गुरुवार, 25 सितंबर 2014

फॉट्टी से पहले की नॉट्टीनेस

चित्र साभारः गूगल

मेरे फॉट्टी का होने में अभी दो साल शेष हैं। लेकिन हरकतें मैं (अभी से) फॉट्टी प्लस वालों की सी करने लगा हूं। दिन-प्रति-दिन नॉट्टी-सा होता जा रहा हूं। मेरी नॉट्टी-सी हरकतों को देखकर अब पत्नी भी मुझ पर 'शक' करने लगी है। लगातार मुझ पर, मेरे स्मार्टफोन पर, मेरे फेसबुक औरटि्वटर पेज पर पैनी निगाह रखने लगी है। प्रायः चैट-बॉक्स को खोलकर उसमें आए संदेशों को पढ़ने लगी है।

हालांकि मैंने पत्नी की इस 'शकबाजी' का कभी बुरा नहीं माना मगर फिर भी अंदर ही अंदर डरता हूं कि कहीं कोई विचित्र-सा संदेश या रंगीन-सी फोटू उसके हत्थे न चढ़ जाए। इसीलिए समय-समय पर फेसबुक और वाह्ट्स एप संदेशों-फोटूओं को 'क्लीन' करता रहता हूं। ताकि रायता न फैले।

लेकिन थट्टी या फॉट्टी की उम्र में 'नॉट्टी' होने का मजा ही कुछ और है प्यारे। इस उम्र में दिल ज्यादा दिलकश और निगाहें अधिक रंगीन हो जाती हैं। सपनों की खुमारी में 'मौलिक सुख' मिलता है। खुद में 'जवान' होने का अहसास हर पल दम मारता रहता है। आसपास हसीन चेहरों को देखकर चेहरे का मानचित्र खुद ब खुद निखरने लगता है।

मुझे यह सब अधिक इसीलिए महसूस होता है क्योंकि मेरी आदत बचपन से ही 'दिलकश' या कहूं 'दिल फेंक' किस्म की रही है। मेरे नानाजी बताते थे- जब मैं हुआ था तब मैंने नर्स को भी लाइन मारने में कोई कसर बाकी नहीं रख छोड़ी थी। हर वक्त दिल यही करता था कि मैं नर्स की बाहों और दिल के करीब रहूं।

फिर बचपन से जवानी तलक आते-आते जाने कित्ते इश्कनुमा रायते मैंने फैला डाले, मुझे खुद ठीक से नहीं मालूम। बताते हैं, मेरी आशिकमिजाजी से तंग आकर पड़ोस की खूबसूरत लड़कियों ने मुझसे दूरी बन ली थी। फिर भी, मैं अपनी आदत में रत्तीभर सुधार नहीं लाया। सुधार लाता भी क्यों; कौन-सी जिंदगी बार-बार मिला करती है, मस्ती मारने या नॉट्टी होने को।

हां, मैं अपनी नॉट्टीनेस को लेकर कभी 'सीरियस' नहीं हुआ। इसमें सीरियस होने जैसा मुझे कभी कुछ लगा ही नहीं। नॉट्टी होकर मुझे जिंदगी ज्यादा आसान और हसीन लगती है। बेमतलब की परेशानियों और यहां-वहां की उठक-पटक से मैं 'बेफिक्र' रहता हूं। दिल में हर दम और जीने और इश्क के प्रति जवां रहने का जज्बा बना रहता है। नहीं तो आदमी थट्टी के बाद से ही खुद को बुढ़ा मानने लगता है। खुशी है कि मैं इस 'दुश्चक्र' से कोसों दूर हूं।

मैं तो हर थट्टी और फॉट्टी प्लस वालों से यही कहता हूं कि जिंदगी में 'नॉटीनेस' बनाए रहो ताकि दिल जवां और सांसें महकती रहें। बाकी तो जो है सो है ही...।

1 टिप्पणी:

Archana ने कहा…

काले पर सफ़ेद अक्षर पढ़ने मे बहुत दिक्कत आती है मुझे .... पढ़ना चाहती हूं पर पढ़ना आंखों को सहज नहीं हो पाया ...चश्में के कारण ..:-(