सोमवार, 29 सितंबर 2014

एट पैक एब्स की खातिर

चित्र साभारः गूगल
मैं अपने लेखन को कुछ दिनों के लिए 'विराम' दे रहा हूं। विराम देने का कारण है। पत्नी ने मुझे चुनौती दी है कि या तो मैं शाहरूख खान की तरह एट पैक एब्स बनाऊं या फिर लिखना छोड़ दूं!

दरअसल, पत्नी ने जब से शाहरूख खान को एट पैक एब्स में देखा है, उस पर फिदा हो गई है। शाहरूख खान की एट पैक एब्स वाली पिक को बैडरूम में मेरी फोटू की जगह टांग दिया है। कहती है, अब यह फोटू यहां से तब ही हटेगा जब तुम अपने एट पैक एब्स बना लोगे।

यो नो, मुझसे पत्नी की यह 'डिमांड' कोई नई नहीं है। इससे पहले मैं उसके तईं गजनी और अभी हाल पीके वाला आमिर खान बनकर दिखा चुका हूं। लेकिन क्या कीजिएगा... पत्नी के 'दिमाग' और 'डिमांड' का कोई भरोसा थोड़े होता है। कब मुझसे क्या करने या बनने को कह दे।

हालांकि मैं यह अच्छे से जानता हूं कि मेरे लिए शाहरूख खान की तरह एट पैक एब्स क्रिएट करना बहुत मुश्किल होगा। तमाम तरह की फीजिकल प्राब्लम्स मेरे सामने आ सकती हैं। मेरे लिए मेरे वेट को घटाना सबसे बड़ी चुनौती है। और फिर एक साधारण किस्म के लेखक को भला क्या जरूरत पड़ी है शाहरूख, सलमान या आमिर बनने की। यहां मुझे पन्ने काले-पीले करने से 'फुर्सत' मिलती नहीं, एट पैक एब्स कैसे बना पाऊंगा?

लेकिन बनाना पड़ेगा प्यारे। क्योंकि यह मेरी 'इज्जत' से ज्यादा 'पेट' का सवाल है। पत्नी ने साफ कह दिया है, तुम एट पैक एब्स जब तलक नहीं बना लेते, घर का खाना नहीं मिलेगा। फिलहाल, बाहर इंतजाम देखो। बताइए, मुझसे अधिक 'दयनीय' हालत भला किस पति की होगी, जो एट पैक एब्स भी बनाए और खाना भी बाहर का खाए।

इस सब के लिए मुझे पत्नी पर इत्ता गुस्सा नहीं आता जित्ता इन हीरो पर आता है। क्या इनके धोरे कोई काम-धाम नहीं है। कोई एट पैक एब्स बना लेता है, कोई नंगा होकर रेल की पटरी पर आगे बाजा लगाकर खड़ा हो जाता है, कोई ढोले-शोले निकाल लेता है, कोई बेतरतीब दाढ़ी ही बढ़ा लेता है। अरे, इनसे अच्छे तो पुराने जमाने के हीरो थे। कम से कम इस तरह की 'घोचूंपंती' तो नहीं किया करते थे। करते ये हैं, भुगतना हम जैसे पतियों को पड़ता है।

फिलहाल, मैंने एट पैक एब्स बनाने की खातिर 'ट्रेनिंग' शुरू कर दी है। अभी बहुत 'कर्रा' पड़ रहा है, पर करना पड़ेगा, पत्नी का अलटिमेटम जो है। मुझे डर है, एट पैक एब्स बनाने के चक्कर में कहीं मैं 'कांप-ठड्डा' न बन जाऊं। उफ्फ! क्या-क्या नहीं करना पड़ता पत्नी की डिमांड की खातिर।

रविवार, 28 सितंबर 2014

@ मंगल ग्रह

चित्र साभारः गूगल
यह बात मैंने पहले कभी किसी को नहीं बताई पर आज आप सब को बता रहा हूं।

मैं, अपने पूरे होशो-हवाश में, यह कहना चाहता हूं कि मैं घरती से सीधा मंगल ग्रह पर 'शिफ्ट' हो रहा हूं। घरती पर रहने का अब मेरा न तो कोई विचार है न ही मन। घरती पर मुझे अपना जीवन 'बोरिंग' नजर आता है। घरती पर पाप लगातार बढ़ रहा है और आदमी भी संकुचित-सा होता चला जा रहा है। इत्ते साल मैंने घरती पर कैसे काटे, यह बस मैं ही जानता हूं। अब मैं घरती पर अपना 'बोझ' और नहीं बढ़ाना चाहता।

