रविवार, 12 अक्तूबर 2014

फेसबुक और भक्तगण

चित्र साभारः गूगल
फेसबुक पर भक्तगणों की पौ बारह है। हर भक्त अपने गुरु की दुकान (ग्रुप) खोले फेसबुक पर बैठा हुआ है। दुकान में गुरु की तस्वीर है। तस्वीर पर हर रोज एक अगरबत्ती जलाई जाती है ताकि गुरु के साथ-साथ दुकान भी महकती रहे। दुकान में हर वक्त किस्म-किस्म के भक्तगणों का मेला लगा रहता है। भक्तगण अपने-अपने गुरुओं के वचन-प्रवचन हर किसी को सुनाते रहते हैं।

भक्तगण अपने गुरुओं की इज्जत के प्रति बेहद सेंसटिव हैं। मजाल कि आप उनके गुरु की शान में फेसबुक पर कुछ कह-लिख दें। फिर आपकी खैर नहीं...। दुनिया भर की जित्ता मलामतें आपके खिलाफ दी जा सकती हैं, भक्तगण सब देते हैं। अपने गुरु के प्रति न उन्हें 'असहमति' पसंद है न 'आलोचना'। बेशक अपनी सफाई में तथ्य कित्ते ही पेश कर दीजिए पर भक्तगण कहां सुनने-मानने वाले हैं। अपने गुरु के प्रति 'अंधभक्ति' ही उन्हें ऑक्सीजन देती है फेसबुक पर आलोचना के खिलाफ फतवा जारी करने के लिए।

कभी-कभी भक्तगण एक-दूसरे से बेमतलब ही लड़-उलझ जाते हैं। आजकल फेसबुक पर राष्ट्रवादियों और वामपंथियों में जबरदस्त तू-तू, मैं-मैं छिड़ी हुई है। दोनों ही एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए तमाम प्रकार के आइटम पेश करने पर तुले हैं। एक वाद अपने गुरु को सर्वश्रेष्ठ बता रहा है तो दूसरा वाद अपने गुरु को। हां, दोनों वादों के बीच विचार का सिरा आप ढूंढ़ते रह जाएंगे। क्योंकि वैचारिक बहसबाजी दोनों को ही पसंद नहीं!

जैसे-तैसे प्रधानमंत्री की अमरीका यात्रा का गर्द-गुबार थमा, अब यह 'हैदर' फिल्म पर आन टिका है। फेसबुक पर दोनों ही वाद वाले 'हैदर' के पक्ष और विपक्ष में अपने-अपने दावे पेश कर रहे हैं। एक वाद के लिए फिल्म 'अद्भूत' है तो दूसरे वाद के लिए 'हकीकत से परे'। कमाल यह है, भक्तगणों की इस जंग में कुछ वो सियाने भी कूद पड़े हैं, जिन्होंने न फिल्म देखी है न उन्हें डाइरेक्टर का नाम मालूम है मगर फिर भी तू-तू, मैं-मैं में पूरे जोश के साथ लगे हैं। मानो, फिल्म उनके परिवार के ही किसी भाई-बंधु ने बनाई हो।

चूंकि फेसबुक अभिव्यक्ति के साथ जंग का खुला मैदान भी है तो भक्तगण अपनी-अपनी तलवारें यहां भांजते रहते हैं। तू-तू, मैं-मैं का नतीजा भले ही कोई न निकले पर भक्तगणों को तो भिड़ने से मतलब। भक्तगण दिन भर में जब तलक पांच-सात से भिड़ न लें, उनका खाना ही हजम नहीं होता। गुरु के प्रति चारण-भक्ति फेसबुक पर अपना असर किसी न किसी रूप में बनाए हुए है। तब ही तो भक्तगणों की फेसबुक पर मौजां ही मौजां है।

एकाध दफा मुझे भी अलां-फलां गुरु की दुकान (ग्रुप) में शामिल होने के निमंत्रण मिला है किंतु मैंने किसी की दुकान में कदम नहीं रखा। न रखने का विचार है। गुरु-भक्तों से जित्ता दूर रहो उत्ता ही अच्छा। यहां एंवई अपनी इज्जत का फलूदा बनते देर ही कित्ती लगती है प्यारे। न अपनी दीवार पर किसी गुरु-भक्त को कुछ लिखने दो, न किसी दीवार पर अपना कुछ लिखो। भक्ति बड़ी अजीब चीज होती है, कब, कहां, कैसे विकराल रूप धारण कर ले, क्या पता।

भई, मेरे तईं तो फेसबुक केवल टाइम-पास का जरिया है। जब दिमागी और दिली थकान मिटानी होती है, यहां आ जाता हूं। वन-लाइनर लिखकर अपनी शाब्दिक भूख को थोड़ा शांत कर लेता हूं। थोड़ा खुद हंस-मुस्कुरा लेता हूं। थोड़ा अगले को हंसा देता हूं। यों, इंसान की निजी जिंदगी में इत्ते दुख-तकलीफें हैं अगर फेसबुक पर आकर- हंसी-मजाक के बीच- कुछ कम होती हैं, तो बढ़िया है न। जिंदगी में अगर गम हैं तो खुशियां भी तो हैं। फेसबुक यही प्लेटफार्म हमें देता है पर क्या कीजिएगा, भक्तगणों ने तो इसे अपने अहम और दूसरे की औकात का माध्यम बना रखा है।

खैर, मुझे क्या; भक्तगणों की भक्त जानें और गुरुओं की गुरु।

फिलहाल, भक्तगणों के बीच किस्म-किस्म की जंग अभी भी जारी हैं।

1 टिप्पणी:

jyoti khare ने कहा…

वाह बहुत खूब--
सादर


आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी पधारे