गुरुवार, 30 अक्तूबर 2014

काले रंग का भय

चित्र साभारः गूगल
इधर, काले रंग और काली चीजों से 'भय' खाने लगा हूं। निगाह जब भी किसी काली चीज पर पड़ जाती है, मन में तरह-तरह की 'शंकाएं' बनने लगती हैं। काली चीज के रूप में कहीं काला धन तो नहीं! काली चीज का बीच रास्ते दिख या मिल जाना कहीं किसी की 'साजिश' तो नहीं। हालांकि मुझे मालूम है कि मेरे कने न काला धन है न काले लोगों के साथ रिश्ते। मगर फिर भी ध्यान तो रखना ही पड़ता है न। क्या पता कब कोई लपेटे में ले ले। जमाना खराब है।

काले को खुद से दूर रखते हुए मैंने घर में पली काली बिल्ली को भी जंगल में छुड़वा दिया है। अपनी काली मोटरसाइकिल बेच दी है। घर के दरवाजों-खिड़कियों पर पड़े सभी काले पर्दें को तत्काल प्रभाव से हटवा दिया है। काले से संबंधित जित्ती रद्दी थी, सब रद्दी-वाले को मुफ्त में दे दी है। पत्नी को साफ बोल दिया है कि घर में- जब तलक अदालत को सौंप गया सील-बंद लिफाफा खुल नहीं जाता और काले नाम पता नहीं लग जाते- किसी प्रकार के काले रंग का इस्तेमाल न करे। सब्जी में न काला बैंगन बनाए न छत पर काले कऊए को ही बैठने दे।

अभी दो रोज पहले सिर के जिन बालों को काला करवाया था, वापस सफेद करवा लिया है। और पत्नी से भी कहा है कि वो भी अपने काले बाल सफेद करवा ले। मेरे और उसके काले कपड़े गरीबों को दान में दे दे। काले रंग से उत्ती ही दूरी बनाकर रखे जित्ती वामपंथी राष्ट्रवादियों से बनाकर रखते हैं। न करीब जाओ, न करीब आने दो। तुम अपने घर खुश, हम अपने।

काले रंग और चीजों के प्रति मेरी सनक को देखकर मोहल्ले में मेरी मजाक बनना भी शुरू हो गई है। पर मैं ज्यादा ध्यान नहीं देता। मजाक बनती है तो बना करे। एक दफा मैंने काले रंग से तौबा कर ली तो कर ली। मोहल्ले वालो का क्या है, उनकी तो आदत है बात-बात में हंसी-ठिठोली करने और मजाक बनाने की। उनकी मजाक पर 'सेंटी' होकर मुझे अपनी भद्द थोड़े न पिटवानी है।

देखिए न, काला धन रखने वाले कैसे फंसते नजर आ रहे हैं। सोचा था कि सात समंदर पार काला धन छिपाकर रख लेंगे, यहां किसी को पता भी नहीं चलेगा। आराम से अपनी काली कमाई पर ऐश करेंगे। न सरकार को खबर होने देंगे न आयकर विभाग को। लेकिन अब पड़ उलटी गई। उधर कोर्ट ने सरकार के कान क्या उमेंठे, तुरंत 627 नामों की लिस्ट का सील-बंद लिफाफा सौंप दिया। फिलहाल, अभी मालूम नहीं चला पाया है कि सील-बंद लिफाफे में कित्ते 'काले नाम' हैं, मगर प्यारे काला तो काला ही है। काला धन और काला धंधा 'गंध' बहुत मारता है।

काले धन के मामले ने बहुतों की नीदें उड़ाकर रख दी हैं। चैन से वो सो भी न पा रहे हैं, जिनके कने काला धन तो खैर नहीं है पर काला दिल जरूर रखते हैं। काले दिल से अब तलक जाने कित्तों को चकमा दे चुके हैं। उन्हें डर है, कहीं काला धन वालो के साथ-साथ काले दिल वालो के खिलाफ भी कोई जांच-वांच शुरू न हो जाए। अब तो काले का नाम लेना ही 'गुनाह' लगता है।

इसीलिए प्यारे काले रंग और काली चीजों से जित्ता बच सकते हो बच लो। एक दफा अगर चेहरे पर 'कालिख' पुत गई तो फिर हनुमानजी भी आनकर न बचा पाएंगे। फिलहाल, मैंने अपना बीच-बचाव शुरू कर दिया है। बाकी आप जानो।

मंगलवार, 28 अक्तूबर 2014

खोदी खान, निकले केवल 'आठ' नाम

चित्र साभारः गूगल
देख लिया न, सरकार काला धन के प्रति कित्ती सजग थी। इत्ती मशक्त और इत्ते इंतजार के बाद आखिरकार सरकार ने आठ नाम बतला ही दिए। नाम भी खुद ही बतलाए और पीठ भी खुद ही थपथपा ली। अब इत्ती बड़ी सफलता का खुद 'क्रेडिट' लेना तो बनता है न। पिछली सरकार ने क्या किया- सिर्फ वायदा ही करती रही- 'आज नहीं कल बताएंगे, कल नहीं नरसों बताएंगे, अच्छा चुनाव निपट लेने दीजिए फिर बतला देंगे। और हां, इत्ता यकीन रखिए कि काला धन रखने वालो को बख्शा कतई नहीं जाएगा। दूध का दूध, पानी का पानी होकर रहेगा।'

खैर, मनमोहन सरकार कहते-कहते ही निपट ली, मोदी सरकार ने कहे तो 'सच' साबित कर दिखाया। इससे पता चलता है कि सरकार जनता से किए गए वायदों के प्रति कित्ती 'प्रतिबद्ध' है!