हालांकि पहले मेरा विचार मंगलयान के साथ ही मंगल ग्रह पर जाने का था लेकिन फिर मुझे बताया गया कि, कुछ 'तकनीकी कारणों' से, मेरी सीट कन्फर्म न हो सकी है। इसीलिए मैं बाद में आ सकता हूं। मंगलयान के साथ मंगल ग्रह पर पहुंचने का मुझे दुख केवल इत्ता रहा- पहले मैं सरकारी खर्चे पर जाता मगर अब निजी खर्चे पर जाना पड़ेगा। खैर, कोई नहीं बर्दाशत कर लूंगा। जब जाना है तो जाना है, इसमें खर्चे क्या देखना।

मंगह ग्रह पर रहने में मुझे ज्यादा दिक्कत इसलिए भी न होगी क्योंकि वो मेरा पहले से ही देखा-भला है। जानता हूं.. जानता हूं.. यह सुनकर आप लोग थोड़े 'चौंके' जरूर होंगे पर यह सौ फीसद सच है। करीब चालीस के दशक में मैं मंगल ग्रह पर गया था, जमीन खरीदने के वास्ते। मंगल ग्रह पर जमीन मैंने वहां रह रहे 'मंगल ताऊ' से खरीदी थी। और बहुत ही सस्ते दामों में खरीदी थी। लेकिन यहां घरती पर मैंने किसी को बताया इसीलिए नहीं था, खामखां बात का बतंगड़ न बन जाए। वैसे मंगल ताऊ मुझसे मंगल ग्रह पर खाली पड़ी जमीनों की 'मार्केटिंग' के लिए बोले भी थे। मगर मैंने यह कहते हुए मना कर दिया था, खामखां मंगल ग्रह पर बोझ बढ़ाने से क्या फायदा? घरती का बोझ घरती पर ही बना रहे तो अच्छा।

फिलहाल, अभी तो मंगल ग्रह पर मैं अकेला ही जाऊंगा। पत्नी-परिवार को साथ नहीं ले जाऊंगा। वे लोग वहां बोर ही होंगे। आजू-वाजू कोई होगा नहीं बोलने-बतियाने को। पता नहीं मंगल ताऊ अभी वहां हैं भी या खर्च हो लिए। अब मकान बनवाने के लिए मंगल ग्रह पर मजदूर तो मिलने से रहे इसीलिए केवल मजदूरों को साथ लेकर जाऊंगा।

मैं जानता हूं, घरती से मंगल ग्रह का चक्कर लगाना इत्ता आसान नहीं। सबसे बड़ी परेशानी 'कनवेंस' की रहेगी। पर धीरे-धीरे कर उसे भी मैनेज कर लूंगा। एक 'मंगलयान' मैं भी खरीद लूंगा। जहां इत्ते खर्चे होंगे, वहां एक मंगलयान का और सही। क्यों प्यारे, ठीक है न...।

अब जब मुझे रहना ही मंगल ग्रह पर है तो मकान के साथ दुकान भी वहीं बनाऊंगा। मंगल ग्रह पर स्पेयर पार्ट्स की दुकान खोलने का मन है मेरा। इस बारे में इसरो के वैज्ञानिकों से थोड़ा और डिस्कस कर लूं। मुझे उम्मीद है, स्पेयर पार्ट्स का काम वहां 'चकाचक' चलेगा। यों भी, आए दिन किसी न किसी ग्रह या यान आदि के पार्ट्स में खराबी आती ही रहती होगी। मेरी दुकान खुल जाने से उन्हें भी आसानी हो जाएगी और मेरा भी काम चलता रहेगा।

मंगल ग्रह को राजनीतिक और बौद्धिक प्रदूषण-रहित रखने के लिए जरूरी होगा कि नेताओं और बुद्धिजीवियों की एंट्री वहां वर्जित हो। घरती पर जिस तरह से ये लोग राजनैतिक और वैचारिक 'गंध' फैलाए हुए हैं, उससे घरती के सीधे-साधे प्रणियों का बहुत नुकसान हो रहा है। गलती से भी अगर ये लोग मंगल ग्रह पर पहुंच गए तो ग्रह का कबाड़ा सुनिश्चित समझिए।

मंगल ग्रह पर मुझ जैसे गैर-राजनीतिक और बे-बुद्धिजीवि व्यंग्यकार ही पहुंचे तो ज्यादा ठीक रहेगा। सब जानते हैं, व्यंग्यकार से घरती पर कोई नाराज नहीं रहता। फिर भी, जो नाराज रहते हैं, वे किसी न किसी 'फ्रस्टेशन' का ही शिकार हैं।

