक्त लोग भी खासा खुश हैं।

मगर फिर भी सरकार जनता के तईं अपना काम निरंतर कर रही है। चुनावों में किए गए वायदों को भिन्न-भिन्न तरीकों-तकनीकों के माध्यम से पूरा करने की कोशिशों में लगी है। न न 'हंसिए' मत। खुली आंखों से देखिए सरकार के कामों को।

प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किया गया सफाई अभियान ही देख लीजिए। सोशल नेटवर्क के साथ-साथ पब्लिक डोमेन में भी कित्ता हिट जा रहा है। टीवी और अखबार में सेल्फियों के साथ कित्ते ही बड़े-बड़े नेता-सेलिब्रिटी-बिजनेसमैन झाड़ू लिए देखने को मिल रहे हैं। गली-मोहल्लों तक में हर कोई झाड़ू थामे सेल्फियों के साथ सफाई करने-करवाने में जुटा है। सबका एक ही उद्देश्य है- सड़क और घर-बाहर को गंदगी-कचरा मुक्त रखना। अभियान को झाड़ू और सेल्फी के साथ 'प्रमोट' किया जा रहा है। यह बड़ी बात है प्यारे।

जन-धन योजना में भी सरकार की मंशा जनता-हित ही तो है। सरकार चाहती है कि हर किसी का बैंक में अकाउंट हो। अपनी कमाई बैंक में रखे। आड़े-टेढ़े वक्त में बैंक की सहायता ले। इसीलिए उसने गरीबों को भी बीमा की सुविधा दी है। ताकि मरने पर परिवार को कोई 'आर्थिक-गम' न हो। अब इसे सरकार का जनता के प्रति मोह या हित न कहें तो और क्या कहेंगे।

काले धन पर सरकार ने जनता से किया वायदा निभाया। चक्करबाजी में उसे कोर्ट की करारी फटकार तक सहनी पड़ी। लेकिन काला धन वापस लाना है तो लाना है। खुद प्रधानमंत्री भी बोल चुके हैं कि पाई-पाई काला धन लाकर ही चैन की सांस लेंगे। अब इससे ज्यादा सरकार और क्या करे।

सरकार ने सबसे बड़ा चमत्कार महंगाई दर में कमी करके किया है। हमें 'सस्ताई के युग' में लाकर खड़ा कर दिया। खबरिया चैनल वाले और अखबार बता रहे हैं कि यहां-वहां महंगाई कम हुई है। मसलन, सोना-चांदी सस्ता हुआ है। कच्चा तेल सस्ता हुआ है। स्मार्टफोन सस्ते हुए हैं। कंप्यूटर से लेकर साड़ी-चप्पल तक सस्ती हुई है। दूध-आटा-दाल-तरकारी-मकान भी शायद जल्द ही सस्ते होगें। चिंता न करें, सरकार प्रयासरत है। सेंसेक्स में बनी भीषण तेजी हमें एक नए 'गुलाबी आर्थिक युग' में ले जाएगी। सेंसेक्स की बढ़त पर दलाल पथ से लेकर दलालों तक के चेहरे खिले हुए हैं। बेतरतीब पैसा आ रहा है। हम सरकार के कारण ही आर्थिक स्तर पर मजबूती पा रहे हैं।

इत्ता सब सरकार जनता के लिए ही तो कर रही है। सरकार है इसीलिए तो जनता का अपना वजूद है! क्या नहीं...। 

बुधवार, 19 नवंबर 2014

28 हजारी सेंसेक्स

चित्र साभारः गूगल
दलाल पथ पर घी के दीए जलाइए। मिठाइयां बांटिए। जश्न मनाइए। आतिशबाजी छोड़िए। क्योंकि... हमारा प्यारा सेंसेक्स 28 हजारी हुआ है। स्टॉक मार्केट में 2008 के बाद फिर से तेजी का माहौल बनने लगा है। लोगों के चेहरों पर पड़ी हताशा की धूल छंटने लगी है। लंबे समय बाद अर्थव्यवस्था में 'गुलाबी सुधार' के 'अच्छे दिन' दिखना शुरू हुए हैं। महंगाई ने अपने तेवर ढीले किए हैं। घर का बजट भी अब संभलने लगा है।

