सोमवार, 15 सितंबर 2014

भूत-भूतनियों के प्रति मेरा प्रेम

चित्र साभारः गूगल
मुझे भूत-भूतनियां बेहद पसंद हैं। जब भी मुझे खाली समय मिलता है या तो मैं भूतों के बारे में पढ़ता हूं या भूतिया फिल्में देखता। भूतिया फिल्में देखने का मेरा कमरा अलग है। वहां मेरे सिवाय कोई दूसरा नहीं जाता। खासकर, लेखक या साहित्यकार तो बिल्कुल नहीं। ऐसा सुन रखा है, लेखक-साहित्यकार लोग भूतों से काफी 'घबराते' हैं।

भूत-भूतनियों के प्रति मेरा 'आत्मीय लगाव' ऐंवई नहीं है। उसके तमाम कारण हैं। मसलन- भूत मुझे इंसानों से कहीं बेहतर, कहीं सच्चे नजर आते हैं। भूतों का नजरिया बेहद तरक्कीपसंद होता है। भूत न खुद राजनीति में पड़ते हैं न राजनीति को पसंद करते हैं। धर्म या पंथनिरपेक्षता का कोई झाड़-झमेला भूतों के साथ नहीं होता। जियो और जीने दो में भूतों का परम विश्वास होता है। भूत खुद से किसी को नहीं डराते, वो तो इंसान ही उनसे खामखां डरता रहता है। भूत-भूतनियां बेहद 'जॉली मूड' के होते हैं। हर वक्त हंसने-हंसाने और प्रेम की मुद्रा में रहते हैं।

व्यवहारकुशलता के मामले में भूत-भूतनियों का जवाब नहीं। अपने रिश्तेदारों से क्या, पड़ोसी के मेहमानों तक से वे बेहद 'शालीनता' और 'व्यवहारिता' के साथ पेश आते हैं। न भूत कभी किसी के घर में तांका-झांकी करते हैं न भूतियां कभी किसी पराए मर्द को अपने वश में करने की कोशिश करती हैं। अपनी इज्जत के प्रति भूत-भूतनियां काफी सजग रहते हैं। वो तो हमारे भूतिया फिल्में बनाने वालों ने भूत-भूतनियों की 'इमेज' को 'खराब' कर रखा है। फिल्म में बेमतलब भूतनियों के नहाने, सोने, कपड़े बदलने के सीन डाल देते हैं ताकि 'उत्तेजनात्मक' लगे। वरना, ऐसी कोई बात नहीं है। भूतनियों का वास्तविक करेक्टर फिल्मों से बेहद जुदा होता है। और भूत भी किसी का न खून पीते हैं न रेप करते। वे तो बेचारे शांत-अकेली हवेली में 'आराम' से रहना चाहते हैं।

खास बात, दोनों में- भूत-भूतनी- से कोई भी 'अंधविश्वासी' नहीं होता। आत्मा-परमात्मा, साधु-ओझा, तंत्र-मंत्र आदि से चक्कर में वे नहीं पड़ते। अब जबरन ही कोई उन्हें उसमें धकेल दे, तो बात अलग है। वरना, उद्देश्य उनका डराना या धमकाना नहीं होता।

मेरे घर के नजदीक एक भूतिया हवेली है। मैंने कई दफा कोशिश की उसे खरीदकर, उसमें रहने की। मगर बीवी हर बार मना कर देती है, कहां भूत-भूतनियों के बीच जाकर रहोगे। खामखां, कुछ हो गया तो लेने के देने और पड़ जाएंगे। फिर भी कभी-कभार, आधी रात के बाद, मैं उस भूतिया हवेली का चक्कर लगा आता हूं। वहां किस्म-किस्म के भूत-भूतनियों से मिलकर 'आत्मा' को बेहद 'सुकून' मिलता है। महसूस होता है, असली जन्नत तो वहीं है प्यारे।

लेकिन मैंने तय कर रखा है कि एक दिन मैं भूत-भूतनियों के बीच जाकर 'अवश्य' रहूंगा। इंसानों के बीच रहते-रहते अब उक्ता-सा गया हूं।

1 टिप्पणी:

Ashish Anchinhar ने कहा…

लेकिन मैंने तय कर रखा है कि एक दिन मैं भूत-भूतनियों के बीच जाकर 'अवश्य' रहूंगा। इंसानों के बीच रहते-रहते अब उक्ता-सा गया हूं :)