ओफ्फो, तो क्या हुआ अगर आठ नामों में किसी नेता का नाम नहीं है। किसी नेता कने काला धन होगा ही नहीं, इसीलिए सरकार ने बतलाया नहीं! अगर होता तो क्या सरकार न बतलाती? जरूर बतलाती। सरकार के लिए कोई छोटा-बड़ा नहीं होता! चाहे नेता हो या व्यापारी। यों भी, अभी आठ नाम ही तो सामने आए हैं। हो सकता है, आगे जो खुलासा हो उसमें किसी नेताजी का नाम भी आ जाए! भई, काले धन के प्रति 'मोह' किसका नहीं होता। अगर मेरे कने होता तो क्या मैं अपना काला धन स्विस बैंक में न रखता। जरूर रखता। इससे मेरे 'स्टेटस' में श्रीवृद्धि ही होती।

यू नो, मेरा दिल कहता है कि हमारे देश के 'ईमानदार नेताओं' कने काला धन होगा ही नहीं! बेचारे सारा टाइम तो जन-हित और जन-सेवा जैसे मामलों में बिजी रहते हैं। उन्हें खुद के बारे में सोचने की 'फुर्सत' मिल नहीं पाती, फिर भला काला धन (वो भी स्विस बैंक में) क्या रखेंगे? अरे, काला धन तो नेता लोगों के लिए 'पाप' समान है! है कि नहीं।

अब गौड़ाजी जैसे दो-चार नेता लोगों कने अगर आय से अधिक संपत्ति है भी तो क्या हुआ- कम से कम काला धन तो नहीं है न। सारा माल-मसाला है तो देश में ही न। वो भी नेताजी के खाते में।

नेता लोग राजनीति में काला धन रखने वालो के नामों को उजागर करने और बेईमानी को देश-समाज-जनता के बीच से दूर भगाने ही तो आते हैं! वो भला खुद क्यों काला धन रखने लगे? हालांकि वित्तमंत्रीजी ने पिछली सरकार के एकाध नेता-मंत्री के पास काला धन होने के 'संकेत' जरूर दिए थे किंतु अभी उजागर तो नहीं किया न। हो सकता है, ऐसा उन्होंने 'थोड़ा शक' के आधार पर बोल दिया हो। कभी-कभी राजनीतिक रस्साकशी के कारण ऐसे बोल मुंह से निकल ही जाते हैं। और अगर एकाध नेता या मंत्री का नाम सामने आ भी जाता है तो भी इत्ता हैरान-परेशान होने की जरूरत नहीं क्योंकि पांचों उंगलियां एक जैसी नहीं होतीं।

अब विपक्ष के साथ-साथ कुछ सियाने किस्म के बुद्धिजीवि लोग सरकार के खुलासे पर तरह-तरह के सवाल खड़े कर रहे हैं। मजाक बना रहे हैं। जनता से किए गए वायदों के साथ 'धोखा' बता रहे हैं। कह रहे हैं कि मोदीजी ने खोदी खान, निकले केवल आठ नाम। देखो जी, यह दुनिया है। दुनिया में भांति-भांति के लोग हैं। और लोगों का काम है कहना। तो जिन्हें कहना है उन्हें कहने दीजिए न। किसी के कहने भर से सरकार अपने हितों से समझौता थोड़े ही न कर सकती है। जो नाम सरकार को मालूम पड़े, देश-जनता के सामने रख दिए। एक तो सरकार ने नेता लोगों की 'इज्जत' बचा ली। और ऊपर से वही नेता लोग सरकार की 'नीयत' पर 'शक' कर रहे हैं। कमाल है प्यारे।

चलिए, खान खोदने के बाद अगर आठ नाम निकलकर सामने आए हैं तो क्या इस साहस के लिए सरकार की पीठ नहीं ठोकी जानी चाहिए। बिल्कुल ठोकी जानी चाहिए। ध्यान रखिए, सरकार हमेशा देश-जनता के भले की ही सोचती है।

अब सामने आए इन नामों ने देश-जनता का कित्ता भला होगा- यह आगे देखेंगे- हम लोग। 

सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

सेल्फी का है जमाना

चित्र साभारः गूगल
सेल्फी का क्रेज हमारे बीच निरंतर बढ़ता जा रहा है। अवसर चाहे खुशी का हो या गम का या फिर तीज-त्योहार का एक सेल्फी तो बनती है प्यारे। सेल्फी की सार्थकता केवल अपने फोन या कैमरे में सहेज लेना भर नहीं है। उसे फेसबुक, टि्वटर या वॉट्सएप पर चढ़ाया जाना भी जरूरी है। ताकि सेल्फी पर मिलने वाले लाइक और कमेंट उसकी सार्थकता को दोगुना कर सकें।

किस्म-किस्म के स्मार्टफोन सेल्फी के लिए 'वरदान' साबित हो रहे हैं। जिसके कने जित्ता महंगा स्मार्टफोन, उसकी सेल्फी उत्ती ही मस्त। सेल्फी के तईं कोई, किसी तरह का मूड बनाने की आवश्यकता नहीं। सेल्फी में मूड स्वतः ही बन जाता है। अब चेहरे के व्यक्तित्व की पहचान सेल्फी है। सुना है, ज्योतिषी लोग भी अब सेल्फी के आधार पर ही चेहरे को पढ़ने-वांचने लगे हैं। सब समय के साथ बदलती तकनीक का प्रभाव है प्यारे।

इधर, जब से प्रधानमंत्री का स्वच्छता अभियान क्या शुरू हुआ है, सेल्फियों की बाढ़-सी आ गई है। अब झाड़ू और सेल्फी एक-दूसरे के पूरक बन गए हैं। सियाने लोग झाड़ू बाद में लगाते हैं, पहले सेल्फी पर हाथ साफ करते हैं। हाथों में दस्ताने पहने और बेहद करीने से झाड़ू पकड़े सेलिब्रिटी लोगों के सेल्फी क्या मस्त होते हैं। उनके द्वारा उठाया जाने वाला कचरा भी 'शाश्वत' किस्म का होता है। सबसे खास बात, न वे कभी अकेले कूड़ा-कचरा उठाते हैं, न झाड़ू ही पकड़ते हैं। कुछ खास लोगों का हुजूम उनके साथ बना रहता है, ताकि सेल्फी में जन-समूह के साथ सहभागिता भी दिख सके। क्या जमाना आ गया है कि लोग अब सहभागिता को भी सेल्फी में कैश करने लगे हैं। बढ़िया है।

अभी हाल प्रधानमंत्री की पत्रकारों से हुई मेल-मुलाकात में भी सेल्फियों का दबदबा कायम रहा। कुछ पत्रकारों ने प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी ली और उसे अपने फेसबुक-टि्वटर पेज पर चिपकाया। प्रधानमंत्री ने भी झाड़ू के बहाने कलमबाजों की तारीफ कर उनकी बेरूखी का रूख बदल ही दिया। कलम का झाड़ू के साथ यह मेल-मिलाप खासा सुर्खियों में रहा। हर ओर से तरह-तरह की बातें-विश्लेषण सुनने में आते रहे। कुछ तो पत्रकारों की इन सेल्फियों पर इत्ता नाराज हुए कि मन ही मन अपना मन मसोस कर रह गए। हालांकि दुख उन्हें भी बहुत है कि हाय! हम प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी में क्यों न हुए। चूंकि वे प्रगतिशील विचारों के मालिक हैं फिर कहें किस मुंह से।