सेंसेक्स को यों 'मुस्कुराते मूड' में देखना कित्ता सुखद प्रतीत होता है, यह कोई मुझसे पूछे। पिछली काले दिनों को बिसरा सेंसेक्स अपनी गति बढ़ता ही चला जा रहा है। सेंसेक्स में खुद को संवारने का जित्ता साहस दिखता है, उत्ता तो हम इंसानों में नहीं होता। एक लिमिट के बाद हम इंसान भी 'डू' बोल देते हैं मगर सेंसेक्स का न केवल खुद से बल्कि बिगड़ैल आर्थिक परिस्थितियों से भी संघर्ष करना जारी रहता है। यह लगातार संघर्ष करते रहने का ही परिणाम है कि आज हमारा सेंसेक्स 28 हजार के शिखर पर है। अमेरिकी और यूरोपिए बाजारों से खासा आगे।

पेट्रोल-डीजल के दामों का लगातार कम होना और महंगाई दर का लुढ़ना, साफ बताता है, कि सेंसेक्स में बनी तेजी कित्ता असर जमा रही है। हर ओर से हमारे सेंसेक्स की शान में तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही है। मौहल्ले के नुक्कड़ से लेकर चौकी चौराहे तलक हर किसी की जुबान पर बस सेंसेक्स के ही चर्चें हैं। लोग बाग सेंसेक्स की तेजी में अब अपना 'भविष्य' देखने लगे हैं। जिन दीवानों ने अभी तलक शेयर बाजार में अपनी पूंजी को डूबोया ही डूबोया था, अब कमाई के फंडे तैयार करने में जुटे हैं।

देखा दुनिया वालों ऐसे आते हैं 'अच्छे दिन'! अब तो मानोगे न, प्रधानमंत्री का अच्छे दिनों का नारा कोरी हवाबाजी नहीं था। जब पूरी दुनिया प्रधानमंत्री के काम को मान रहिए तो क्या हमारा सेंसेक्स न मानेगा! सेंसेक्स की अच्छी चाल हमेशा अच्छे कामों पर ही निर्भर रही है। सेंसेक्स जब चलता है तभी अर्थव्यवस्था का इंजन भी दौड़ता है। अर्थव्यवस्था के इंजन के दौड़ने में ही आम आदमी की तरक्की के रास्ते खुलते हैं।

कोई शक नहीं कि सेंसेक्स को सरकार का मूड भा गया है। सेंसेक्स की सरकार के साथ जुगलबंदी निभने लगी है। तो अच्छा ही है न। इत्ते सालों बाद सेंसेक्स को सरकार के रूप में एक 'सहारा' मिला है, जिसे वो अपना कह सकता है। वरना पिछली सरकार ने तो बेचारे सेंसेक्स की कमर ही तोड़कर रख दी थी। सेंसेक्स न इधर का रहा था न उधर का। दुनिया भर में भद्द पिटी थी सो अलग।

टूटी कमर को फिर से सीधा करने में सेंसेक्स ने सात साल का समय जरूर लिया पर अंततः करके दिखा ही दिया। एक ही झटके में मंदड़ियों को ऐसा ध्वस्त किया कि अब बाजार में नजर ही नहीं आते। बुल-बियर की दौड़ में फिर से बुल आगे निकल गया। बेचारा बियर अपनी किस्मत पर रो रहा है कि हाय! मैं बियर क्यों हुआ।

गुजरे समय और खराब वक्त पर खाक डालते हुए यह समय सेंसेक्स के 28 हजारी होने पर 'सेलिब्रेट' करने का है। नई-नई उम्मीदें बांधने का है। अर्थव्यवस्था की गुलाबियत बरकार रहे, यह 'दुआएं' मांगने का है। सेंसेक्स के सहारे आम आदमी के चेहर पर बनी हंसी पर कुर्बान जाने का है। काली अंधेरी कोठरी में से उजले सवेरे की किरणें देखने-दिखाने का। उत्साह जगाने और उमंगें पैदा करने का। यह सब सिर्फ और सिर्फ प्यारे सेंसेक्स के ही तो कारण है।

