शनिवार, 13 सितंबर 2014

मॉल में हिंदी दिवस

चित्र साभारः गूगल

मेरे मोहल्ले में- एक मुझे छोड़कर- बाकी सभी हिंदी-प्रेमी साहित्यकार हैं। सभी वरिष्ठ हैं। सभी को हिंदी का कोई न कोई छोटा-बड़ा पुरस्कार मिल चुका है। सभी हिंदी की सेवा करने को 24x7 तत्पर रहते हैं। सभी की अपनी-अपनी हेल्प-लाइनें हैं। सभी के अपने-अपने पीआर हैं।

मेरे मोहल्ले में हर साल हिंदी दिवस पर हिंदी की चिंता एवं समृद्धि के वास्ते गोष्ठी का आयोजन किया जाता है। गोष्ठी में मेरे मोहल्ले के हिंदी-प्रेमियों के अतिरिक्त आस-पड़ोस के मोहल्लों के भी वरिष्ठ हिंदी-प्रेमी शिरकत करते हैं। मुझे गोष्ठी में इसीलिए नहीं बुलाया जाता क्योंकि मैं 'हिंग्लिश-प्रेमी' हूं। और चेतन भगत जैसे अंगरेजी-ब्रांड लेखक को पढ़ता व उसकी भाषा का पक्ष लेता हूं। मेरे बारे में उनका कहना है कि मुझे न हिंदी भाषा का ज्ञान है न तमीज।

इस मुद्दे पर मैं उनसे जिरह इसीलिए नहीं करता क्योंकि वे सभी वरिष्ठ हिंदी-प्रेमी हैं। खामखां कहीं खिसियाकर बुरा न मान जाएं। यों भी, हिंदी के वरिष्ठ कुछ ऐसे ही स्वभाव के मालिक होते हैं।

फिलहाल, देख पा रहा हूं कि मेरे मोहल्ले में हिंदी दिवस को लेकर गतिविधियां तेज हो गई हैं। बैनर छप गए हैं। गोष्ठी में आने व बोलने वालों की लिस्ट भी आ गई है। इस दफा गोष्ठी का विषय- हिंदी की पवित्रता और अंगरेजी का वायरस है। 'विषय धांसू है'- ऐसा मुझसे एक हिंदी-प्रेमी ने कहा। 'जी। हिंदी पर जो बन जाए वो धांसू ही होता है। हिंदी वैसे भी एक 'धांसू भाषा' है'- मैंने जवाब दिया।

अच्छा, गोष्ठी का आयोजन शहर के एक बेहद पॉश मॉल में किया जाना है। मॉल का फर्श इत्ता गोरा-चिट्टा है कि अक्सर मैं अपने जूते-चप्पल उतारकर अंदर दाखिल होता हूं। कहीं फर्श मैला न हो जाए। मॉल में हर प्रकार (पीने, खाने व मनोरंजन) की सुविधा है।
 
फिर भी, मैंने गोष्ठी के एक साथी आयोजक से पूछ ही लिया- 'हिंदी दिवस का आयोजन वो भी मॉल में- कुछ अजीब-सा नहीं लगता।' इस पर आयोजक का उत्तर था- 'मियां, अजीब-सा क्यों लगेगा? जब सबकुछ बदल रहा तो फिर हिंदी दिवस का आयोजन-स्थल क्यों न बदले? वही पुराने-पारंपरिक सड़कों-चौराहों, स्कूलों या घरों में ही हिंदी दिवस का आयोजन अब शोभा नहीं देता। मॉल में हिंदी दिवस का आयोजन हम इसीलिए कर रहे हैं ताकि हिंदी के आयोजकों को अंगरेजी वालों से 'तुच्छ' न माना-समझा जाए। 'सेंटरलाइजड एसी' मॉल में हिंदी पर बात ज्यादा 'कूल्ली' हो सकेगी, यू नो।

न न इसे आप हिंदी के प्रति 'दोगलापन' न कहें। हिंदी-प्रेमियों का हिंदी के प्रति प्रेम कुछ ऐसा ही है। सही भी है न, हिंदी की 'असली फिक्र' वरिष्ठ किस्म के हिंदी-प्रेमी नहीं करेंगे तो क्या मुझ जैसे 'हिंग्लिश-प्रेमी' करेंगे। क्यों...?

5 टिप्‍पणियां:

Sanju ने कहा…

बहुत ही शानदार और सराहनीय प्रस्तुति....
बधाई मेरी

नई पोस्ट
पर भी पधारेँ।

Sanju ने कहा…

बहुत ही शानदार और सराहनीय प्रस्तुति....
बधाई मेरी

नई पोस्ट
पर भी पधारेँ।

Kajal Kumar ने कहा…

मॉल की दुकानों वालों के नारे भी लगे होंगे, यह कवि‍ता आपने लल्‍लूभाई मि‍ठाईवाले के सौजन्‍य से सुनी और ईनमा में बंटने वाले सर्टि‍फि‍केटों पर ही दाल साबुन के इश्‍ति‍हार ज़रूर छपे होंंगे...,

वाणी गीत ने कहा…

मॉल में कविता पढ़ने सुनने पर कितने प्रतिशत की छूट थी :)

Anshu Mali Rastogi ने कहा…

संपूर्ण छूट थी जी।