लेकिन जो बदलते वक्त के साथ अपनी सेल्फियों के हाव-भाव नहीं बदल पा रहे, जमाना उन्हें अब पूछ भी बहुत कम रहा है। पुरानी सेल्फियों को नई सेल्फियों के साथ कदमताल करनी ही चाहिए ताकि समय के साथ मुंह जोड़कर चला जा सके। जमाना अब सेल्फी का है। जिसकी सेल्फी जमेगी, यहां अब वही टिका रह पाएगा।

फेसबुक-टि्वटर पर हर पल चढ़ती-उतरती सेल्फियां बताती हैं कि हम सेल्फी के प्रति कित्ता क्रेजी हैं। कुछ दीवाने ऐसे भी हैं, जो थोड़ी-बहुत देर में अगर अपनी सेल्फी लेकर फेसबुक-टि्वटर पर न चढ़ाएं तो उनका बल्ड-प्रेशर बढ़ना शुरू हो जाता है। खाना खाने से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है अब सेल्फी लेना। आगे आने वाले समय में इंसान की सेहत का राज सेल्फी से ही जाना-पहचाना जाएगा।

सफाई अभियान, झाड़ू-कलम मिलन और सोशल नेटवर्किंग पर लगातार हिट पाती सेल्फियां अपने जमाने की कहानी खुद कह रही हैं। सेल्फियों के अभी कई प्रकार के रूप हमारे सामने आना बाकी हैं तब तलक मौजूदा सेल्फियों का 'आनंद' लीजिए।

बुधवार, 22 अक्तूबर 2014

सेंसेक्स संग दिवाली

चित्र साभारः गूगल
सेंसेक्स संग दिवाली मनाने का 'आनंद' ही कुछ और है प्यारे। दिवाली पर सेंसेक्स सेंसेक्स न रहकर 'रॉकेट' बन जाता है। दिवाली पर बाजार से ज्यादा सेंसेक्स की मर्जी चलती है। इस दिन सेंसेक्स किसी को निराश नहीं करता। खुद खुश रहता है और दलाल पथ को भी खुश रखने की कोशिश करता है।

सेंसेक्स देश की अर्थव्यवस्था का 'रोल-मॉडल' होने के साथ-साथ बाजार का 'दिल' भी है। अर्थव्यवस्था के चेहरे पर आया गुलाबीपन और बाजार को मिली एनर्जी सेंसेक्स के कारण ही तो बरकरार है। सेंसेक्स जब इठलाता हुआ चलता है, पूरी दुनिया का तन-मन डोलता है। अमेरिका भी हमारे सेंसेक्स के दम भरने पर मन ही मन मुस्कुराता है। क्यों न मुस्कुराएगा, अब हम भी प्रगतिशील देशों की सूची में बहुत आगे तक निकल आए हैं। यह सब हमारे सेंसेक्स की मेहनत का नतीजा है प्यारे।

सेंसेक्स ने बाजार को एक नई पहचान, नई परिभाषा दी है। बताया है, चाहे खुशी हो या गम कैसे मस्त रहा जाता है। त्योहार को 'मार्केट-ओरियंटिड' कैसे बनाया जाता है। अब हर त्योहार पर बाजार की अपनी अलग पहचान है। ग्राहक के बीच खरीदने-बेचने की आदत तो सेंसेक्स की ही देन है। इसीलिए तो दिवाली पर सेंसेक्स और बाजार दोनों की इत्ती पूछ रहती है।
 
मौके को भुनाने की कला सेंसेक्स अच्छे से जानता है। मौका चाहे चुनावी नतीजों का हो या कंपनियों के रिजल्ट का- सेंसेक्स उस हिसाब से अपने मूड को ढाल लेता है। अभी आए चुनावी नतीजों पर सेंसेक्स ने जिस प्रकार की मस्त चाल दिखलाई, हर कोई तर गया। दिवाली से पहले ही सेंसेक्स ने दलाल पथ को अपनी चाल से 'जगमग' कर दिया। अपने चाहने वालों को अतिशबाजी का पूरा मौका दिया। यही तो सेंसेक्स की खूबी है।

नई सरकार और नए आर्थिक फैसलों ने सेंसेक्स को 'बूस्टर' देने का काम किया है। नई सरकार आने के बाद से बहुत कम ऐसे चांस आए हैं, जब सेंसेक्स का मूड बिगड़ा हो। मूड तब ही बिगड़ा है, जब सेंसेक्स पर अतिरिक्त बोझ पड़ा हो। नहीं तो सेंसेक्स अपनी चाल में मस्त हर दिन एक नया मुकाम बनाने में व्यस्त रहता है। दुनियादारी की अधिक परवाह नहीं करता, अपने दम पर देश की अर्थव्यवस्था को संवारने में लगा रहता है। सरकार साथ दे तो 'सोने पे सुहागा'।

दरअसल, सेंसेक्स संग दिवाली मनाना मुझे इसीलिए भी काफी पसंद है क्योंकि उसके कने 'पॉजीटिव एनर्जी' बहुत है। अप्रत्याशित गिरावट में मूड को लाइट रखने और कहा-सुनी पर न के बराबर कान देने की कला सेंसेक्स की लाजवाब है। मैंने तो देश की अर्थव्यवस्था के बुरे दिनों में भी सेंसेक्स को 'कूल' रहते करीब से देखा है। इत्ते दवाबों के बीच सेंसेक्स किस तरह से खुद को बुरे दिनों में से निकालकर अच्छे दिनों में लाया है, वो ही जानता है।
इसीलिए तो आज हम सब अच्छे दिनों के बीच सेंसेक्स संग मस्त दिवाली मना रहे हैं।

खुशहाल-समृद्ध सेंसेक्स मन को बहुत भाता है। अपनी मस्त चाल में इठलाता सेंसेक्स मन में दोगुना उत्साह भर देता है। सेंसेक्स की कामयाबी ने दलाल पथ का चेहरा ही बदल दिया है। दलाल पथ पर हर वक्त दिवाली का सा माहौल रहता है। इसी उत्साह ने ही तो हमें और बाजार को 'उत्सवधर्मी' बने रहने का मंत्र दिया है। छोटी-बड़ी खुशियों और त्योहार को उत्सव बना लेना ही तो कला है।