बाजार में हमारे सेंसेक्स की 'बादशाहत' यों ही बरकरार रहे। बस यही दुआ है।

बुधवार, 12 नवंबर 2014

अच्छे दिनों में सेंसेक्स

चित्र साभारः गूगल
बहुत देख लिए प्यारे सेंसेक्स ने बुरे दिन अब 'अच्छे दिन' देखने का समय है। शिखर पर पहुंचकर इठलाता हुआ सेंसेक्स एक अलग ही फीलिंग दे रहा है। यह फीलिंग अर्थव्यवस्था को गुलाबी रंगत दे रही है। सेंसेक्स के सुर में अर्थव्यवस्था ने अपना भी सुर मिला लिया है। तब ही तो पेट्रोल-डीजल से लेकर महंगाई तक में अच्छे दिन आना शुरू हो चुके हैं। चलो आम आदमी के सिर का कुछ तो बोझ कम हुआ।

मुझे अपने से ज्यादा सेंसेक्स को 'खुश' देखना अच्छा लगता है। सेंसेक्स की खुशी पर ही तो अर्थव्यवस्था की बुनियाद टिकी है। सेंसेक्स जब सरपट-सरपट भागता है तो अर्थव्यवस्था भी उसी गति से भागती है। सरकार भी राहत की सांस लेती है। आम आदमी को महंगाई कम होने से 'सुकून' मिलता है। घर का बजट संभलता। पत्नी के चेहरे पर चमक बढ़ती और किचन की रंगत बदलती है। लोन-शोन का भार भी कुछ कम होता है। नौकरी के तमाम रास्ते खुलते हैं। यह सब प्यारे सेंसेक्स की 'किरपा' का ही तो 'चमत्कार' है।

अब आप लोगों से क्या छिपाना, मैंने तो अपने कमरे में सेंसेक्स महाराज की मूर्ति ही स्थापित कर ली है। दिन में दो टाइम सेंसेक्स महाराज की 'आरती' किया करता हूं। बस यही दुआ मांगता हूं कि हे! प्यारे सेंसेक्स महाराज अब हमेशा अच्छे दिनों में ही रहना। कभी अपना मूड न बिगाड़ना। मुझे और मेरे देश की अर्थव्यवस्था पर अपनी किरपा बनाए रखना। तुम ही हमारा 'वर्तमान' और तुम ही 'भविष्य' हो।

पूरी दुनिया को मैं यह बतला देना चाहता हूं कि हां, मेरी 'संपूर्ण आस्था' सेंसेक्स में है। इसका मुझे 'गर्व' है।

सेंसेक्स की सबसे बड़ी खूबी उसका खुद पर कतई 'घमंड' न करना है। सेंसेक्स एकदम 'कूल मूड' में रहता है। सोना-चांदी-डॉलर की तरह हर वक्त घमंड में नहीं दिखता। हर वक्त घमंड में रहने वालों का 'हश्र' देख लीजिए न आज 'औंधे मुंह' पड़े हैं। न कोई पूछ रहा है न खरीद रहा। सोने-चांदी की फितरत पर कुर्बान रहने वाला वर्ग अब सेंसेक्स की ओर हसरत भरी निगाहों से देख रहा है। मुझे पक्की उम्मीद है, सेंसेक्स उन्हें 'निराश' नहीं करेगा।

अच्छे दिनों के बीच सेंसेक्स की किरपा हम पर ऐसे ही बनी रहे। शेयर बाजार दिन दूनी रात चौगनी तरक्की करता रहे। अर्थव्यवस्था के साथ-साथ आम आदमी के चेहरों पर गुलाबियत कायम रहे। इसके अतिरिक्त हमें और क्या चाहिए! सेंसेक्स बढ़ेगा तो हम सब भी बढ़ेंगे। है कि नहीं...।

सोमवार, 10 नवंबर 2014

पत्नी और आत्मकथा

चित्र साभारः गूगल
जिंदगी में मैंने कभी 'कथा' नहीं लिखी, 'आत्मकथा' क्या लिख पाऊंगा? लेकिन पत्नी का हुकम है- मैं आत्मकथा लिखूं। वो भी अंगरेजी में। आत्मकथा की मार्केटिंग चेतन भगत स्टाइल में करूं। आत्मकथा का विमोचन सचिन तेंदुलकर स्टाइल में।