चलिए, अब मैं भी निकल रहा हूं मंगल ग्रह के लिए। मंगलयान तो पहुंच ही गया। मंगलयान के सभी यात्रियों को मेरी शुभकामनाएं।

और हां, मंगल ग्रह पर मेरा पता- @ मंगल ग्रह हो जाएगा। कृपया, नोट कर लें।

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

एलियंस बिरादरी का प्रधानमंत्री के नाम पत्र

चित्र साभारः गूगल
हमारे मंगलयान के मंगल ग्रह पर कदम रखने की खबर एलियंस बिरादरी को भी लग चुकी है। एलियंस बिरादरी खासा परेशान है। ठीक से समझ नहीं पा रही कि क्या किया जाए? इस बाबत उन्होंने आपस में कई राउंड मीटिंगस भी कर डाली हैं। मीटिंग में फिलहाल यह तय हुआ है कि भारत के प्रधानमंत्री को पत्र लिखा जाए। (दरअसल, एलियंस बिरादरी को डर है- जीवन की संभावना के चक्कर में- कहीं मनुष्य मंगल को भी घरती जैसा न बना दे।)

प्रिय प्रधानमंत्रीजी,
आपके वैज्ञानिकों द्वारा भेजा गया मंगलयान हमारे मंगल पर 'सुरक्षित खड़ा' है। हम यह भली-भांति जानते-समझते हैं कि इसे यहां क्यों भेजा गया है। तमाम प्रकार की खोजों के बीच आपके वैज्ञानिकों का 'प्रमुख उद्देश्य' मंगल पर जीवन की संभावना को तलाशना है। बस हमें इसी बात का सबसे ज्यादा डर है।

हम यह कतई नहीं चाहते कि घरती का इंसान हमारे प्यारे और शांत ग्रह पर खोजा-खाजी करे या आकर रहे। क्योंकि, हमने ऐसा सुन-देख रखा है, घरती का इंसान जहां भी गया है, अपने स्वभाव के कारण उसने वहां के वातावरण को नुकसान ही पहुंचाया है। कहीं अगर आपके इंसान ने हमारे मंगल पर कदम रख दिए तो यहां 'अमंगल' होना निश्चित है। हम हमारे प्यारे मंगल का न अमंगल चाहते हैं न ही अहित।

हम अच्छे से जानते हैं, पहले एक इंसान कदम रखेगा बाद में अपने पूरे परिवार, पड़ोसियों, नाते-रिश्तेदारों को यहां ले आएगा। खुद तो आएगा ही साथ अपने पालतू जानवरों को भी ले आएगा। घरती के इंसान की यह खूबी है कि वो जहां जाता है, जानवर जरूर साथ ले जाता है। मंगल पर आनकर जित्ती 'गंध' इंसान फैलाएगा, उसे कहीं ज्यादा जानवर।

इंसान और जानवर दोनों ही हमारे स्वस्थ वतावरण के लिए खतरा हैं।

ऐसा नहीं है कि हम घरती पर इंसान के बर्ताव से वाकिफ नहीं हैं, खूब वाकिफ हैं। हमें जब भी मौका मिलता है, घरती का चक्कर लगा आते हैं। किंतु ज्यादा दिनों तलक घरती पर ठहर इसीलिए नहीं पाते क्योंकि यहां हमारे वास्ते जमीन ही नहीं है। सारी जमीनों पर तो यहां 'इल-लीगल' कब्जे हैं। जमीनों के वास्ते मार-काट यहां आम बात है। कल को ऐसा ही कुछ हमारे मंगल ग्रह पर भी घटित हो सकता है। हमने सुना है कि घरती के कुछ इंसान मंगल पर जमीन खरीदने का मन भी बना रहे हैं। लेकिन हम ऐसा होने नहीं देंगे। मंगल हमारी घरती है। हम हमारी घरती पर इंसान को कब्जा नहीं करने देंगे, नहीं करने देंगे। चाहे जो हो जाए।

प्रधानमंत्रीजी, हमारी एलियंस बिरादरी आपसे गुजारिश करती है कि अपने वैज्ञानिकों को कहकर इस मंगलयान को यहां से हटवाने की कृपा करें। हमारा मंगल आपके इस भारी-भरकम मंगलयान का बोझ सह नहीं पाएगा। हमारे बच्चे इस दैत्याकार चीज को देकर खासा डरे हुए हैं।

हम उम्मीद करते हैं कि आप हमारे पत्र को संज्ञान में लेकर 'उचित एक्शन' लेंगे।

धन्यवाद सहित-
एलियंस बिरादरी (मंगल ग्रह)

