सोमवार, 6 अक्तूबर 2014

क्यों न, 'झाड़ू की दुकान' खोल लूं

चित्र साभारः गूगल
फिलहाल, मैंने नौकरी छोड़ने का मन बना लिया है। बहुत देख लिया नौकरी करके। कुछ नहीं रखा, नौकरी में। तय किया है कि मैं अपने मोहल्ले के नुक्कड़ पर 'झाड़ू की दुकान' खोलूंगा। झाड़ू की दुकान खोलने का फैसला मैंने सरकार के 'स्वच्छता अभियान' के मद्देनजर लिया है। देश में झाड़ू का इन दिनों अच्छा-खासा 'क्रेज' भी देखने-सुनने को मिल रहा है। जिसे देखो- सरकारी मंत्री से लेकर प्राइवेट कर्मचारी तक- हर कोई अपने मोहल्ले या दफ्तर में झाड़ू ताने खड़ा है, सफाई करने को। जब सरकार स्वच्छता बरतने को बार-बार कह रही है तो फिर मैं क्यों न झाड़ू की दुकान खोलकर इस महा-अभियान में हाथ बटाऊं।

झाड़ू ही एक मात्र ऐसा अस्त्र है, जिससे न केवल सड़कों-चौराहों, बल्कि अच्छों-अच्छों की अच्छे से सफाई की जा सकती है। झाड़ू चलाकर आप न केवल घर बल्कि बॉस की निगाह में भी तारीफ के हकदार बन सकते हैं। मैं अपने लेखन से जब भी छुट्टी पाता हूं, घर-बाहर खूब शौक से झाड़ू लगाता हूं। झाड़ू लगाने में मुझे आनंद की प्राप्ति जैसा फील होता है।

चूंकि झाड़ू का इस्तेमाल मेरी रग-रग में बसा है इसलिए निश्चिंत हूं कि मैं अपनी दुकान को बेहतर चला पाऊंगा। मुझे झाड़ू ही तो बेचनी है। यह कौन-सी बड़ी बात है। जब मैंने इत्ते-इत्ते हैवीवेट शेयर बेच डाले फिर झाड़ू क्या चीज है! बाजार का आदमी हूं, बहुत अच्छे से जानता हूं कि कौन-सा प्रॉडेक्ट कब, कहां, कैसे बेचना है।

झाड़ू को मैं केवल अपनी दुकान से ही नहीं, ऑन-लाइन शॉपिंग पोर्टल से भी बेचूंगा। आजकल लोग रिटेल मार्केट से कम ऑन-शापिंग से खरीददारी ज्यादा करने लगे हैं। ऑन-लाइन शापिंग ने तो खरीद-बेच की मानसिकता को ही बदल डाला है प्यारे।

आगे मेरा प्लान यह भी है कि झाड़ू की दुकान चल निकलने के कुछ दिनों बाद, एनएससी-बीएससी एक्सचेंज में, इसका शेयर भी लिस्ट करवाऊंगा। कित्ता अद्भूत लगेगा, जब मेरे झाड़ू के शेयर की खरीद-फरोख्त स्टॉक एक्सचेंज में होगी। बाजार की दशा-दिशा को तय करने में एक शेयर मेरा भी होगा। वाकई बाजार ने हमें कित्ती तरह की संभावनाओं के बीच ला खड़ा किया है। बस बेचने का हुनर आपके कने होना चाहिए फिर सबकुछ बिक सकता है।

क्या हर्ज है अगर सरकार के स्वच्छता अभियान के सहारे मेरी झाड़ू की दुकान चल निकलती है। मेरी देखा-देखी झाड़ू के बिजनेस में और भी काबिल आएंगे, बाजार के सहारे अपने झाड़ू-प्रॉडेक्ट को बेचने के लिए। हो सकता है, कल को टाटा-अंबानी-अडानी भी उतर जाएं, झाड़ू के बाजार में। तब तो कंपीटिशन और भी तगड़ा मगर मस्त हो जाएगा प्यारे। तब पता चलेगा लोगों को कि एक झाड़ू न केवल देश बल्कि बाजार की किस्मत भी बदल सकती है।

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