अपनी उत्सवधर्मिता को जीवंत बनाए रखते हुए इस दफा अपनी दिवाली सेंसेक्स संग।

मंगलवार, 21 अक्तूबर 2014

स्वच्छता अभियान के बहाने

चित्र साभारः गूगल
इधर, जब से 'अच्छे दिन' (!) आए हैं भगवान अधिक सक्रिय हो गए हैं। यों तो भगवान धरती और इंसान की हर अंदरूनी-बाहरी हकीकत को जानते हैं फिर भी स्वर्ग से आंखों-देखा हाल लेते रहते हैं। जब कभी लाइव नहीं देख पाते तो अपने फेसबुक, टि्वटर या व्हाट्सएप पर वीडियो मांगवाकर देख लेते हैं। आप क्या समझते हो सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर एकांउट केवल आप ही का है, जी, अब भगवान भी यहां मौजूद हैं। क्यों न होंगे, 21वीं सदी में अब भगवान भी 'हाइटेक' हो चले हैं। फेसबुक, टि्वटर, व्हाट्सएप, यू-टयूब का वे भी उत्ता ही इस्तेमाल कर रहे हैं, जित्ता कि आप-हम।

आजकल भगवान की खास नजरें धरती पर प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किए गए 'स्वच्छता अभियान' पर ज्यादा टिकी हुई हैं। 24x7 अपने स्मार्टफोन की 'विशेष एप' से जायजा लेते रहते हैं, कहां, किधर, कित्ती सफाई हुई! किसने झाड़ू वाकई सफाई के लिए थामी हुई है और किसने सिर्फ सेल्फी के लिए। कौन कॉरपोरेट अपनी कंपनी के प्रचार या कौन फिल्मी सेलीब्रिटी अपनी फिल्म के प्रोमोशन के लिए झाड़ू लगा रहा है। उन्हें उन आला मंत्रियों-नेताओं-विधायकों-सभासदों के चेहरे तक मालूम हैं, जिन्होंने 02 अक्तूबर वाले दिन ही कैमरों के सामने झाड़ू उठाई थी, उसके बाद से नदारद हैं। चूंकि वो भगवान हैं, जाहिर है, इसीलिए मेरी-तेरी इसकी-उसकी इधर-उधर की खबर रखते हैं। लेकिन हम इंसान लोग खुद को 'होशियार' मानकर यह समझते हैं कि भगवान को कुछ पता ही न होगा। जबकि हममें से आधे से ज्यादा लोग हर रोज भगवान के आगे धूप-बत्ती जलाते हैं और घंटों पाठ करते हैं। फिर भी भगवान को पटा नहीं पाते।

दरअसल, भगवान खुद बहुत दुखी है धरती पर पसरी गंदगी को देखकर। जित्ती गंदगी धरती पर पसरी है, उससे कहीं ज्यादा इंसान के मन में जमी है। भगवान ने अक्सर मुझसे व्यक्ततिगत मुलाकातों में धरती और इंसान की गंदगी पर विस्तार से बात की है। जाने कित्ते ही स्टेटस फेसबुक और टि्वटर पर अपडेट कर डाले हैं। मगर धरती वाले भगवान की बात सुनते ही कहां हैं? आजकल तो उनमें झाड़ू लेकर जगह-जगह जाकर अपनी सेल्फियां फेसबुक और टि्वटर पर अपलोड करने की हिरस लगी हुई है। जिन्होंने जिंदगी में कभी झाड़ू की सींक तलक न पकड़ी होगी, वो ऐसे झाड़ू लगाते हुए मिल रहे हैं मानो पूरी गली-मोहल्ले-शहर की स्वच्छता का दरोमदार उन्हीं पर है।

धरती पर स्वच्छता को लेकर की जा रही नाटक-नौटंकियां ही भगवान को कष्ट दे रही हैं। भगवान ने अपने ट्वीट्स में लिखा भी है- धरती पर स्वच्छता कम 'स्वच्छ चेहरे' अधिक दिखाई पड़ रहे हैं। जित्ती गंदी सड़कें हैं, उससे कहीं ज्यादा गंदी तो नालियां और कूड़ेदान हैं। लोग-बाग घर का कूड़ा पड़ोसी के या अपने घर के आगे डालकर ही संतुष्ट हो लेते हैं। कमाल है, धरती का इंसान जेब में पचास हजार का स्मार्टफोन तो शौक से रखता है किंतु पांच रुपए सफाई वाले को देने में आनाकानी करता है। नेता लोग गांव-देहात में शौचालय बनवाने के बजाए, पैसा अपनी जेब में सरका लेते हैं। शहर के बाबू लोग तो और भी सियाने हैं, कपड़े साफ पहनते हैं किंतु गली-मोहल्ला गंदा रखते हैं।

भगवान को यह भी शिकायत है कि धरती वाले मन के बहुत मैले हैं। जाने कित्ते जन्म से इंसान अपनी गंदगी ऊपर ला रहा है। क्या करें बर्दाशत कर रहे हैं, इसके सिवाय कोई चारा भी तो नहीं।

सच कहूं तो भगवान की चिंता और शिकायत वाजिब है। यहां स्वच्छता अभियान के तहत झाड़ू लगाना महज 'फैशन' बना हुआ है। लोग-बाग इस फैशन को सोशल नेटवर्किंग पर सेल्फी के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। झाड़ू अब स्वच्छता की नहीं, सेल्फी की प्रयाय बनती जा रही है। भगवान इस स्वच्छता को देख रहे हैं।

महंगाई दर और अच्छे दिन

चित्र साभारः गूगल
प्यारे, अखबारों में छपे आंकड़े बता रहे हैं कि महंगाई दर में कमी आई है! पिछले माह में इत्ती थी, अब इत्ती हो गई है। सब्जी-दाल-आटा-दूध-चीनी सब 'सस्ते' हो गए हैं। सब्जी मंडी और दुकानों में 'रौनक' लौटने लगी है। अब ग्राहक मुंह बिगाड़कर नहीं, खुशी-खुशी सौदा खरीदते हैं! बताते हैं कि लोगों के घर का बजट भी अब संभलने लगा है। घर का बजट बनाने में जित्ती मशक्त पहले करनी पड़ती थी, अब नहीं करनी पड़ रही। महंगाई दर में सुधार आने के बाद से अर्थव्यवस्था भी चमक मारने लगी है।

भक्तगण कह रहे हैं कि यह सब सरकार के 'अच्छे दिनों' की आर्थिक नीतियों का परिणाम है। महंगाई दर में कमी आना मतलब अच्छे दिनों में लौटना।