पत्नी को कित्ती ही दफा प्यार से समझा चुका हूं- आत्मकथा लिखना मेरे बस की बात नहीं। न ही मेरे जीवन में ऐसा कुछ घटा है, जिसे आत्मकथा में दर्ज करवा सकूं। अरे, आत्मकथा तो वे लोग लिखते हैं जिनके जीवन में तमाम तरह के प्रसंग, किस्म-किस्म के संघर्ष, तरह-तरह के अनुभव होते हैं। या फिर वे लिखते हैं, जिन्हें महसूस होने लगता है कि बस जीवन और लेखन का यही 'दी ऐंड' है, अब आत्मकथा लिख ली जाए।

किंतु प्रियवर, मेरे साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं है। मैंने आत्मकथा के लायक न जीवन जिया है न ही लेखन में ऐसा कोई बड़ा तीर मारा है। वो तो 'संपादकों के रहम' और 'भगवान की किरपा' के भरोसे मेरे लेखन की गाड़ी चल रही है। वरना, मेरी औकात तो लेखन का 'ल' लिखने तक की नहीं।
और, तुम कहती हो, मैं अंगरेजी में आत्मकथा लिखूं। अंगरेजी और मैं...। क्या तुम्हें पता नहीं कि बेटी की स्कूल डायरी में तुम्हारे नाम की स्पेलिंग तुमसे पूछकर लिखता हूं? क्या तुम्हें पता नहीं कि मोहल्ले की सोसाइटी-मीटिंग में मैं सिर्फ इसलिए नहीं जाता कि वहां सब अंगरेजी में टॉक-शॉक करते हैं? क्या तुम्हें पता नहीं कि मैं अक्सर अपने नाम की स्पेलिंग भी भूल जाया करता हूं? क्या तुम्हें पता नहीं कि मैं अंगरेजी फिल्में वॉल्यूम बंद करके देखता हूं? क्या तुम्हें यह भी नहीं पता कि हमारी शादी के कार्ड में मेरी बेअक्ली के कारण तुम्हारे पिताजी के नाम की स्पेलिंग गलत छप गई थी? तब कित्ता हंगामा हुआ था बिरादरी में। सबने कहा था, दामाद बाबू का हाथ अंगरेजी में कित्ता तंग है। इत्ते पर भी तुम कहती हो कि मैं आत्मकथा जैसी 'ऊंची चीज' अंगरेजी में लिखूं। यार, क्यों लेखक बिरादरी के बीच मेरी भद्द पिटवाने पर तुली हुई हो। कुछ तो रहम करो मेरी रेप्यूटेशन पर।

मेरे इत्ता समझाने का पत्नी पर कोई असर न था। उसका एक ही हुकम है- मैं आत्मकथा लिखूं केवल अंगरेजी में।

उसने फिर से अपनी टोन में मुझे हड़काया- तुम न केवल शक्ल बल्कि अक्ल से भी हिंदी के ही लेखक नजर आते हो। जरा दिमाग लगाया करो। अगर अंगरेजी नहीं आती तो 'ट्रांसलेट' करवा लो। मैंने कब कहा- आत्मकथा में अपने जीवन या संघर्ष का चिट्ठा खोलकर रख दो। आत्मकथा में अपने लेखन के सबसे विवादस्पद (कंट्रोवशल) हिस्से को लिखो। कब, कहां, किस संपादक, लेखक, साहित्यकार, पाठक से तुम्हारी झड़पें हुईं। किस नुक्कड़ या चौराहे पर तुमको तुम्हारे लेखक साथियों द्वारा हड़काया गया। किन-किन लोगों ने तुम्हारी हूटिंग-बूटिंग की। किस प्रकाशक ने तुम्हारी किताब को छापने से मना कर दिया। किसने तुम्हारी रॉयल्टी का पैसा हजम कर लिया। किस समीक्षक या आलोचक ने तुम्हारे संपूर्ण लेखन को कूड़ा-करकट करार दिया। मतलब, आत्मकथा में कुछ ऐसा 'सनसनीखेज' हो जिसकी खबर बने। रातों-रात विवादों के सहारे तुम स्टारर लेखन पहचाने जाने लगो।

