सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

सेल्फी का है जमाना

चित्र साभारः गूगल
सेल्फी का क्रेज हमारे बीच निरंतर बढ़ता जा रहा है। अवसर चाहे खुशी का हो या गम का या फिर तीज-त्योहार का एक सेल्फी तो बनती है प्यारे। सेल्फी की सार्थकता केवल अपने फोन या कैमरे में सहेज लेना भर नहीं है। उसे फेसबुक, टि्वटर या वॉट्सएप पर चढ़ाया जाना भी जरूरी है। ताकि सेल्फी पर मिलने वाले लाइक और कमेंट उसकी सार्थकता को दोगुना कर सकें।

किस्म-किस्म के स्मार्टफोन सेल्फी के लिए 'वरदान' साबित हो रहे हैं। जिसके कने जित्ता महंगा स्मार्टफोन, उसकी सेल्फी उत्ती ही मस्त। सेल्फी के तईं कोई, किसी तरह का मूड बनाने की आवश्यकता नहीं। सेल्फी में मूड स्वतः ही बन जाता है। अब चेहरे के व्यक्तित्व की पहचान सेल्फी है। सुना है, ज्योतिषी लोग भी अब सेल्फी के आधार पर ही चेहरे को पढ़ने-वांचने लगे हैं। सब समय के साथ बदलती तकनीक का प्रभाव है प्यारे।

इधर, जब से प्रधानमंत्री का स्वच्छता अभियान क्या शुरू हुआ है, सेल्फियों की बाढ़-सी आ गई है। अब झाड़ू और सेल्फी एक-दूसरे के पूरक बन गए हैं। सियाने लोग झाड़ू बाद में लगाते हैं, पहले सेल्फी पर हाथ साफ करते हैं। हाथों में दस्ताने पहने और बेहद करीने से झाड़ू पकड़े सेलिब्रिटी लोगों के सेल्फी क्या मस्त होते हैं। उनके द्वारा उठाया जाने वाला कचरा भी 'शाश्वत' किस्म का होता है। सबसे खास बात, न वे कभी अकेले कूड़ा-कचरा उठाते हैं, न झाड़ू ही पकड़ते हैं। कुछ खास लोगों का हुजूम उनके साथ बना रहता है, ताकि सेल्फी में जन-समूह के साथ सहभागिता भी दिख सके। क्या जमाना आ गया है कि लोग अब सहभागिता को भी सेल्फी में कैश करने लगे हैं। बढ़िया है।

अभी हाल प्रधानमंत्री की पत्रकारों से हुई मेल-मुलाकात में भी सेल्फियों का दबदबा कायम रहा। कुछ पत्रकारों ने प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी ली और उसे अपने फेसबुक-टि्वटर पेज पर चिपकाया। प्रधानमंत्री ने भी झाड़ू के बहाने कलमबाजों की तारीफ कर उनकी बेरूखी का रूख बदल ही दिया। कलम का झाड़ू के साथ यह मेल-मिलाप खासा सुर्खियों में रहा। हर ओर से तरह-तरह की बातें-विश्लेषण सुनने में आते रहे। कुछ तो पत्रकारों की इन सेल्फियों पर इत्ता नाराज हुए कि मन ही मन अपना मन मसोस कर रह गए। हालांकि दुख उन्हें भी बहुत है कि हाय! हम प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी में क्यों न हुए। चूंकि वे प्रगतिशील विचारों के मालिक हैं फिर कहें किस मुंह से।

लेकिन जो बदलते वक्त के साथ अपनी सेल्फियों के हाव-भाव नहीं बदल पा रहे, जमाना उन्हें अब पूछ भी बहुत कम रहा है। पुरानी सेल्फियों को नई सेल्फियों के साथ कदमताल करनी ही चाहिए ताकि समय के साथ मुंह जोड़कर चला जा सके। जमाना अब सेल्फी का है। जिसकी सेल्फी जमेगी, यहां अब वही टिका रह पाएगा।

फेसबुक-टि्वटर पर हर पल चढ़ती-उतरती सेल्फियां बताती हैं कि हम सेल्फी के प्रति कित्ता क्रेजी हैं। कुछ दीवाने ऐसे भी हैं, जो थोड़ी-बहुत देर में अगर अपनी सेल्फी लेकर फेसबुक-टि्वटर पर न चढ़ाएं तो उनका बल्ड-प्रेशर बढ़ना शुरू हो जाता है। खाना खाने से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है अब सेल्फी लेना। आगे आने वाले समय में इंसान की सेहत का राज सेल्फी से ही जाना-पहचाना जाएगा।

सफाई अभियान, झाड़ू-कलम मिलन और सोशल नेटवर्किंग पर लगातार हिट पाती सेल्फियां अपने जमाने की कहानी खुद कह रही हैं। सेल्फियों के अभी कई प्रकार के रूप हमारे सामने आना बाकी हैं तब तलक मौजूदा सेल्फियों का 'आनंद' लीजिए।

3 टिप्‍पणियां:

ARUN SATHI ने कहा…

और कौनो उपाय भी तो नहीं है... अब तो कलम ही झाड़ू बन गया....करारा व्यंग्य

yashoda agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना बुधवार 29 अक्टूबर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

क्या किया जाय 'सेल्फ़' ही केन्द्र है -
हर बार लौट आता है वहीं.