मंगलवार, 9 सितंबर 2014

सेंसेक्स के अच्छे दिन

चित्र साभारः गूगल
सेंसेक्स एक दफा फिर से 'टॉप' पर है। टॉप पर पहुंचकर 'मुस्कुरा' रहा है। सेंसेक्स का इस तरह से मुस्कुराना मुझे अच्छा लगता है। सेंसेक्स की मुस्कुराहट बताती है कि अर्थव्यवस्था में 'अच्छे दिन' आना शुरू हो गए हैं। हालांकि सेंसेक्स के लिए अच्छे दिन का इंतजार काफी 'संघर्षपूर्ण' रहा फिर भी उसने 'हिम्मत' नहीं हारी। आड़े-तिरछे वक्त में हिम्मत न हारना सेंसेक्स का 'पैशन' रहा है।

दलाल पथ पर लगभग छह-सात साल बाद लौटती खुशियां 'संबल' देती हैं। पता चलता है कि सेंसेक्स सरकार के कामकाज से प्रसन्न है। सरकार अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के साथ-साथ सेंसेक्स के बारे में भी सकारात्मक सोच रही है। सकारात्मक सोच ही सेंसेक्स को मजबूत बनाए हुए है। सेंसेक्स की मजबूती में ही अर्थव्यवस्था और दलाल पथ की तरक्की निहित है।

अभी सरकार को आए महज सौ दिन ही तो हुए हैं। इन सौ दिनों में सेंसेक्स ने छब्बीस हजार से ऊपर पहुंचकर वो कर दिखाया है, जो शायद इत्ती जल्दी संभव न था। सेंसेक्स की चढ़ाई में आती मजबूती पर यों अफवाहें तो बहुत थीं कि- अब-तब गुब्बारा फटा ही। अब सेंसेक्स धड़ाम हुआ। अब तेजी का सफर थमा- मगर प्यारा सेंसेक्स न हिला न डिगा। हां, कुछ दिन गड़बड़-सड़बड़ जरूर रहे पर सेंसेक्स उनसे पार पा ही गया।

विपरित परिस्थियों से पार पाना सेंसेक्स का स्वभाव रहा है। अपने जीवन में सेंसेक्स ने इत्ता-इत्ता झेला है, इत्ती-इत्ती गिरावटें-ठोकरें खाई हैं कि साहस खुद-ब-खुद ही आता चला गया। साहस का दूसरा नाम ही तो सेंसेक्स है प्यारे।

सेंसेक्स के मूड से पता चल रहा है कि उसे प्रधानमंत्री की जापान यात्रा से काफी लाभ हुआ है। भारत और जापान की निजी एवं व्यापारिक गलबहियां सेंसेक्स को पसंद आ रही हैं। सेंसेक्स को भीतर से बल मिल रहा है, खुद को मजबूत करने-बनाने का। आखिर क्यों न हो, सेंसेक्स हमारी गुलाबी अर्थव्यवस्था की आन-बान-शान जो है। सेंसेक्स की स्थिरता, अर्थव्यवस्था की मजबूती, विकास का पैमाना ही तो आधुनिक भारत की मिसाल है। पिछली सरकारों ने तो आधुनिकता के नाम पर केवल सपने ही देखे और दिखाए थे। बेचारे सेंसेक्स की भद्द पिटी सो अलग। गिरा-गिराकर बेचारे सेंसेक्स को अधमरा-सा कर दिया।

मगर हाल के दिनों में सेंसेक्स में आती जान काफी 'आश्वस्त' करती है। सेंसेक्स के आते अच्छे दिन आर्थिक सकारात्मकता का संकेत देते हैं। और चाहिए भी क्या हमें...।

किंतु लगने वालो को लगता है कि सेंसेक्स के अच्छे दिन और अर्थव्यवस्था में खुशहाली 'क्षणिक' है। विकास की बात दिखावटी है। जापान के साथ दो लाख दस हजार करोड़ का निवेश 'बेमानी' है। अच्छे दिन सिर्फ नारा भर हैं, हकीकत कुछ और है। लेकिन हकीकत को दिखाने या बतलाले की हिम्मत कोई नहीं करता। फेसबुक या टि्वटर पर 'शाब्दिक क्रांति' कर, कुंए में से टर्र-टर्र की आवाजें निकालते रहते हैं सब के सब। शायद वे इस कॉस्पेट को समझना ही नहीं चाहते कि सेंसेक्स की सक्सेस और अर्थव्यवस्था की मजबूत किसी एक के लिए नहीं, हम सब के लिए है।

खैर, जो नहीं समझना चाहते न समझें- मुझे या सेंसेक्स को क्या। दो-चार विकासविरोधियों के कारण न मैं न सेंसेक्स मुस्कुराना थोड़े ही न छोड़ देंगे। मुरझाए चेहरे को यह खासियत होती है कि वे न कभी खुद मुस्कुराते हैं न मुस्कुराने देते।

अभी तो यह प्यारे सेंसेक्स के मुस्कुराने की शुरूआत भर है- आगे-आगे देखिए अच्छे दिन कैसे और नजदीक आते हैं- सेंसेक्स, सरकार और अर्थव्यवस्था की बदौलत।

4 टिप्‍पणियां:

रचना त्रिपाठी ने कहा…

:)

कविता रावत ने कहा…

मुस्कुराने के पीछे का राज बहुत देर से समझ आता है !
यह भी के कला है

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा…

बरखुर्दार, थोड़ा धैर्य रखिए। कहीं नजर न लग जाय।
इसका उछलना तो अच्छा है लेकिन हमारा उछलना अभी ठीक नहीं। :)

वाणी गीत ने कहा…

यदि अच्छे दिनों के लिए है सेंसेक्स का बढ़ना तो खुश रहना चाहिए। वरना रोने को क्या बहाना चाहिए !