प्यारे पतिदेव, 'कंट्रोवर्सी' ही लेखक को 'ऊंचा' और 'महान' बनाती है। देख लो, सचिन को। एक आत्मकथा के दम पर ही सचिन ने हिंदी-अंगरेजी के बड़े से बड़े लिक्खाड़ लेखकों को पछाड़ दिया है। अपनी किताब की ऐसी मार्केटिंग की- आज हर तरफ सचिन ही सचिन है। सचिन खिलाड़ी होकर भी आज लेखक के रूप में जाना-पहचाना जा रहा है। वही हाल चेतन भगत का है। 'हाफ गर्लफ्रेंड' लेखन जगत में तहलका मचाए हुए है। इन लेखकों के हिसाब से अपना लेखन तय करो।

और हां एक बात कान खोलकर अच्छी तरह से सुन लो- आत्मकथा तो तुम्हें लिखनी ही पड़ेगी (अंगरेजी) में। वरना, तलाक से नीचे अब बात न होगी। समझे।

लेखक होने की इत्ती बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ेगी प्यारे कभी सोचा न था।

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

दांतों की फिक्र में...

चित्र साभारः गूगल
दंत्त-डॉक्टर ने मुझे चेताया है- 'मेरे दांतों पर पान-मसाले का 'पीलापन' लगातार बढ़ता जा रहा है। दांत देखने में भद्दे और चेहरा उजड़ा सा लगने लगा है। अगर दांतों पर गंदगी यों ही बढ़ती गई तो धीरे-धीरे कर मैदान साफ हो लेगा। फिर मैं कहीं का भी नहीं रहूंगा।'

दंत्त-डॉक्टर की चेतावनी के बाद से दांतों के प्रति मेरी 'फिक्र' बढ़ गई है। मैं रात-दिन दांतों के 'भविष्य' के बारे में सोचने लगा हूं। मेरा अत्याधिक सोचना मुझे धीरे-धीरे कर 'डिप्रेशन' की ओर धकेल रहा है। मुझे दांतों पर पड़े पीलेपन की इत्ती फिक्र नहीं है, जित्ती कि झड़ने की। मैं दांत ही क्या, किसी भी प्रकार के झड़ने-झगड़ने से घबराता हूं।

दांतों के प्रति मेरी फिक्र तब और दोगुनी हो जाती है, जब मैं मेरे मोहल्ले के पोपलों को देखता हूं। भाग्य या दुर्भाग्य से- मेरे मोहल्ले में जित्ते पोपले हैं, उत्ते ही गंजे भी। बिन चारे पोपलों को जुगाली भरते और बिन बाल गांजों को खोपड़ी पर हाथ फेरते जब देखता हूं, तो वीपी यकायक 'लो' हो जाता है। मुझे अजीब-अजीब से ख्याल आने लगते हैं। उनमें खुद को देखना शुरू कर देता हूं।

अभी मेरी उम्र ही क्या है? और अभी से दांतों की जुदाई, बर्दाशत से बाहर है प्यारे। इसीलिए मैंने मोहल्ले के पोपलों और गंजों के बीच उठना-बैठना 'न' के बराबर कर दिया है। कभी कहीं किसी पोपले ने मेरे दांतों के बाबत पूछ ही लिया तो...।

मैं बार कोशिश कर चुका हूं पान-मसाले से छूटकारा पाने की। लेकिन ससुरा छूटता ही नहीं। जिस दिन न खाओ, ऐसा लगता है, कोई बेहद 'महत्त्वपूर्ण चीज' खाने-चबाने से रह गई। मैं जानता हूं, मेरे किए की सजा, मेरे दांत भुगत रहे हैं। लेकिन आदत तो आदत है, क्या कीजिएगा। एकाध दफा तो मैं पल्ले मोहल्ले के झाड़-फूंक विशेषज्ञ कने भी जा चुका हूं मगर उससे भी कुछ हासिल नहीं हुआ। घर-परिवार में मजाक और बनने लगी कि मैं झाड़-फूंक में यकीन करता हूं। अब उन्हें क्या समझाऊं, जब पड़ती है तो इंसान सब में यकीन करने लग जाता है।

फिर सोचता हूं, मुझे ले-देके मात्र एक ही तो शौक है- पान-मसाले का। और दांतों की फिक्र में उसे भी छोड़ दूं! कल को ऊपर वाले को क्या मुंह दिखाऊंगा! कहीं उसने मुझसे मेरे 'प्रिय शौक' के बारे में पूछ लिया तो... क्या मना कर दूंगा, मेरा कोई शौक नहीं! तब कित्ती 'भद्द' पिटेगी मेरी उसके सामने।

