रविवार, 21 सितंबर 2014

चीन, जिनपिंग और चाऊमीन

चित्र साभारः गूगल
सारा 'क्लाइमेट' जिनपिंग-मय हो रखा है। जहां-जिधर देखो जिनपिंग के ही चर्चे हैं। लोग जागते-सोते, टलते-दौड़ते, हंसते-बतियाते, विचारते-बहसियाते जिनपिंग पर ही बात करना पसंद कर रहे हैं।फेसबुक और टि्वटर पर मोदी से कहीं ज्यादा जिनपिंग पर लिखा-पढ़ा जा रहा है। मैंने सुना है कि मेरे मोहल्ले के कुछ दीवानों ने अपना नाम ही उर्फ जिनपिंग रख लिया है। घर के बाहर चिप्पी चिपकाकर और न्यूजपेपर में इश्तहार छपवाकर कन्फर्म किया है, अब से उन्हें उर्फ जिनपिंग नाम से ही जाना-पहचाना जाए। क्या बात है।

खबरिया चैनलों को देखकर ऐसा लग रहा है कि देश-समाज से दूसरी सारी समस्याएं समाप्त हो चुकी हैं। इस वक्त अगर कुछ खास है तो बस जिनपिंग, मोदी, चीन और घुसपैठ है। चीनी मामलों के बड़े-बड़े जानकार टीवी पर आकर ऐसा ज्ञान बघार रहे हैं, ऐसी-ऐसी सलाहाएं दे रहे हैं कि मेरा माथा चकराएमान है। समझ नहीं पा रहा कि किस खबरिया चैनल को देखूं, किसे छोड़ दूं। चीन और जिनपिंग के शो के बीच कश्मीर की बाढ़ और विस्थापितों का दर्द धीरे-धीरे कर फ्लैशबैक में जाने लगे हैं। भाजपा की हालिया हार पर बहस डाइवर्ट और भाजपा-शिव सेना की तकरार पर फोकसड हो गई है।

क्या अजीब माहौल है, एक तरफ चीन बेखौफ होकर भारतीय सीमा के अंदर घुसा चला आ रहा है और दूसरी तरफ समझौते पर समझौते हुए जा रहे हैं। आपस में शांति, विश्वास, व्यापार, अहिंसा की कसमें खाई जा रही हैं। जिनपिंग जाने कित्ते डॉलर का निवेश भारत में करने पर राजी हो गए हैं। इस खबर पर सेंसेक्स उछल कर एक ही दिन पांच सौ अंक की बढ़त बना गया है। न केवल दलाल पथ बल्कि अर्थव्यवस्था में भी खासा तेजी आने के अनुमान लगाए जा रहे हैं। ऐसा ही प्रधानमंत्री की जापान यात्रा के टाइम पर भी हुआ था।

सुनने में यह भी आया कि लोग गूगल पर जिनपिंग से ज्यादा चाऊमीन (बिना पनीर वाली) बनाने की रेसिपी खोजने में लगे हैं। कुछ को मैंने यह कहते भी सुना है कि वे कोशिश करेंगे, इस रेसिपी के बारे में जिनपिंग की पत्नी से जानकारी ले सकें। लगता है, इंडिया वाले इंडियन-विधि से तैयार चाऊमीन खाते-खाते बोर हो गए हैं। अब वे चाऊमीन में प्योर चायनीज-प्लेवर लाना चाहते हैं। मेरे मोहल्ले के नुक्कड़ पर चाऊमीन का ठेला लगाने वाला चाऊराम भी प्योर चायनीज रेसिपी की जुगाड़ में है।

वो सब तो ठीक है मगर कुछ प्रगतिशील टाइप के लोग भारत के चीन संग पेंगे बढ़ाने पर भीतर ही भीतर खिसिया रहे हैं। इस समय वे गहन वैचारिक चिंतन में व्यस्त हैं। अपनी पीढ़ा को रह-रहकर फेसबुक पर शेयर भी कर रहे हैं। परंतु दुख यह है कि उनके स्टेटस पर न कोई 'लाइक' दबा रहा है न 'कमेंट' चिपका रहा। इससे वे और भन्नाए हुए हैं। इस वक्त उन्हें हर जिनपिंग-प्रेमी अपना दुश्मन नजर आ रहा है। जिसमें से एक मैं भी हूं। क्या कीजिएगा, प्रगतिशील बिरादरी की तो पुरानी आदत है खुशी और उत्साह के बीच मुंह पर बारहा बजाने रखने की।

समझदारी तो यह होती है कि थोड़ी खुशी को भी बहुत माना जाए। जिनपिंग की यात्रा के बहाने हमें जो उत्साह मिला है क्यों न उसे बरकरार रखा जाए। वरना हर बात में कील तो कहीं भी, कैसे भी ठोकी जा सकती है।

जिनपिंग-मय माहौल में चाऊमीन का लुत्फ लीजिए। चीनी सैनिकों के अब पीछे हटने पर मुस्कुराइए। मोदी की विदेश नीति का उत्साहवर्धन कीजिए। जो कसमसा रहे हैं ,उन्हें कसमसाने दीजिए। सकारात्मकता बड़ी चीज है। इसे बनाए रखिए। वरना तो जो है सो है ही। क्यों प्यारे...।

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