मंगलवार, 21 अक्तूबर 2014

महंगाई दर और अच्छे दिन

चित्र साभारः गूगल
प्यारे, अखबारों में छपे आंकड़े बता रहे हैं कि महंगाई दर में कमी आई है! पिछले माह में इत्ती थी, अब इत्ती हो गई है। सब्जी-दाल-आटा-दूध-चीनी सब 'सस्ते' हो गए हैं। सब्जी मंडी और दुकानों में 'रौनक' लौटने लगी है। अब ग्राहक मुंह बिगाड़कर नहीं, खुशी-खुशी सौदा खरीदते हैं! बताते हैं कि लोगों के घर का बजट भी अब संभलने लगा है। घर का बजट बनाने में जित्ती मशक्त पहले करनी पड़ती थी, अब नहीं करनी पड़ रही। महंगाई दर में सुधार आने के बाद से अर्थव्यवस्था भी चमक मारने लगी है।

भक्तगण कह रहे हैं कि यह सब सरकार के 'अच्छे दिनों' की आर्थिक नीतियों का परिणाम है। महंगाई दर में कमी आना मतलब अच्छे दिनों में लौटना।

एक महंगाई दर में कमी आ जाने से, देख पा रहा हूं, भक्तगणों के 'सीने चौड़े' और 'चेहरे गुलाबी' हैं। बेहद डैशिंग अंदाज में वे सरकार और प्रधानमंत्री के अच्छे दिनों पर लेक्चर दे रहे हैं। एक भक्त मुझसे कह रहा था- देखा, मोदीजी के आते ही पाकिस्तान भी चुप्पा बैठ गया और महंगाई भी अपनी औकात में लौट आई। नहीं तो पिछली सरकार में महंगाई ने आम जनता के घर के बजट को 'डिसबेलैंस' करके रख दिया था। बस देखते रहिए मोदी सरकार महंगाई-दवाई-रूलाई-अफसरशाही आदि को कैसे काबू में लाती है।

चूंकि वो भक्त थे इसलिए महंगाई या अन्य मुद्दों के बाबत बात करना बेकार था, सो मैं 'जी हां' कहकर उनके पास से कट लिया। आजकल भक्तगणों के पास से कट लेने में ही भलाई है। एंवई उलझने से कुछ फायदा नहीं।

जब अखबारी आंकड़ें कह रहे हैं कि महंगाई दर में कमी आई है तो आई है। मान लीजिए न, आखिर मान लेने में हर्ज ही क्या है? अब तक महंगाई दर में जब भी कमी आई है या तो अखबारों के पन्नों पर आई है या फिर चैनलों की चमकीली स्टोरी में। वरना, मंडी में आलू की कीमत क्या है और बाजार में आइफोन-6 क्या कीमत है, पता चल जाएगा। जित्ते में लोग आइफोन-6 खरीद रहे हैं, उत्ते में तो आलू की कित्ती ही बोरियां आ जाएंगी प्यारे। गली-मोहल्लों, नाते-रिश्तों में बांटकर भी बची रहेंगी।

मगर इत्ता कौन सोचता है? हर कोई तो महंगाई दर के नीचे आने की खुमारी में डूबा दिख रहा है। सरकार ने दीवाली के आने पहले की जनता को महंगाई दर के घटने का का गिफ्ट एडवांस में दे दिया। बढ़िया है। अब सरकार भी खुश है और जनता भी। इसीलिए अब आप आलू के आयात के बाबत कुछ भी मत पूछिएगा। क्योंकि हम अब अच्छे दिनों में हैं।

चलिए, मैं भी अब माने लेता हूं कि महंगाई दर में कमी अच्छे दिनों का सुफल है। अच्छे दिन चाहे आंकड़ों में देखने को मिलें या नेताओं के मुंह से सुनने को, झेलना अंततः जनता को ही है। तो झेलिए और मस्त रहिए। ये अच्छे दिन हैं।

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