मंगलवार, 2 सितंबर 2014

कवि और रायता

चित्र साभारः गूगल
अमूमन कवि रायता नहीं फैलाते। रायता फैलाने वालो में आलोचकों की भूमिका मुख्य होती है। आलोचक इसीलिए भी रायता अधिक फैलाते हैं ताकि पाठकों के बीच अपनी 'हनक' को बरकरार रख सकें। खुद मैं कई दफा आलोचकों के फैलाए रायते का शिकार हुआ हूं। इसीलिए मेरी कोशिश यही रहती है कि मैं आलोचकों से अधिक से अधिक दूरी बनाकर रखूं। फ्री-फंट में अपना रायता फैलवाना भला कौन चाहेगा? है कि नहीं।

मगर उन कवि महोदय ने तो कमाल ही कर दिया। खुले आम यह कहकर कि- फलां पार्टी के सदस्यों ने मुझसे दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाने के वास्ते संपर्क किया था- जबरदस्त रायता फैला दिया है। आजकल प्रत्येक सोशल साइट और मोहल्ले के नुक्कड़ पर कवि महोदय के फैलाए रायते के ही चर्चें हैं। खुद उनकी पार्टी वाले परेशान हैं कि फैलाए गए रायते को कैसे सिमेटा जाए। हालांकि पार्टी चीफ स्वयं रायता-फैलाऊ एक्सपर्ट हैं पर इस दफा उनकी बोलती भी बंद है।

वैसे यह कोई पहली बार नहीं है, जब कवि महोदय ने रायता फैलाया हो। जब भी उन्हें मौका मिलता है- किसी न किसी बहाने रायता फैलाकर अपनी और पार्टी की 'भद्द' पिटवा ही देते हैं। लेकिन बाज फिर भी नहीं आते। शायद रायता फैलाना कवि महोदय का 'फेवरेट शगल' हो। सुना है, उन्होंने अपनी तुकबंदी युक्त कविताओं से भी कई बार रायता फैलाया है। मेरे मोहल्ले में ही कई दीवाने, कई पागल हैं उनकी कविताओं के।

चूंकि कवि महोदय अब पक्की राजनीति में हैं इसीलिए रायता फैलाना और भी जरूरी हो जाता है। कवि महोदय को अच्छे से मालूम है कि कविता के मंच से कहीं बेहतर रायता राजनीति में फैलाया जा सकता है। लेकिन यह भी है कि कविता के मंच से फैलाए गए रायते को तो फिर भी सिमेटा जा सकता है पर राजनीति में एक दफा जो रायता फैल गया तो फैल ही गया। फिर अच्छे-अच्छे इसे सिमेट नहीं पाते।

एक तरह से कवि महोदय ने रायता फैलाकर ठीक ही किया। कम से कम अपने मन की भीतरी इच्छा तो जाहिर कर दी। और सोशल नेटवर्किंग वालो को बैठे-ठाले मुद्दा दे दिया- मन लगाने को। आजकल मन का लगना सबसे जरूरी है, चाहे कैसे या किसी भी सूरत से लगे।

बहरहाल, रायते के फैलने से प्याले में तूफान का आना लाजिमी था- आया भी। अब प्रयास यह हो रहे हैं कि फैलाए गए रायते का लाभ कैसे उठाया जाए। दिल्ली की गद्दी जित्ती महत्त्वपूर्ण उनके लिए है, इनके लिए भी है। दोनों तरफ से रस्साकशी जारी है। और रायते का फैलाव निरंतर बढ़ाता ही जा रहा है।

1 टिप्पणी:

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

सचमुच खूब रायता फ़ैलाया कवि जी ने, लेकिन इत्ता फ़ैला दिये, कि अब कोई और न समेट रहा :) खुदई परेशान हैं :)