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

फॉट्टी से पहले की नॉट्टीनेस

चित्र साभारः गूगल

मेरे फॉट्टी का होने में अभी दो साल शेष हैं। लेकिन हरकतें मैं (अभी से) फॉट्टी प्लस वालों की सी करने लगा हूं। दिन-प्रति-दिन नॉट्टी-सा होता जा रहा हूं। मेरी नॉट्टी-सी हरकतों को देखकर अब पत्नी भी मुझ पर 'शक' करने लगी है। लगातार मुझ पर, मेरे स्मार्टफोन पर, मेरे फेसबुक औरटि्वटर पेज पर पैनी निगाह रखने लगी है। प्रायः चैट-बॉक्स को खोलकर उसमें आए संदेशों को पढ़ने लगी है।

हालांकि मैंने पत्नी की इस 'शकबाजी' का कभी बुरा नहीं माना मगर फिर भी अंदर ही अंदर डरता हूं कि कहीं कोई विचित्र-सा संदेश या रंगीन-सी फोटू उसके हत्थे न चढ़ जाए। इसीलिए समय-समय पर फेसबुक और वाह्ट्स एप संदेशों-फोटूओं को 'क्लीन' करता रहता हूं। ताकि रायता न फैले।

लेकिन थट्टी या फॉट्टी की उम्र में 'नॉट्टी' होने का मजा ही कुछ और है प्यारे। इस उम्र में दिल ज्यादा दिलकश और निगाहें अधिक रंगीन हो जाती हैं। सपनों की खुमारी में 'मौलिक सुख' मिलता है। खुद में 'जवान' होने का अहसास हर पल दम मारता रहता है। आसपास हसीन चेहरों को देखकर चेहरे का मानचित्र खुद ब खुद निखरने लगता है।

मुझे यह सब अधिक इसीलिए महसूस होता है क्योंकि मेरी आदत बचपन से ही 'दिलकश' या कहूं 'दिल फेंक' किस्म की रही है। मेरे नानाजी बताते थे- जब मैं हुआ था तब मैंने नर्स को भी लाइन मारने में कोई कसर बाकी नहीं रख छोड़ी थी। हर वक्त दिल यही करता था कि मैं नर्स की बाहों और दिल के करीब रहूं।

फिर बचपन से जवानी तलक आते-आते जाने कित्ते इश्कनुमा रायते मैंने फैला डाले, मुझे खुद ठीक से नहीं मालूम। बताते हैं, मेरी आशिकमिजाजी से तंग आकर पड़ोस की खूबसूरत लड़कियों ने मुझसे दूरी बन ली थी। फिर भी, मैं अपनी आदत में रत्तीभर सुधार नहीं लाया। सुधार लाता भी क्यों; कौन-सी जिंदगी बार-बार मिला करती है, मस्ती मारने या नॉट्टी होने को।

हां, मैं अपनी नॉट्टीनेस को लेकर कभी 'सीरियस' नहीं हुआ। इसमें सीरियस होने जैसा मुझे कभी कुछ लगा ही नहीं। नॉट्टी होकर मुझे जिंदगी ज्यादा आसान और हसीन लगती है। बेमतलब की परेशानियों और यहां-वहां की उठक-पटक से मैं 'बेफिक्र' रहता हूं। दिल में हर दम और जीने और इश्क के प्रति जवां रहने का जज्बा बना रहता है। नहीं तो आदमी थट्टी के बाद से ही खुद को बुढ़ा मानने लगता है। खुशी है कि मैं इस 'दुश्चक्र' से कोसों दूर हूं।

मैं तो हर थट्टी और फॉट्टी प्लस वालों से यही कहता हूं कि जिंदगी में 'नॉटीनेस' बनाए रहो ताकि दिल जवां और सांसें महकती रहें। बाकी तो जो है सो है ही...।

रविवार, 21 सितंबर 2014

चीन, जिनपिंग और चाऊमीन

चित्र साभारः गूगल
सारा 'क्लाइमेट' जिनपिंग-मय हो रखा है। जहां-जिधर देखो जिनपिंग के ही चर्चे हैं। लोग जागते-सोते, टलते-दौड़ते, हंसते-बतियाते, विचारते-बहसियाते जिनपिंग पर ही बात करना पसंद कर रहे हैं।फेसबुक और टि्वटर पर मोदी से कहीं ज्यादा जिनपिंग पर लिखा-पढ़ा जा रहा है। मैंने सुना है कि मेरे मोहल्ले के कुछ दीवानों ने अपना नाम ही उर्फ जिनपिंग रख लिया है। घर के बाहर चिप्पी चिपकाकर और न्यूजपेपर में इश्तहार छपवाकर कन्फर्म किया है, अब से उन्हें उर्फ जिनपिंग नाम से ही जाना-पहचाना जाए। क्या बात है।