एक महंगाई दर में कमी आ जाने से, देख पा रहा हूं, भक्तगणों के 'सीने चौड़े' और 'चेहरे गुलाबी' हैं। बेहद डैशिंग अंदाज में वे सरकार और प्रधानमंत्री के अच्छे दिनों पर लेक्चर दे रहे हैं। एक भक्त मुझसे कह रहा था- देखा, मोदीजी के आते ही पाकिस्तान भी चुप्पा बैठ गया और महंगाई भी अपनी औकात में लौट आई। नहीं तो पिछली सरकार में महंगाई ने आम जनता के घर के बजट को 'डिसबेलैंस' करके रख दिया था। बस देखते रहिए मोदी सरकार महंगाई-दवाई-रूलाई-अफसरशाही आदि को कैसे काबू में लाती है।

चूंकि वो भक्त थे इसलिए महंगाई या अन्य मुद्दों के बाबत बात करना बेकार था, सो मैं 'जी हां' कहकर उनके पास से कट लिया। आजकल भक्तगणों के पास से कट लेने में ही भलाई है। एंवई उलझने से कुछ फायदा नहीं।

जब अखबारी आंकड़ें कह रहे हैं कि महंगाई दर में कमी आई है तो आई है। मान लीजिए न, आखिर मान लेने में हर्ज ही क्या है? अब तक महंगाई दर में जब भी कमी आई है या तो अखबारों के पन्नों पर आई है या फिर चैनलों की चमकीली स्टोरी में। वरना, मंडी में आलू की कीमत क्या है और बाजार में आइफोन-6 क्या कीमत है, पता चल जाएगा। जित्ते में लोग आइफोन-6 खरीद रहे हैं, उत्ते में तो आलू की कित्ती ही बोरियां आ जाएंगी प्यारे। गली-मोहल्लों, नाते-रिश्तों में बांटकर भी बची रहेंगी।

मगर इत्ता कौन सोचता है? हर कोई तो महंगाई दर के नीचे आने की खुमारी में डूबा दिख रहा है। सरकार ने दीवाली के आने पहले की जनता को महंगाई दर के घटने का का गिफ्ट एडवांस में दे दिया। बढ़िया है। अब सरकार भी खुश है और जनता भी। इसीलिए अब आप आलू के आयात के बाबत कुछ भी मत पूछिएगा। क्योंकि हम अब अच्छे दिनों में हैं।

चलिए, मैं भी अब माने लेता हूं कि महंगाई दर में कमी अच्छे दिनों का सुफल है। अच्छे दिन चाहे आंकड़ों में देखने को मिलें या नेताओं के मुंह से सुनने को, झेलना अंततः जनता को ही है। तो झेलिए और मस्त रहिए। ये अच्छे दिन हैं।

शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

हुदहुद के बहाने

चित्र साभारः गूगल
ज्योतिषी बताते हैं, जब ग्रह-नक्षत्र ठीक न चल रहे हों तो अन्य उपायों के साथ नाम बदलकर भी देख लेना चाहिए। नाम बदलने से बहुत फर्क पड़ता है। बिगड़े काम बनने लगते हैं। लाइफ में थोड़ा चेंज आता है। समाज के बीच एक नई पहचान बनती है।

कभी-कभी नाम फैशन के अनुरूप भी बदल लेना चाहिए। फिल्म लाइन में तो नाम बदलने का रिवाज-सा रहा है। वहां सितारे कुंडली और व्यक्तित्व के कारण भी नाम बदल लेते हैं। युसूफ साहब से लेकर गुलजार तक लंबी लिस्ट है। एकता कपूर तो इस मामले में दो कदम आगे हैं। वे ज्योतिषी के कहेनुसार अपने नाम के शब्दों को घटा-बढ़ा लेती हैं। एक एकता कपूर ही नहीं, वहां ऐसा कई सितारे करते हैं। बेशक आप उन्हें अंधविश्वासी कह सकते हैं, इससे उनकी सेहत पर फर्क नहीं पड़ता। अरे भई, अपना नाम है- चाहे नथ्थूलाल रखें या अंगूरीदेवी। चाहे नाम को घटाए-बढ़ाएं किसी को क्यों एतराज होना चाहिए?

इसीलिए मैं मेरे ज्योतिषी की बात मान अपना नाम बदल रहा हूं। ज्योतिषी ने कहा है, नाम बदल लेने से मेरी प्रसिद्धि समाज के साथ-साथ साहित्य जगत में भी एकदम से बढ़ जाएगी!

ज्योतिषी ने सलाह दी है कि मैं अपना नाम हुदहुद रख लूं। हुदहुद एक अच्छा और अलग-सा नाम है। आजकल खासा लाइम-लाइट में भी है। मेरी पर्सनाल्टी को सूट भी करता है। मुझे प्रायः ऐसे नामों की ही तलाश रहती है, जो सुनने-बोलने में भीड़ से कुछ अलग हों। ज्यादा कुछ नहीं तो सामने वाला नाम सुनकर हंस ही ले। मेरे नाम (हुदहुद) के बहाने अगर कोई हंस लेता है, तो काफी है मेरे लिए। मेरी कोशिश भी यही रहती है, चाहे मेरा चेहरा देखकर, मेरा लिखा पढ़कर, मेरा नाम सुनकर, मेरी हरकतें देखकर अगर कोई मुझ पर हंस-मुस्कुरा देता है तो इससे बड़ा सम्मान क्या होगा मेरे लिए। दूसरों पर हंसने और खुद पर हंसवाने में बहुत फर्क होता है प्यारे।

लोग खामखां अच्छे नाम की तलाश में गूगल करते रहते हैं, तूफानों के नाम पर नामकरण किया करें न। लैला, कैटरीना, सुनामी, नीलोफर, सैंडी, हुदहुद कित्ते ही खूबसूरत-खूबसूरत नाम हैं। ये ऐसे नाम हैं, जिनकी गिरफ्तर में अगर बंदा आ भी जाए तो खुद को 'लक्की' महसूस करे। मैं खुद चाहत हूं कि मैं ऐसे खूबसूरत नामों वाले तूफान की आगोश में कभी आऊं। चाहे तबाह क्यों न हो जाऊं। इस बहाने दुनिया में मेरा नाम तो होगा।

हुदहुद ने भले ज्यादा तबाही न मचाई हो पर टीवी चैनल वालों को टीआरपी का झुनझुना तो थमा ही दिया। रात-दिन चैनल वाले हुदहुद का झुनझुना बजाए चले जा रहे हैं। हुदहुद के आने-जाने की पल-पल की खबर चैनलों के पास है। मौसम विभाग से ज्यादा बेचैन तो चैनल वाले हैं। कुछ एंकरों ने तो इत्ता सहास दिखाया है कि हुदहुद को जहां पर आना था, वहीं पहुंचकर लाइव शो किया। हुदहुद के आने की खबर को इत्ते जोशिले अंदाज में बयां कर रहे थे मानो भारत-पाकिस्तान का वन-डे मैच होने जा रहा हो।

जब हुदहुद के नाम का फायदा टीवी चैनल वाले उठा रहे हैं तो फिर मैं क्यों उठाऊं, अपना नाम हुदहुद रखकर।

सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

फोर्ब्स मैगजीन और अरबपति लेखक!

