बुधवार, 3 सितंबर 2014

मोदी का डंका और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का पेट दर्द

चित्र साभारः गूगल
मोदी जापान क्या गए मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के पेट 'गड़बड़ा' गए। आए दिन मोहल्ले का कोई न कोई बुद्धिजीवि अपना पेट पकड़े मुझे नुक्कड़ पर ऊकड़ू बैठा नजर आता है। एकाध दफा मैंने उनके पेट का हाल जानने की कोशिश भी की किंतु मुझे कुछ नहीं बताया गया। कुछ नहीं.. कुछ खास नहीं- कहकर टाल गए। यों भी, मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील बुद्धिजीवि मुझे पसंद नहीं करते। उनकी निगाह में मैं दुनिया सबसे बेअक्ल और बकबास इंसान (लेखक) हूं। यही वजह है, मुझसे वे अपनी कोई बात शेयर नहीं करते। केवल अपने प्रगतिशीलों के गुट में ही तीर-तुक्के छोड़ते रहते हैं।

खैर। मुझे क्या...। मैं जो हूं सो हूं। जब मेरा मुझ पर बस नहीं चलता फिर प्रगतिशील बुद्धिजीवि तो बहुत दूर की बात हैं प्यारे।

ऐसा नहीं है कि मोदी के जापान जाने, जापान में अपना डंका बजाने, जापान के रास्ते बुलेट ट्रेन के सपने को सच बनाने, के पेट दर्द से मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील बुद्धिजीवि ही बेचैन हैं, दरअसल, यह बेचैनी देश की पूरी प्रगतिशील बुद्धिजीवि बिरादरी में है। गाहे-बगाहे देश के प्रगतिशील बुद्धिजीवि अपने पेट दर्द (या गड़बड़ी) को फेसबुक या टि्वटर पर बयां भी कर रहे हैं। उनके पेट सबसे अधिक इसीलिए भी दुख रहे हैं कि कैसे मोदी ने जापान को भारत के इत्ता करीब ला दिया! व्यापार से लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र तक में अपना डंका बजवा दिया! जो चीन में होना चाहिए था, वो जापान में कैसे हो गया! विकास के सिद्धांत और भाषा (हिंदी) की चमक ने तो बाजी ही पलटकर रख दी प्यारे।

यह करिश्मा देखकर प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के साथ-साथ हमारा विपक्ष भी खासा 'हैरान' है लेकिन अपनी हैरानी को व्यक्त करने की स्थिति में नहीं है। शायद इसीलिए उनके मंत्रीगण अपनी खीझ कुछ दूसरी तरह से निकाल और मिटा रहे हैं। मोदी ने तो खिसायानी बिल्लियों को खांबा नोचने तक की स्थिति में भी नहीं छोड़ा। हाय...।

मैंने देखा था- जापान में मोदी जब बांसुरी और ड्रम बजा रहे थे- मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों ने कानों में रूई ठूंस रखी थी ताकि परदे सलामत रहें। वैसे, मैंने सुना है कि प्रगतिशील बुद्धिजीवि कान के बेहद कच्चे और उधार की विचारधारा के बेहद पक्के होते हैं। प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के कानों पर मेरा कोई जोर तो नहीं, मैं तो बस अपने कानों की फिकर कर सकता हूं। कर रहा हूं।

सच बताऊं, मैं मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की मोदी सरकार पर की गई टिप्पणियों को ज्यादा गंभीरता से लेता भी नहीं क्योंकि ऐंवई टिप्पणियां करते रहना उनकी आदात में शुमार है। वे पिछली सरकारों पर भी ऐसे ही टिप्पणियां करते रह चुके हैं। शायद टिप्पणियां कर-कर ही वे अपने पेट की गड़बड़ी (दर्द) को शांत कर लेते हों। जब बंदे कने अपना करने को कुछ नहीं होता तो वो सिर्फ टिप्पणियां करता है ताकि जुबान और पेट का हाजमा दुरुस्त रहे।

देखो प्यारे, न पिछली सरकारें चली हैं न वर्तमान सरकार प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के भुनभुनाने या रूठने से चलने वाली है। सरकार को जो करना है, करेगी ही। फिर भी अगर मेरे मोहल्ले या देश के प्रगतिशील बुद्धिजीवि अपने पेट को गड़बड़ (दर्द) रखना चाहते हैं तो शौक से रखें। क्योंकि पेट है उनका। है कि नहीं...।

4 टिप्‍पणियां:

Digamber Naswa ने कहा…

dheere dheere is pet dard se cheekhen uthni bhi shuru hongi .. intzaar ... thoda intzaar ...

कविता रावत ने कहा…

प्रगतिशील बुद्धिजीवि अपने पेट को गड़बड़ (दर्द) रखना चाहते हैं तो शौक से रखें। क्योंकि पेट है उनका। है कि नहीं...।
..बहुत सही ...

रचना त्रिपाठी ने कहा…

बहुतों को तो प्रधानमंत्री के परिधान से भी एलर्जी हो रही है। :)

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

हमें कमियां निकलने की आदत है , क्योंकि दूसरों की काबलियत पर हमेशा प्रश्न हो उठाये हैं ?