खबरिया चैनलों को देखकर ऐसा लग रहा है कि देश-समाज से दूसरी सारी समस्याएं समाप्त हो चुकी हैं। इस वक्त अगर कुछ खास है तो बस जिनपिंग, मोदी, चीन और घुसपैठ है। चीनी मामलों के बड़े-बड़े जानकार टीवी पर आकर ऐसा ज्ञान बघार रहे हैं, ऐसी-ऐसी सलाहाएं दे रहे हैं कि मेरा माथा चकराएमान है। समझ नहीं पा रहा कि किस खबरिया चैनल को देखूं, किसे छोड़ दूं। चीन और जिनपिंग के शो के बीच कश्मीर की बाढ़ और विस्थापितों का दर्द धीरे-धीरे कर फ्लैशबैक में जाने लगे हैं। भाजपा की हालिया हार पर बहस डाइवर्ट और भाजपा-शिव सेना की तकरार पर फोकसड हो गई है।

क्या अजीब माहौल है, एक तरफ चीन बेखौफ होकर भारतीय सीमा के अंदर घुसा चला आ रहा है और दूसरी तरफ समझौते पर समझौते हुए जा रहे हैं। आपस में शांति, विश्वास, व्यापार, अहिंसा की कसमें खाई जा रही हैं। जिनपिंग जाने कित्ते डॉलर का निवेश भारत में करने पर राजी हो गए हैं। इस खबर पर सेंसेक्स उछल कर एक ही दिन पांच सौ अंक की बढ़त बना गया है। न केवल दलाल पथ बल्कि अर्थव्यवस्था में भी खासा तेजी आने के अनुमान लगाए जा रहे हैं। ऐसा ही प्रधानमंत्री की जापान यात्रा के टाइम पर भी हुआ था।

सुनने में यह भी आया कि लोग गूगल पर जिनपिंग से ज्यादा चाऊमीन (बिना पनीर वाली) बनाने की रेसिपी खोजने में लगे हैं। कुछ को मैंने यह कहते भी सुना है कि वे कोशिश करेंगे, इस रेसिपी के बारे में जिनपिंग की पत्नी से जानकारी ले सकें। लगता है, इंडिया वाले इंडियन-विधि से तैयार चाऊमीन खाते-खाते बोर हो गए हैं। अब वे चाऊमीन में प्योर चायनीज-प्लेवर लाना चाहते हैं। मेरे मोहल्ले के नुक्कड़ पर चाऊमीन का ठेला लगाने वाला चाऊराम भी प्योर चायनीज रेसिपी की जुगाड़ में है।

वो सब तो ठीक है मगर कुछ प्रगतिशील टाइप के लोग भारत के चीन संग पेंगे बढ़ाने पर भीतर ही भीतर खिसिया रहे हैं। इस समय वे गहन वैचारिक चिंतन में व्यस्त हैं। अपनी पीढ़ा को रह-रहकर फेसबुक पर शेयर भी कर रहे हैं। परंतु दुख यह है कि उनके स्टेटस पर न कोई 'लाइक' दबा रहा है न 'कमेंट' चिपका रहा। इससे वे और भन्नाए हुए हैं। इस वक्त उन्हें हर जिनपिंग-प्रेमी अपना दुश्मन नजर आ रहा है। जिसमें से एक मैं भी हूं। क्या कीजिएगा, प्रगतिशील बिरादरी की तो पुरानी आदत है खुशी और उत्साह के बीच मुंह पर बारहा बजाने रखने की।

समझदारी तो यह होती है कि थोड़ी खुशी को भी बहुत माना जाए। जिनपिंग की यात्रा के बहाने हमें जो उत्साह मिला है क्यों न उसे बरकरार रखा जाए। वरना हर बात में कील तो कहीं भी, कैसे भी ठोकी जा सकती है।

जिनपिंग-मय माहौल में चाऊमीन का लुत्फ लीजिए। चीनी सैनिकों के अब पीछे हटने पर मुस्कुराइए। मोदी की विदेश नीति का उत्साहवर्धन कीजिए। जो कसमसा रहे हैं ,उन्हें कसमसाने दीजिए। सकारात्मकता बड़ी चीज है। इसे बनाए रखिए। वरना तो जो है सो है ही। क्यों प्यारे...।