चित्र साभारः गूगल
कुछ लेखक केवल व्यस्त रहते हैं और कुछ अति-व्यस्त। मैं, दरअसल, उन्हीं 'अति-व्यस्त' लेखकों में से एक हूं। न.. न.. मेरी अति-व्यस्तता को मेरा 'ढीगें हंकना' न समझें। यह उत्ता ही सत्य है, जित्ता शराब पीने के बाद शराबी का बहक जाना।

लेखकीय अति-व्यस्तता के चलते मैं बहुत से काम खुद नहीं निपटा पाता, उसे मेरा पीए देखता है। अक्सर पीए भी, मेरे छूटे कामों की वजह से, अति-व्यस्त सा रहता है। मेरी अति-व्यस्तता ही एक मात्र वजह रही, जो मेरा नाम फोर्ब्स मैगजीन के सौ अरबपतियों की सूची में शामिल न हो सका। वरना इरादा तो पक्का था।

जानता हूं, आपका माथा जरूर ठनका होगा, हिंदी के लेखक को भला अरबपतियों की सूची में क्यों होना चाहिए? फोर्ब्स का लेखक (वो भी हिंदी के) से क्या मतलब? क्यों भई.. क्यों नहीं होना चाहिए लेखक को अरबपतियों की सूची या फोर्ब्स मैगजीन में शामिल?

देखिए, वो अगर अरबपति उद्योगपति हैं तो मैं भी किसी 'अरबपति लेखक' से कम नहीं! क्यों.. आंखें फटी रह गईं न आपकी। तुरंत दिमाग में यह सवाल भड़का होगा- भला लेखक (वो भी हिंदी का) कैसे अरबपति हो सकता है? तो क्या अरबपति होना का एक मात्र अधिकार उद्योगपतियों को ही है? लेखक भी तो अरबपति हो सकता है, जैसाकि मैं हूं!

मुझे अरबपति मेरी लखकीय व्यस्तता ने बनाया है। दिन में चौबीस में से साढ़े बाइस घंटे तो मैं लिखता रहता हूं। इत्ती जगह लिखता हूं कि पैसा खुद-ब-खुद मेरे कने चलकर आता है। मैं कोई एंवई सस्ता-मद्दा लेखक नहीं हूं। एक लेख के मैं इत्ते रुपए चार्ज करता हूं, जित्ते में चेतन भगत अपनी किताब छपवा पाता होगा। चेतन भगत या अरविंद अडिगा अगर अंगरेजी में बेस्ट-सेलर लेखक हैं तो मैं हिंदी में हूं। हिंदी का कोई भी अखबार उठाकर देख लीजिए जहां मैं न छपता हूं। देश को छोड़िए, मेरे मोहल्ले का बच्चा-बच्चा तक मेरे नाम से परिचित है, ठीक अमिताभ बच्चन की तरह।

मैंने हिंदी का लेखक होकर यह सोचा तो कि मेरा नाम भी फोर्ब्स मैगजीन में होना चाहिए था। वरना तो हिंदी का लेखक दो-चार पत्रिकाओं में छपकर ही गद-गद होता रहता है। लेखन से जब तलक पैसा न कमाया या अंतरराष्ट्रीय स्तर की पत्रिका में नाम न आया, तो भला लेखन किस काम का? हाल यह है कि हिंदी में अरबपति लेखक तो छोड़ दीजिए, लखपति लेखक तक नजर नहीं आता। मेरे विचार में, हिंदी के लेखक को अपने 'आदर्शवाद' से बाहर निकलकर बाजार और फोर्ब्स जैसी महान मैगजीन से जुड़ना चाहिए।

हिंदी लेखन में स्थिति बड़ी विकट है। यहां अगर लेखक अपने दम पर चार पैसे ज्यादा कमा लेता है, तो पड़ोस के लेखक के पेट में 'कब्ज' बनना शुरू हो जाता है। इस बात की, जासूसों द्वारा, पड़ताल करवाई जाती है कि फलां हिंदी का लेखक किताब या लेखन से ही कमा रहा है या नंबर दो के धंधे से। हिंदी के लेखक की किताब की जहां चार-पांच सौ प्रतियां बिकी नहीं कि उसके लेखन के खिलाफ किस्म-किस्म के फतवे जारी होना शुरू हो जाते हैं। बेचारा लेखक खुद की कमाई को 'जस्टीफाई' करते-करते एक दिन 'डिप्रेशन' में चला जाता है।

लेकिन प्यारे मैं इन सब काना-फूसियों या जलनखोरों पर ध्यान नहीं देता। मेरे कने इत्ता समय ही नहीं है। मैं तो ठाठ से लिखता हूं और सीना ठोंककर पैसा मांगता हूं। आखिर दिमाग खपा रहा हूं, तो पैसा क्यों नहीं मागूंगा? जो ऐसा करने में विश्वास नहीं रखते या फिर अति-आदर्शवादी हैं, उनकी वे जानें।

चलिए, इस दफा नहीं अगली दफा ही सही पर फोर्ब्स मैगजीन की अरबपतियों की सूची में मैं आऊंगा जरूर। आखिर अरबपति लेखक हूं, क्यों शर्माऊं, यह स्वीकारने में।

रविवार, 12 अक्तूबर 2014

फेसबुक और भक्तगण

चित्र साभारः गूगल
फेसबुक पर भक्तगणों की पौ बारह है। हर भक्त अपने गुरु की दुकान (ग्रुप) खोले फेसबुक पर बैठा हुआ है। दुकान में गुरु की तस्वीर है। तस्वीर पर हर रोज एक अगरबत्ती जलाई जाती है ताकि गुरु के साथ-साथ दुकान भी महकती रहे। दुकान में हर वक्त किस्म-किस्म के भक्तगणों का मेला लगा रहता है। भक्तगण अपने-अपने गुरुओं के वचन-प्रवचन हर किसी को सुनाते रहते हैं।