लेकिन दूसरी तरफ दांतों पर पड़े पीलेपन की फिक्र भी मुझे दुबला किए जा रही है। फिलहाल, उधेड़-बुन में हूं कि दांतों की फिक्र करूं या शौक को जिंदा रखूं। अगर आप राय दे सकें तो बेहतर होगा। इंतजार में...।

बुधवार, 5 नवंबर 2014

'जॉली मूड' में सेंसेक्स

चित्र साभारः गूगल
चढ़ते सेंसेक्स ने केवल दलाल पथ बल्कि अर्थव्यवस्था का मूड भी 'जॉली' बना दिया है। जित्ती रौनक दलाल पथ पर देखने को मिली रही है, उत्ती ही अर्थव्यवस्था में भी। ऊपर से कच्चे तेल का नरम पड़ना और पेट्रोल-डीजल की कीमतों का घटना, साफ बता रहा है कि अब 'अच्छे दिन' आने से कोई माईकालाल नहीं रोक सकता। देखते जाइए, महंगाई अपनी किस्मत पर रोने लायक भी नहीं रहेगी। और, सोने-चांदी के खराब हुए दिमाग जल्द ही ठिकाने आ जाएंगे।

अब दलाल पथ पर जो भी मिलता है बड़े 'जॉली मूड' में दिखता है। हर तरह की आर्थिक फिक्र से बेफिक्र। चेहरे की रंगत गुलाबी और चलने का ढंग नबाबी। बंबई स्टॉक एक्सचेंज की बिल्डिंग को कुछ इस नजाकत से देखता है, मानो बहुत जल्द उसका भी कद इत्ता ही ऊंचा होने वाला है। सेंसेक्स के दम पर दुनिया हमारे कदमों में आने वाली है। क्यों न हो, अब तो अमेरिका भी हमारे सेंसेक्स का 'लोहा' मानने को मजबूर हो गया है।

इसमें कोई शक नहीं कि जब सेंसेक्स का मूड जॉली होता है तो अंदर-बाहर बहुत कुछ बदलता है। सेंसेक्स हमारी अर्थव्यवस्था का 'बूस्टर' है प्यारे। सेंसेक्स की तेज चाल को अब राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तरजीह मिलने लगी है। न केवल हमारे देश बल्कि अन्य देशों के लोग भी हमारी ओर उम्मीद भरी निगाहों से देखने लगे हैं। जाहिर है, उम्मीद रखने से ही किस्मत बदलती है।

लोग ऐसा मानते नहीं पर सेंसेक्स हमेशा हमारा भला सोचता है। अपने लुढ़ने से उसमें नाराजगी रहती है पर उठने की उम्मीद कभी नहीं त्यागता। सेंसेक्स की इसी 'पॉजीटिविटी' का तो मैं कायल हूं। अगर सोच और इरादे पॉजीटिव हैं फिर महंगाई तो क्या दाऊद को भी गिराया जा सकता है। सेंसेक्स ने यह करके दिखला भी दिया है।

आज मेरे भीतर जो 'पॉजीटिविटी' है सब सेंसेक्स के 'जॉली मूड' की ही देन है। सेंसेक्स के मूड से ही मैंने सीखा है, 'कूल' रहना और खामखां के पचड़ों से दूरी बनाए रखना। हां, सेंसेक्स का मूड बिगड़ता तब ही है, जब बेकारण कॉन्ट्रावर्सी पैदा होती है। तब फिर सेंसेक्स को वित्तमंत्रालय तो क्या वित्तमंत्री भी काबू नहीं कर पाते। हर तरफ हाहाकार-सा मच जाता है। कलेजा मुंह को आ जाता है कि हाय! सेंसेक्स ने यह क्या किया।

वैसे सेंसेक्स हमेशा 'जॉली मूड' में रहता है। अच्छे नजीतों पर झूमता है और अच्छी योजनाओं का खुश होकर स्वागत करता है।

हमें सेंसेक्स का यही 'जॉली मूड' तो चाहिए। ताकि बुरे दिन फिर से वापस न लौट सकें।

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

पाई-पाई काला धन!