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

हार पर मुस्कुराते प्रगतिशील

चित्र साभारः गूगल
आज कई महीनों के पश्चात मैंने अपने मोहल्ले के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के चेहरों पर 'खुशी' देखी है। उनको घर से बाहर निकलते देखा है। मोहल्ले के नुक्कड़ पर आपस में बतियाते देखा है। उनमें कुछ ऐसे भी हैं, जो आज महीनों बाद नहाए हैं। नहाने के बाद लोटा-केला-फूल लेकर मंदिर गए हैं। (ओह! यह बात मुझे यहां लिखनी नहीं थी। चलिए खैर...)। मोहल्ले में पूरनलाल मिठाई वाले की दुकान पर भी प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की अच्छी-खासी भीड़ है। सभी आपस में एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर बधाई-शुभकामनाएं दे रहे हैं। दो-चार तो 'भोग' भी लगा आए हैं। लेकिन मुझसे सब के सब प्रगतिशील बुद्धिजीवि कन्नी काटे हुए हैं। क्योंकि, उनकी निगाह में, मैं ठहरा भाजपा का आदमी। मुझे चिढ़ाने के लिए उपचुनाव में मिली करारी हार के बहाने अच्छे दिनों की ऐसी-तैसी करने में लगे हैं।

खुशी की यह लालिमा एक केवल मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के चेहरों पर ही नहीं बल्कि देश भर के प्रगतिशीलों के चेहरों पर इस समय कायम है। सभी प्रगतिशील टीवी पर आ-आकर भापजा के अच्छे दिनों का बैंड बजाने में लगे हैं। एक से बढ़कर एक नेक सलाहें वो भाजपा और प्रधानमंत्री को दे रहे हैं। पर उनकी सलाह में 'नैतिकता' कम 'हास्य' अधिक है। हास्य होना भी चाहिए आखिर भाजपा उपचुनाव में औंधे मुंह जो गिरी है। यों भी, गिरने वाले की जब तलक हम खुलकर खिल्ली न बना या उड़ा लें, पेट का हाजमा ठीक बैठ नहीं पाता। चलिए कोई नहीं, उपचुनाव में मिली हार के बहाने ही सही, कम से कम प्रगतिशील बिरादरी अपने-अपने दबड़ों से बाहर तो निकली। नहीं तो चौबीस घंटे मोहर्रमी-सी सूरत बनाए कोसा-कासी में ही व्यस्त रहते थे।

लेकिन प्यारे जनता का भी जवाब नहीं। कब, किसे, कहां, कैसे धोबी पछाड़ दे दे। कुछ नहीं कह सकते। जनता की अपनी कैल्कूलेशन होती है और नेताओं की अपनी। अक्सर देखा गया है, नेताओं की कैल्कूलेशन पर जनता की कैल्कूलेशन ही भारी पड़ती है। उपचुनाव में भाजपा के साथ यही तो किया जनता ने। अच्छे दिन.. अच्छे दिन.. के चक्कर में जनता ने भाजपा को बुरे दिनों के बीच फंसा दिया। इसीलिए तो कहते हैं, 'आत्ममुग्धता' न राजनीति में अच्छी होती है न जीवन में। आत्ममुग्धता की जब 'वाट' लगती है तो फिर न पार्टी न नेता कहीं के नहीं रहते।

मुझे हंसी आती है उन पर भी जो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तर्ज पर पार्टियों-नेताओं की हार-जीत पर जश्न मनाते हैं। जैसे मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील बुद्धिजीवि लोग इस समय कर रहे हैं। चुनाव में पार्टी चाहे कोई भी जीते या हारे पर हमारा बुद्धिजीवि वर्ग (खासकर प्रगतिशील किस्म का) बल्लियों उछलना नहीं भूलता। उस बेचारे को दूसरे की शादी में नाचकर ही असीम सुख मिलता है। क्योंकि उसकी अपनी पार्टी का जो हाल है, उस पर सिर्फ 'अफसोस' ही जतलाया जा सकता है।

उपचुनाव के 'करारे नतीजे' भाजपा के तईं साफ संकेत हैं कि संभल जाओ प्यारे वरना जनता कहीं का नहीं छोड़ेगी। केवल एक ही व्यक्ति के कंधे पर बंदूक रखकर अगर चलाओगे तो एक दिन न कंधा बचेगा न बंदूक। अच्छे दिन 'लव जिहाद' के शगूफे से नहीं 'जन-हित' से आएंगे।

अब भी अगर न चेते तो फिर न केवल मेरे मोहल्ले के बल्कि पूरे देश के प्रगतिशील बुद्धिजीवि ऐसे ही मिठाईयां बांटेंगे और जश्न मनाएंगे। बाकी आपकी मर्जी...।