भक्तगण अपने गुरुओं की इज्जत के प्रति बेहद सेंसटिव हैं। मजाल कि आप उनके गुरु की शान में फेसबुक पर कुछ कह-लिख दें। फिर आपकी खैर नहीं...। दुनिया भर की जित्ता मलामतें आपके खिलाफ दी जा सकती हैं, भक्तगण सब देते हैं। अपने गुरु के प्रति न उन्हें 'असहमति' पसंद है न 'आलोचना'। बेशक अपनी सफाई में तथ्य कित्ते ही पेश कर दीजिए पर भक्तगण कहां सुनने-मानने वाले हैं। अपने गुरु के प्रति 'अंधभक्ति' ही उन्हें ऑक्सीजन देती है फेसबुक पर आलोचना के खिलाफ फतवा जारी करने के लिए।

कभी-कभी भक्तगण एक-दूसरे से बेमतलब ही लड़-उलझ जाते हैं। आजकल फेसबुक पर राष्ट्रवादियों और वामपंथियों में जबरदस्त तू-तू, मैं-मैं छिड़ी हुई है। दोनों ही एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए तमाम प्रकार के आइटम पेश करने पर तुले हैं। एक वाद अपने गुरु को सर्वश्रेष्ठ बता रहा है तो दूसरा वाद अपने गुरु को। हां, दोनों वादों के बीच विचार का सिरा आप ढूंढ़ते रह जाएंगे। क्योंकि वैचारिक बहसबाजी दोनों को ही पसंद नहीं!

जैसे-तैसे प्रधानमंत्री की अमरीका यात्रा का गर्द-गुबार थमा, अब यह 'हैदर' फिल्म पर आन टिका है। फेसबुक पर दोनों ही वाद वाले 'हैदर' के पक्ष और विपक्ष में अपने-अपने दावे पेश कर रहे हैं। एक वाद के लिए फिल्म 'अद्भूत' है तो दूसरे वाद के लिए 'हकीकत से परे'। कमाल यह है, भक्तगणों की इस जंग में कुछ वो सियाने भी कूद पड़े हैं, जिन्होंने न फिल्म देखी है न उन्हें डाइरेक्टर का नाम मालूम है मगर फिर भी तू-तू, मैं-मैं में पूरे जोश के साथ लगे हैं। मानो, फिल्म उनके परिवार के ही किसी भाई-बंधु ने बनाई हो।

चूंकि फेसबुक अभिव्यक्ति के साथ जंग का खुला मैदान भी है तो भक्तगण अपनी-अपनी तलवारें यहां भांजते रहते हैं। तू-तू, मैं-मैं का नतीजा भले ही कोई न निकले पर भक्तगणों को तो भिड़ने से मतलब। भक्तगण दिन भर में जब तलक पांच-सात से भिड़ न लें, उनका खाना ही हजम नहीं होता। गुरु के प्रति चारण-भक्ति फेसबुक पर अपना असर किसी न किसी रूप में बनाए हुए है। तब ही तो भक्तगणों की फेसबुक पर मौजां ही मौजां है।

एकाध दफा मुझे भी अलां-फलां गुरु की दुकान (ग्रुप) में शामिल होने के निमंत्रण मिला है किंतु मैंने किसी की दुकान में कदम नहीं रखा। न रखने का विचार है। गुरु-भक्तों से जित्ता दूर रहो उत्ता ही अच्छा। यहां एंवई अपनी इज्जत का फलूदा बनते देर ही कित्ती लगती है प्यारे। न अपनी दीवार पर किसी गुरु-भक्त को कुछ लिखने दो, न किसी दीवार पर अपना कुछ लिखो। भक्ति बड़ी अजीब चीज होती है, कब, कहां, कैसे विकराल रूप धारण कर ले, क्या पता।

भई, मेरे तईं तो फेसबुक केवल टाइम-पास का जरिया है। जब दिमागी और दिली थकान मिटानी होती है, यहां आ जाता हूं। वन-लाइनर लिखकर अपनी शाब्दिक भूख को थोड़ा शांत कर लेता हूं। थोड़ा खुद हंस-मुस्कुरा लेता हूं। थोड़ा अगले को हंसा देता हूं। यों, इंसान की निजी जिंदगी में इत्ते दुख-तकलीफें हैं अगर फेसबुक पर आकर- हंसी-मजाक के बीच- कुछ कम होती हैं, तो बढ़िया है न। जिंदगी में अगर गम हैं तो खुशियां भी तो हैं। फेसबुक यही प्लेटफार्म हमें देता है पर क्या कीजिएगा, भक्तगणों ने तो इसे अपने अहम और दूसरे की औकात का माध्यम बना रखा है।

खैर, मुझे क्या; भक्तगणों की भक्त जानें और गुरुओं की गुरु।

फिलहाल, भक्तगणों के बीच किस्म-किस्म की जंग अभी भी जारी हैं।

गुरुवार, 9 अक्तूबर 2014

झाड़ू और सेल्फी

चित्र साभारः गूगल
झाड़ू और सेल्फी आजकल एक दूसरे के पूरक बने हुए हैं। फेसबुक औरटि्वटर पर झाड़ू के साथ सेल्फियों की बाढ़-सी आई हुई है। कल तलक जिस झाड़ू को 'हेय दृष्टि' से देखा जाता था, आज मंत्री से लेकर आम आदमी तक झाड़ू पकड़कर खुद पर 'गर्व' महसूस कर रहे हैं। स्वच्छता अभियान का हिस्सा बनने से ज्यादा कोशिश हो रही है, झाड़ू के साथ सेल्फी बनाकर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर डालने की।

भाई लोग झाड़ू के साथ सेल्फी लगाकर यह भी पूछ रहे हैं कि कैसा लग रहा हूं? कहीं से कोई सुधार करना हो तो बताएं? बताइए, फेसबुक औरटि्वटर के नशे ने भाई लोगों को इत्ता दीवाना बना दिया है कि अब झाड़ू के साथ सेल्फी पर भी राय मांगने लगे हैं। अगर राय न भी दें तो कम से कम लाइक ही मार दें।

