शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

हार पर मुस्कुराते प्रगतिशील

चित्र साभारः गूगल
आज कई महीनों के पश्चात मैंने अपने मोहल्ले के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के चेहरों पर 'खुशी' देखी है। उनको घर से बाहर निकलते देखा है। मोहल्ले के नुक्कड़ पर आपस में बतियाते देखा है। उनमें कुछ ऐसे भी हैं, जो आज महीनों बाद नहाए हैं। नहाने के बाद लोटा-केला-फूल लेकर मंदिर गए हैं। (ओह! यह बात मुझे यहां लिखनी नहीं थी। चलिए खैर...)। मोहल्ले में पूरनलाल मिठाई वाले की दुकान पर भी प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की अच्छी-खासी भीड़ है। सभी आपस में एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर बधाई-शुभकामनाएं दे रहे हैं। दो-चार तो 'भोग' भी लगा आए हैं। लेकिन मुझसे सब के सब प्रगतिशील बुद्धिजीवि कन्नी काटे हुए हैं। क्योंकि, उनकी निगाह में, मैं ठहरा भाजपा का आदमी। मुझे चिढ़ाने के लिए उपचुनाव में मिली करारी हार के बहाने अच्छे दिनों की ऐसी-तैसी करने में लगे हैं।

खुशी की यह लालिमा एक केवल मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के चेहरों पर ही नहीं बल्कि देश भर के प्रगतिशीलों के चेहरों पर इस समय कायम है। सभी प्रगतिशील टीवी पर आ-आकर भापजा के अच्छे दिनों का बैंड बजाने में लगे हैं। एक से बढ़कर एक नेक सलाहें वो भाजपा और प्रधानमंत्री को दे रहे हैं। पर उनकी सलाह में 'नैतिकता' कम 'हास्य' अधिक है। हास्य होना भी चाहिए आखिर भाजपा उपचुनाव में औंधे मुंह जो गिरी है। यों भी, गिरने वाले की जब तलक हम खुलकर खिल्ली न बना या उड़ा लें, पेट का हाजमा ठीक बैठ नहीं पाता। चलिए कोई नहीं, उपचुनाव में मिली हार के बहाने ही सही, कम से कम प्रगतिशील बिरादरी अपने-अपने दबड़ों से बाहर तो निकली। नहीं तो चौबीस घंटे मोहर्रमी-सी सूरत बनाए कोसा-कासी में ही व्यस्त रहते थे।

लेकिन प्यारे जनता का भी जवाब नहीं। कब, किसे, कहां, कैसे धोबी पछाड़ दे दे। कुछ नहीं कह सकते। जनता की अपनी कैल्कूलेशन होती है और नेताओं की अपनी। अक्सर देखा गया है, नेताओं की कैल्कूलेशन पर जनता की कैल्कूलेशन ही भारी पड़ती है। उपचुनाव में भाजपा के साथ यही तो किया जनता ने। अच्छे दिन.. अच्छे दिन.. के चक्कर में जनता ने भाजपा को बुरे दिनों के बीच फंसा दिया। इसीलिए तो कहते हैं, 'आत्ममुग्धता' न राजनीति में अच्छी होती है न जीवन में। आत्ममुग्धता की जब 'वाट' लगती है तो फिर न पार्टी न नेता कहीं के नहीं रहते।

मुझे हंसी आती है उन पर भी जो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तर्ज पर पार्टियों-नेताओं की हार-जीत पर जश्न मनाते हैं। जैसे मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील बुद्धिजीवि लोग इस समय कर रहे हैं। चुनाव में पार्टी चाहे कोई भी जीते या हारे पर हमारा बुद्धिजीवि वर्ग (खासकर प्रगतिशील किस्म का) बल्लियों उछलना नहीं भूलता। उस बेचारे को दूसरे की शादी में नाचकर ही असीम सुख मिलता है। क्योंकि उसकी अपनी पार्टी का जो हाल है, उस पर सिर्फ 'अफसोस' ही जतलाया जा सकता है।

उपचुनाव के 'करारे नतीजे' भाजपा के तईं साफ संकेत हैं कि संभल जाओ प्यारे वरना जनता कहीं का नहीं छोड़ेगी। केवल एक ही व्यक्ति के कंधे पर बंदूक रखकर अगर चलाओगे तो एक दिन न कंधा बचेगा न बंदूक। अच्छे दिन 'लव जिहाद' के शगूफे से नहीं 'जन-हित' से आएंगे।

अब भी अगर न चेते तो फिर न केवल मेरे मोहल्ले के बल्कि पूरे देश के प्रगतिशील बुद्धिजीवि ऐसे ही मिठाईयां बांटेंगे और जश्न मनाएंगे। बाकी आपकी मर्जी...।

2 टिप्‍पणियां:

kuldeep thakur ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति...
दिनांक 22/09/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
सादर...
कुलदीप ठाकुर

Lekhika 'Pari M Shlok' ने कहा…

Saarthak va prabhawi aalekh..