मंगलवार, 28 अक्तूबर 2014

खोदी खान, निकले केवल 'आठ' नाम

चित्र साभारः गूगल
देख लिया न, सरकार काला धन के प्रति कित्ती सजग थी। इत्ती मशक्त और इत्ते इंतजार के बाद आखिरकार सरकार ने आठ नाम बतला ही दिए। नाम भी खुद ही बतलाए और पीठ भी खुद ही थपथपा ली। अब इत्ती बड़ी सफलता का खुद 'क्रेडिट' लेना तो बनता है न। पिछली सरकार ने क्या किया- सिर्फ वायदा ही करती रही- 'आज नहीं कल बताएंगे, कल नहीं नरसों बताएंगे, अच्छा चुनाव निपट लेने दीजिए फिर बतला देंगे। और हां, इत्ता यकीन रखिए कि काला धन रखने वालो को बख्शा कतई नहीं जाएगा। दूध का दूध, पानी का पानी होकर रहेगा।'

खैर, मनमोहन सरकार कहते-कहते ही निपट ली, मोदी सरकार ने कहे तो 'सच' साबित कर दिखाया। इससे पता चलता है कि सरकार जनता से किए गए वायदों के प्रति कित्ती 'प्रतिबद्ध' है!

ओफ्फो, तो क्या हुआ अगर आठ नामों में किसी नेता का नाम नहीं है। किसी नेता कने काला धन होगा ही नहीं, इसीलिए सरकार ने बतलाया नहीं! अगर होता तो क्या सरकार न बतलाती? जरूर बतलाती। सरकार के लिए कोई छोटा-बड़ा नहीं होता! चाहे नेता हो या व्यापारी। यों भी, अभी आठ नाम ही तो सामने आए हैं। हो सकता है, आगे जो खुलासा हो उसमें किसी नेताजी का नाम भी आ जाए! भई, काले धन के प्रति 'मोह' किसका नहीं होता। अगर मेरे कने होता तो क्या मैं अपना काला धन स्विस बैंक में न रखता। जरूर रखता। इससे मेरे 'स्टेटस' में श्रीवृद्धि ही होती।

यू नो, मेरा दिल कहता है कि हमारे देश के 'ईमानदार नेताओं' कने काला धन होगा ही नहीं! बेचारे सारा टाइम तो जन-हित और जन-सेवा जैसे मामलों में बिजी रहते हैं। उन्हें खुद के बारे में सोचने की 'फुर्सत' मिल नहीं पाती, फिर भला काला धन (वो भी स्विस बैंक में) क्या रखेंगे? अरे, काला धन तो नेता लोगों के लिए 'पाप' समान है! है कि नहीं।

अब गौड़ाजी जैसे दो-चार नेता लोगों कने अगर आय से अधिक संपत्ति है भी तो क्या हुआ- कम से कम काला धन तो नहीं है न। सारा माल-मसाला है तो देश में ही न। वो भी नेताजी के खाते में।

नेता लोग राजनीति में काला धन रखने वालो के नामों को उजागर करने और बेईमानी को देश-समाज-जनता के बीच से दूर भगाने ही तो आते हैं! वो भला खुद क्यों काला धन रखने लगे? हालांकि वित्तमंत्रीजी ने पिछली सरकार के एकाध नेता-मंत्री के पास काला धन होने के 'संकेत' जरूर दिए थे किंतु अभी उजागर तो नहीं किया न। हो सकता है, ऐसा उन्होंने 'थोड़ा शक' के आधार पर बोल दिया हो। कभी-कभी राजनीतिक रस्साकशी के कारण ऐसे बोल मुंह से निकल ही जाते हैं। और अगर एकाध नेता या मंत्री का नाम सामने आ भी जाता है तो भी इत्ता हैरान-परेशान होने की जरूरत नहीं क्योंकि पांचों उंगलियां एक जैसी नहीं होतीं।

अब विपक्ष के साथ-साथ कुछ सियाने किस्म के बुद्धिजीवि लोग सरकार के खुलासे पर तरह-तरह के सवाल खड़े कर रहे हैं। मजाक बना रहे हैं। जनता से किए गए वायदों के साथ 'धोखा' बता रहे हैं। कह रहे हैं कि मोदीजी ने खोदी खान, निकले केवल आठ नाम। देखो जी, यह दुनिया है। दुनिया में भांति-भांति के लोग हैं। और लोगों का काम है कहना। तो जिन्हें कहना है उन्हें कहने दीजिए न। किसी के कहने भर से सरकार अपने हितों से समझौता थोड़े ही न कर सकती है। जो नाम सरकार को मालूम पड़े, देश-जनता के सामने रख दिए। एक तो सरकार ने नेता लोगों की 'इज्जत' बचा ली। और ऊपर से वही नेता लोग सरकार की 'नीयत' पर 'शक' कर रहे हैं। कमाल है प्यारे।

चलिए, खान खोदने के बाद अगर आठ नाम निकलकर सामने आए हैं तो क्या इस साहस के लिए सरकार की पीठ नहीं ठोकी जानी चाहिए। बिल्कुल ठोकी जानी चाहिए। ध्यान रखिए, सरकार हमेशा देश-जनता के भले की ही सोचती है।

अब सामने आए इन नामों ने देश-जनता का कित्ता भला होगा- यह आगे देखेंगे- हम लोग। 

3 टिप्‍पणियां:

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा…

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित SIT कोर्ट के नियन्त्रण/ मार्गनिर्देश में ही काम कर रही है। सरकार ने SIT को सभी उपलब्ध विदेशी खाताधारकों के नाम पहले ही दे रखे थे। इसके बावजूद सरकार को कोर्ट ने क्यों दौड़ा लिया? मेरी समझ में नहीं आ रहा। कोई समझा देता...!

Kavita Rawat ने कहा…

कहीं काला तो सही सफ़ेद धन
खोदते रहो .... देखते रहो ....बस
...सटीक प्रस्तुति

Payoffers dotin ने कहा…

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