प्रधानमंत्री के सफाई अभियान का जमीनी नफा-नुकसान चाहे जो निकले पर सोशल नेटवर्किंग पर इसे मस्त भुनाया जा रहा है। दरअसल, हम भारतवासी ऐसा मानते हैं कि हम खुद जरा भी गंदगी नहीं करते। वो तो दूसरा कर जाता है, जिसके कारण सुननी हमें पड़ती है। हम हमेशा इस प्रयास में रहते हैं कि केवल हमारा घर-कमरा ही स्वच्छ-साफ रहे, चाहे अपना कचरा पड़ोसी के दरवाजे के आगे क्यों न बिखेर दें। हम हमारे घर की सफाई देखकर यह अनुमान लगा लेते हैं कि न केवल पूरा भारत बल्कि पूरा विश्व साफ-सुथरा है। फिर हमें क्या जरूरत है, सड़कों-चौराहों-गली-मोहल्लों में बिखरे कूड़े-करकट को उठाने की? यह हमारी ड्यूटी थोड़े न है प्यारे।
 
अब देखिए न, कल स्वच्छता अभियान के तहत हाथ में झाड़ू थामे सेल्फी को फेसबुक-टि्वटर पर डालकर जिन-जिन ने सफाई की थी, आज वही सारी जगहें पुनः गंदी पड़ी हैं। अब उस जगह न कोई मंत्री हाथ में झाड़ू लिए नजर आ रहा है न मोहल्ले का सभासद। सब झाड़ू के साथ अपनी-अपनी तस्वीरें खींचवा कर, आराम फरमा रहे हैं। अखबारों में छपी अपनी तस्वीरों को देखकर प्रसन्न हो रहे हैं। और तो और वो जगह भी उसी तरह गंदी पड़ी है, जहां कल प्रधानमंत्री ने स्वयं झाड़ू लगाई थी, कचरा उठाया था।

लेकिन इस गंदगी पर ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं क्योंकि हमने बहुत कुछ सेल्फी के माध्यम से ही साफ कर दिया है। सड़क पर झाड़ू से सफाई करते हुए सेल्फी का फेसबुक या टि्वटर पर आना, हमारे सफाई-पसंद होने की 'सोशल निशानी' है। समाज और सोशल नेटवर्किंग की दुनिया में चीजें या प्राथमिकताएं अब 'जमीन' से नहीं बल्कि 'सेल्फी' से तय होती हैं। तब ही तो झाड़ू के साथ सेल्फी का चलन हमें महत्त्वपूर्ण बनाए हुआ है। सोने पर सुहागा फिल्मी हस्तियों का इस अभियान का हिस्सा बनना है।

खैर, हमें स्वच्छता अभियान की जरूरत से क्या मतलब, हमारा सेल्फी झाड़ू के साथ मस्त लग रहा है, ढेरों लाइक और कमेंट धड़ाधड़ आ रहे हैं, काफी है। बाकी सरकार जाने या प्रधानमंत्री।

सोमवार, 6 अक्तूबर 2014

क्यों न, 'झाड़ू की दुकान' खोल लूं

चित्र साभारः गूगल
फिलहाल, मैंने नौकरी छोड़ने का मन बना लिया है। बहुत देख लिया नौकरी करके। कुछ नहीं रखा, नौकरी में। तय किया है कि मैं अपने मोहल्ले के नुक्कड़ पर 'झाड़ू की दुकान' खोलूंगा। झाड़ू की दुकान खोलने का फैसला मैंने सरकार के 'स्वच्छता अभियान' के मद्देनजर लिया है। देश में झाड़ू का इन दिनों अच्छा-खासा 'क्रेज' भी देखने-सुनने को मिल रहा है। जिसे देखो- सरकारी मंत्री से लेकर प्राइवेट कर्मचारी तक- हर कोई अपने मोहल्ले या दफ्तर में झाड़ू ताने खड़ा है, सफाई करने को। जब सरकार स्वच्छता बरतने को बार-बार कह रही है तो फिर मैं क्यों न झाड़ू की दुकान खोलकर इस महा-अभियान में हाथ बटाऊं।

झाड़ू ही एक मात्र ऐसा अस्त्र है, जिससे न केवल सड़कों-चौराहों, बल्कि अच्छों-अच्छों की अच्छे से सफाई की जा सकती है। झाड़ू चलाकर आप न केवल घर बल्कि बॉस की निगाह में भी तारीफ के हकदार बन सकते हैं। मैं अपने लेखन से जब भी छुट्टी पाता हूं, घर-बाहर खूब शौक से झाड़ू लगाता हूं। झाड़ू लगाने में मुझे आनंद की प्राप्ति जैसा फील होता है।

चूंकि झाड़ू का इस्तेमाल मेरी रग-रग में बसा है इसलिए निश्चिंत हूं कि मैं अपनी दुकान को बेहतर चला पाऊंगा। मुझे झाड़ू ही तो बेचनी है। यह कौन-सी बड़ी बात है। जब मैंने इत्ते-इत्ते हैवीवेट शेयर बेच डाले फिर झाड़ू क्या चीज है! बाजार का आदमी हूं, बहुत अच्छे से जानता हूं कि कौन-सा प्रॉडेक्ट कब, कहां, कैसे बेचना है।

झाड़ू को मैं केवल अपनी दुकान से ही नहीं, ऑन-लाइन शॉपिंग पोर्टल से भी बेचूंगा। आजकल लोग रिटेल मार्केट से कम ऑन-शापिंग से खरीददारी ज्यादा करने लगे हैं। ऑन-लाइन शापिंग ने तो खरीद-बेच की मानसिकता को ही बदल डाला है प्यारे।

आगे मेरा प्लान यह भी है कि झाड़ू की दुकान चल निकलने के कुछ दिनों बाद, एनएससी-बीएससी एक्सचेंज में, इसका शेयर भी लिस्ट करवाऊंगा। कित्ता अद्भूत लगेगा, जब मेरे झाड़ू के शेयर की खरीद-फरोख्त स्टॉक एक्सचेंज में होगी। बाजार की दशा-दिशा को तय करने में एक शेयर मेरा भी होगा। वाकई बाजार ने हमें कित्ती तरह की संभावनाओं के बीच ला खड़ा किया है। बस बेचने का हुनर आपके कने होना चाहिए फिर सबकुछ बिक सकता है।

क्या हर्ज है अगर सरकार के स्वच्छता अभियान के सहारे मेरी झाड़ू की दुकान चल निकलती है। मेरी देखा-देखी झाड़ू के बिजनेस में और भी काबिल आएंगे, बाजार के सहारे अपने झाड़ू-प्रॉडेक्ट को बेचने के लिए। हो सकता है, कल को टाटा-अंबानी-अडानी भी उतर जाएं, झाड़ू के बाजार में। तब तो कंपीटिशन और भी तगड़ा मगर मस्त हो जाएगा प्यारे। तब पता चलेगा लोगों को कि एक झाड़ू न केवल देश बल्कि बाजार की किस्मत भी बदल सकती है।