सोमवार, 15 सितंबर 2014

भूत-भूतनियों के प्रति मेरा प्रेम

चित्र साभारः गूगल
मुझे भूत-भूतनियां बेहद पसंद हैं। जब भी मुझे खाली समय मिलता है या तो मैं भूतों के बारे में पढ़ता हूं या भूतिया फिल्में देखता। भूतिया फिल्में देखने का मेरा कमरा अलग है। वहां मेरे सिवाय कोई दूसरा नहीं जाता। खासकर, लेखक या साहित्यकार तो बिल्कुल नहीं। ऐसा सुन रखा है, लेखक-साहित्यकार लोग भूतों से काफी 'घबराते' हैं।

भूत-भूतनियों के प्रति मेरा 'आत्मीय लगाव' ऐंवई नहीं है। उसके तमाम कारण हैं। मसलन- भूत मुझे इंसानों से कहीं बेहतर, कहीं सच्चे नजर आते हैं। भूतों का नजरिया बेहद तरक्कीपसंद होता है। भूत न खुद राजनीति में पड़ते हैं न राजनीति को पसंद करते हैं। धर्म या पंथनिरपेक्षता का कोई झाड़-झमेला भूतों के साथ नहीं होता। जियो और जीने दो में भूतों का परम विश्वास होता है। भूत खुद से किसी को नहीं डराते, वो तो इंसान ही उनसे खामखां डरता रहता है। भूत-भूतनियां बेहद 'जॉली मूड' के होते हैं। हर वक्त हंसने-हंसाने और प्रेम की मुद्रा में रहते हैं।

व्यवहारकुशलता के मामले में भूत-भूतनियों का जवाब नहीं। अपने रिश्तेदारों से क्या, पड़ोसी के मेहमानों तक से वे बेहद 'शालीनता' और 'व्यवहारिता' के साथ पेश आते हैं। न भूत कभी किसी के घर में तांका-झांकी करते हैं न भूतियां कभी किसी पराए मर्द को अपने वश में करने की कोशिश करती हैं। अपनी इज्जत के प्रति भूत-भूतनियां काफी सजग रहते हैं। वो तो हमारे भूतिया फिल्में बनाने वालों ने भूत-भूतनियों की 'इमेज' को 'खराब' कर रखा है। फिल्म में बेमतलब भूतनियों के नहाने, सोने, कपड़े बदलने के सीन डाल देते हैं ताकि 'उत्तेजनात्मक' लगे। वरना, ऐसी कोई बात नहीं है। भूतनियों का वास्तविक करेक्टर फिल्मों से बेहद जुदा होता है। और भूत भी किसी का न खून पीते हैं न रेप करते। वे तो बेचारे शांत-अकेली हवेली में 'आराम' से रहना चाहते हैं।

खास बात, दोनों में- भूत-भूतनी- से कोई भी 'अंधविश्वासी' नहीं होता। आत्मा-परमात्मा, साधु-ओझा, तंत्र-मंत्र आदि से चक्कर में वे नहीं पड़ते। अब जबरन ही कोई उन्हें उसमें धकेल दे, तो बात अलग है। वरना, उद्देश्य उनका डराना या धमकाना नहीं होता।

मेरे घर के नजदीक एक भूतिया हवेली है। मैंने कई दफा कोशिश की उसे खरीदकर, उसमें रहने की। मगर बीवी हर बार मना कर देती है, कहां भूत-भूतनियों के बीच जाकर रहोगे। खामखां, कुछ हो गया तो लेने के देने और पड़ जाएंगे। फिर भी कभी-कभार, आधी रात के बाद, मैं उस भूतिया हवेली का चक्कर लगा आता हूं। वहां किस्म-किस्म के भूत-भूतनियों से मिलकर 'आत्मा' को बेहद 'सुकून' मिलता है। महसूस होता है, असली जन्नत तो वहीं है प्यारे।

लेकिन मैंने तय कर रखा है कि एक दिन मैं भूत-भूतनियों के बीच जाकर 'अवश्य' रहूंगा। इंसानों के बीच रहते-रहते अब उक्ता-सा गया हूं।

