रविवार, 28 सितंबर 2014

@ मंगल ग्रह

चित्र साभारः गूगल
यह बात मैंने पहले कभी किसी को नहीं बताई पर आज आप सब को बता रहा हूं।

मैं, अपने पूरे होशो-हवाश में, यह कहना चाहता हूं कि मैं घरती से सीधा मंगल ग्रह पर 'शिफ्ट' हो रहा हूं। घरती पर रहने का अब मेरा न तो कोई विचार है न ही मन। घरती पर मुझे अपना जीवन 'बोरिंग' नजर आता है। घरती पर पाप लगातार बढ़ रहा है और आदमी भी संकुचित-सा होता चला जा रहा है। इत्ते साल मैंने घरती पर कैसे काटे, यह बस मैं ही जानता हूं। अब मैं घरती पर अपना 'बोझ' और नहीं बढ़ाना चाहता।

हालांकि पहले मेरा विचार मंगलयान के साथ ही मंगल ग्रह पर जाने का था लेकिन फिर मुझे बताया गया कि, कुछ 'तकनीकी कारणों' से, मेरी सीट कन्फर्म न हो सकी है। इसीलिए मैं बाद में आ सकता हूं। मंगलयान के साथ मंगल ग्रह पर पहुंचने का मुझे दुख केवल इत्ता रहा- पहले मैं सरकारी खर्चे पर जाता मगर अब निजी खर्चे पर जाना पड़ेगा। खैर, कोई नहीं बर्दाशत कर लूंगा। जब जाना है तो जाना है, इसमें खर्चे क्या देखना।

मंगह ग्रह पर रहने में मुझे ज्यादा दिक्कत इसलिए भी न होगी क्योंकि वो मेरा पहले से ही देखा-भला है। जानता हूं.. जानता हूं.. यह सुनकर आप लोग थोड़े 'चौंके' जरूर होंगे पर यह सौ फीसद सच है। करीब चालीस के दशक में मैं मंगल ग्रह पर गया था, जमीन खरीदने के वास्ते। मंगल ग्रह पर जमीन मैंने वहां रह रहे 'मंगल ताऊ' से खरीदी थी। और बहुत ही सस्ते दामों में खरीदी थी। लेकिन यहां घरती पर मैंने किसी को बताया इसीलिए नहीं था, खामखां बात का बतंगड़ न बन जाए। वैसे मंगल ताऊ मुझसे मंगल ग्रह पर खाली पड़ी जमीनों की 'मार्केटिंग' के लिए बोले भी थे। मगर मैंने यह कहते हुए मना कर दिया था, खामखां मंगल ग्रह पर बोझ बढ़ाने से क्या फायदा? घरती का बोझ घरती पर ही बना रहे तो अच्छा।

फिलहाल, अभी तो मंगल ग्रह पर मैं अकेला ही जाऊंगा। पत्नी-परिवार को साथ नहीं ले जाऊंगा। वे लोग वहां बोर ही होंगे। आजू-वाजू कोई होगा नहीं बोलने-बतियाने को। पता नहीं मंगल ताऊ अभी वहां हैं भी या खर्च हो लिए। अब मकान बनवाने के लिए मंगल ग्रह पर मजदूर तो मिलने से रहे इसीलिए केवल मजदूरों को साथ लेकर जाऊंगा।

मैं जानता हूं, घरती से मंगल ग्रह का चक्कर लगाना इत्ता आसान नहीं। सबसे बड़ी परेशानी 'कनवेंस' की रहेगी। पर धीरे-धीरे कर उसे भी मैनेज कर लूंगा। एक 'मंगलयान' मैं भी खरीद लूंगा। जहां इत्ते खर्चे होंगे, वहां एक मंगलयान का और सही। क्यों प्यारे, ठीक है न...।

अब जब मुझे रहना ही मंगल ग्रह पर है तो मकान के साथ दुकान भी वहीं बनाऊंगा। मंगल ग्रह पर स्पेयर पार्ट्स की दुकान खोलने का मन है मेरा। इस बारे में इसरो के वैज्ञानिकों से थोड़ा और डिस्कस कर लूं। मुझे उम्मीद है, स्पेयर पार्ट्स का काम वहां 'चकाचक' चलेगा। यों भी, आए दिन किसी न किसी ग्रह या यान आदि के पार्ट्स में खराबी आती ही रहती होगी। मेरी दुकान खुल जाने से उन्हें भी आसानी हो जाएगी और मेरा भी काम चलता रहेगा।

मंगल ग्रह को राजनीतिक और बौद्धिक प्रदूषण-रहित रखने के लिए जरूरी होगा कि नेताओं और बुद्धिजीवियों की एंट्री वहां वर्जित हो। घरती पर जिस तरह से ये लोग राजनैतिक और वैचारिक 'गंध' फैलाए हुए हैं, उससे घरती के सीधे-साधे प्रणियों का बहुत नुकसान हो रहा है। गलती से भी अगर ये लोग मंगल ग्रह पर पहुंच गए तो ग्रह का कबाड़ा सुनिश्चित समझिए।

मंगल ग्रह पर मुझ जैसे गैर-राजनीतिक और बे-बुद्धिजीवि व्यंग्यकार ही पहुंचे तो ज्यादा ठीक रहेगा। सब जानते हैं, व्यंग्यकार से घरती पर कोई नाराज नहीं रहता। फिर भी, जो नाराज रहते हैं, वे किसी न किसी 'फ्रस्टेशन' का ही शिकार हैं।

चलिए, अब मैं भी निकल रहा हूं मंगल ग्रह के लिए। मंगलयान तो पहुंच ही गया। मंगलयान के सभी यात्रियों को मेरी शुभकामनाएं।

और हां, मंगल ग्रह पर मेरा पता- @ मंगल ग्रह हो जाएगा। कृपया, नोट कर लें।

3 टिप्‍पणियां:

yashoda agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना मंगलवार 30 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

yashoda agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना मंगलवार 30 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

Smita Singh ने कहा…

bahut badhiya