चित्र साभारः गूगल
अब तो कलेजे में 'ठंडक' पड़ी होगी न। अब तो प्रधानमंत्रीजी ने स्वयं सीना ठोककर कह दिया कि पाई-पाई काला धन लाकर रहेंगे। या अब भी कोई शक-वक बचा है दिल-दिमाग में?

अमां, इत्ते दिनों से सरकार और प्रधानमंत्री एंवई हवा में थोड़े फेंक रहे थे कि काला धन वापस लाएंगे। इसी नारे और वायदे के दम पर ही उन्हें इत्ता विशाल जन-समर्थन मिला है। पार्टी के दिन बहुरे हैं। नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं। जनता में उम्मीदें जागी हैं। फिर भला वो कैसे उम्मीदों पर पानी फेर सकते हैं? अगर पानी फेरा तो जनता अगले चुनावों में पानी के साथ-साथ फेरों का भी हिसाब चुकता कर लेगी। इस मामले में देश की जनता बहुत समझदार है। कब, कहां, किससे, कैसा बदला लेना है, सब जानती है। काम करने वाले और काम न करने वाले नेता-मंत्री-विधायक-सभासद सबको पहचानती है। जनता की निगाह से बचके कहां जाइएगा साहेब।

लग तो साफ रहा है कि काले धन के 'भूत' ने न केवल सरकार बल्कि प्रधानमंत्री को भी काफी परेशान किया हुआ है। सरकार के भीतर और विपक्ष ने बाहर दिन-रात काले धन पर 'बहस' छेड़ रखी है। हर कोई सवाल पर सवाल दागे जा रहा है कि मान्यवर, कब तलक ला पा रहे हैं काला धन वापस? बहुतों ने तो वो लाख रुपए की रकम भी अब मांगना शुरू कर दी है, जिसका वायदा मोदीजी ने अपने किसी भाषण में काला धन वापस लाने पर किया था।

न जी न जनता कुछ नहीं भूलती। इसको सब याद रहता है कि किस नेता ने कब और कहां क्या बोला था। यही तो जनता की खूबी है।

खैर इसमें रत्तीभर शक नहीं कि काले धन के मसले ने सरकार की नाक में नकेल डालकर रख दी है। ऊपर से कार्ट की हड़काई के बाद से तो मसला और भी 'पंगात्मक' हो गया है। सरकार ने सोचा था कि सात-आठ नाम खोलकर बात रफा-दफा हो जाएगी। लेकिन क्या मालूम था कि इस तरह से उल्टी पड़ जाएगी। अब सरकार के प्रत्येक नेता-मंत्री को सपने भी काले धन के ही आते होंगे? क्या कीजिएगा, जो वायदा किया, वो निभाना तो पड़ेगा ही। नहीं तो पिछली सरकार महंगाई पर गाई, यह सरकार कहीं काले धन पर न हिल जाएगी!

अब यह भी एक बड़ा मसला है कि पाई-पाई काला धन वापस कैसे आएगा? पाई-पाई का मतलब है न एक पैसा इधर न एक पैसा उधर। हिसाब-किताब एकदम चोखा। लेकिन अभी तो सौंपी गई लिस्ट में ही पूरे नाम नहीं हैं। जित्ते का वायदा किया गया था, उससे भी कम हैं। किसके कने कित्ता काला धन है न यह बात जनता को अभी मालूम चली है। अभी यहां-वहां सिर्फ हवा में ही तीर छोड़े जा रहे हैं। फिर भी, सरकार कह रही है कि काला धन लाएंगे। जरूर लाएंगे। काला धन रखने वालों को सबक भी सिखाएंगे।

यों भी, हमारे देश में किसी बात या मुद्दे का जल्द हकीकत में तब्दील होना इत्ता आसान नहीं होता। कोई न कोई पेंच या पंगा फंस या फंसा ही जाता है। रौ में आकर नेता लोग वायदे बहुत ऊंचे-ऊंचे कर जाते हैं किंतु जब निभाने का नंबर आता है, सिट्टी-पिट्टी गुम। फिर बगलें झांकते फिरते हैं कि कहां मुंह छिपाएं। सब जानते हैं, मुंह छिपाने की कला में हमारे देश के नेताओं का जवाब नहीं। महंगाई, घोटाले, बदजुबानी, अफसरशाही, काला धन आदि पर कोई न कोई रास्ता तलाश ही लेते हैं मुंह छिपाने का।

फिलहाल, प्रधानमंत्री के कहे 'पाई-पाई' शब्दों को हम 'दिमाग' और 'ध्यान' में रखे हुए हैं। उनके किए गए वायदे पर भरोसा बैठाए हुए हैं। काला धन जब पाई-पाई के साथ वापस आ जाएगा तब ही समझेंगे कि उनके कहे पाई-पाई शब्द 'सार्थक' हुए। वरना... तो जो है सो है ही प्यारे।

मैं गधा हूं

चित्र साभारः गूगल
हालांकि यह कहने का मुझे शौक तो नहीं लेकिन इधर कुछ दिनों से मुझे ऐसा महसूस होने लगा है। मेरी सोच, मेरी हरकतों में गधेपन की मात्रा निरंतर बढ़ती ही जा रही है। मसला चाहे सामाजिक हो या साहित्यिक या फिर आर्थिक मैं अपने गधेपन का परिचय दे ही देता हूं। अभी उस रोज भरी सभा में मैंने कह दिया कि 'मैं समाज को अपने दम पर हांक चाहता हूं। साहित्य को दुलत्ती मारना चाहता हूं। आर्थिक समस्या को अपनी पीठ पर ढोना चाहता हूं।' तब ही एक बंदे ने खीझकर कहा कि 'बंधु, आप गधे हैं। आपकी सोच में गधापन व्याप्त है। जाकर किसी अच्छे जानवरों के डॉक्टर से इलाज करवाएं। या फिर अपने मुंह को बंद रखा करें।'

इसका मतलब मेरी बीवी सही कहती थी कि 'मैं गधा हूं'। मैं बीवी के कहे पर ज्यादा कान इसलिए नहीं देता था कि वो फेंकती है। लेकिन उस बंदे की झाड़ ने अब मुझे सौ फीसद यकीन दिलवा दिया है कि, मैं वाकई गधा ही हूं। साथ ही, मैं यह भी मानने लगा हूं कि पतियों के बारे में बीवीयों की राय हर वक्त 'गलत' नहीं होती प्यारे।

वैसे मैं मेरे गधा होने को बेहद 'सहजता' से लेता हूं। इंसानों के बीच एक मैं बंदा हूं, जो गधा प्रजाति के काफी करीब है। वरना, किसी बंदे से एंवई कहकर देख लीजिए- 'गधा' या 'कुत्ता', कसम से आपके सिर पर सवार हो बैठेगा। अरे, कुछ लोग तो 'पागल' शब्द पर ही विदक से जाते हैं। किंतु मैं मेरे गधे होने जैसे का कतई बुरा नहीं मानता। बुरा क्यों मानूं, अब जो हूं सो हूं।

गधा जैसा होकर मैं खुद को किशन चंदर की एक गधे की आत्मकथा के बेहद नजदीक पाता हूं। यह किशन चंदर ही थे, जिन्होंने गधे को इत्ती नेमती बरती कि गधा पाठकों और दुनिया के बीच 'सुपर-हीरो' बन गया। मुझे तो जहां भी कोई गधा नजर आ जाता है, बेहद श्रद्धा के साथ उसके समक्ष नतमस्तक हो जाता हूं। और, उससे गुजारिश करता हूं कि प्यारे अपने गधेपन का असर मुझ पर कायम रखना।

बात थोड़ी कड़वी लग सकती है मगर है सौ टका सत्य कि हम बहुत से मामलों में अभी भी गधे ही हैं। पारंपरिक रूढ़ियों और मानसिक यथास्थितिवाद को खत्म करने की हम हिम्मत कर ही नहीं पाते। जबकि अब हम मंगल पर कदम रख चुके हैं। स्त्री को गुलाम और अहंकार को अपना अधिकार मानते-समझते हैं। कभी-कभी तो हम गधे से भी बदत्तर हो जाते हैं।

गधा होकर गधेपन के साथ रहने में मुझे 'आनंद' आता है। इसे मैं अपने भीतर एक विशेष प्रकार की खूबी मानता हूं। यह खूबी मुझमें ताउम्र बरकार रहे। आमीन।