रविवार, 14 सितंबर 2014

हिंदी की चिंता में

चित्र साभारः गूगल
हिंदी के प्रति 'चिंतित' होने की कोशिश मैं कई दफा कर चुका हूं लेकिन हर बार 'मात' खा जाता हूं। मैं अपने भीतर वो 'फिलिंग' ला ही नहीं पाता जिससे लगे मैं हिंदी के प्रति 'घणा चिंतित' हूं। हिंदी के प्रति चिंतित होने के वास्ते मैंने 'ध्यान' लगाने का प्रयास भी किया मगर नतीजा 'सिफर' ही रहा। जबकि मैंने देखा है हिंदी-प्रेमी लोग बड़े ही 'प्रॉफेशनल' तरीके के साथ हिंदी के प्रति चिंतित हो लेते हैं। इत्ता गजब का चिंतित होते हैं कि दो-चार इनाम-इकराम उनके खाते में आ जाते हैं। छोटी-बड़ी साहित्यिक पत्रिकाओं में छपने की सुविधा मिलती है सो अलग।

हिंदी के प्रति चिंतित होने का कोई खास या विशेष नियम नहीं है। एक-दो बने-बनाए 'फॉरमेट' हैं, जिनके अंदर रहकर ही अक्सर हिंदी के प्रति चिंता व्यक्त की जाती है। अंगरेजी और बाजार का दबदबा इस फॉरमेट के प्रमुख हिस्से हैं। जब भी हिंदी के प्रति चिंता व्यक्त करनी होती है, हिंदी-प्रेमी अंगरेजी और बाजार को खूब-खूब गलियाते हैं। खुद चाहे अंगरेजी और बाजार से कित्ती ही 'सुविधाएं' पा रहे हों किंतु दिखाने के लिए 'विरोध' में उतर आते हैं।

हिंदी के प्रति चिंतित हिंदी-प्रेमियों के बच्चे कॉनवेंट में ही पढ़ते हैं मगर खुद मंच पर चढ़कर कहते हैं कि हमें अपने बच्चों को सिर्फ सरकारी स्कूलों में ही पढ़ाना-लिखाना चाहिए। आइ-फोन एप्पल का इस्तेमाल करते हैं और हमसे कहते हैं- अमेरिकी तकनीक ने हिंदी और हिंदुस्तान का बहुत नुकसान किया है। गोष्ठी के तुरंत बाद उन्हें चाहिए अंगरेजी ही होती है परंतु हमसे थैली की पीने को कहते हैं। हिंग्लिश का विरोध अक्सर अखबारों की भाषा को बुरा-भला कहकर या प्रतियां जलाकर तो करते हैं मगर उन्हीं अखबारों में- मोटे पारिश्रमिक पर- स्तंभ लिखना बंद नहीं करते।

ऐसे ही कुछ और कथित चिंता-संपन्न मुद्दे हिंदी-प्रेमी हिंदी की चिंता में जाने कहां-कहां से उठा लाते हैं और फिर उन्हें हिंदी दिवस पर भुनाते हैं।

और एक मैं हूं जो सोचता ही रह जाता हूं कि किस तरह से हिंदी के प्रति चिंतित होऊं? कहीं से भी तो हिंदी मुझे 'दुखी' या 'उपेक्षित' नजर नहीं आती। चाहे अंगरेजी हो या बाजार, चाहे विज्ञापन हो या पान की दुकान, चाहे अमेरिका हो या जापान; हर कहीं हिंदी अपना डंका मस्त होकर बजा रही है। हिंदी के प्रभाव से घबराकर अब अंगरेजी वाले भी उसे इज्जत की निगाह से देखने-पढ़ने-समझने लगे हैं।

हां, इत्ते पर भी अगर हिंदी भाषा में कोई चेतन भगत या अरविंद अडिगा नहीं हो पा रहा तो इसमें दोष हिंदी का नहीं हिंदी के लेखक की 'कमजोर मार्किटिंग स्कील' का है। बाजार उन्हें ही जानता-पहचानता है, जो बिकता है। अंगरेजी का लेखक हिंदी के लेखक के मुकाबले अपनी किताब अच्छी बेच लेता है। यह हकीकत है प्यारे। इसे स्वीकारो।

जिन्हें लगता है कि वे हिंदी की चिंता कर हिंदी की नाक ऊंची कर रहे हैं, बहुत 'यथास्थितिवाद' हैं। हिंदी की नाक हिंदी के विकास, फैलाव से ऊंची होगी नाकि चिंता के बंद कमरों में बैठकर।

हिंदी का भूत-वर्तमान-भविष्य एक मस्त और जबरदस्त है। किस्म-किस्म की चिंताओं में बांधकर हिंदी को 'बेचारी' न बनाओ हे! हिंदी-प्रेमियों। हिंदी के लिए अगर वाकई कुछ करना चाहते हो तो उसे 'आजाद' रहने दो अंगरेजी, बाजार, विज्ञापन, हिंग्लिश, सोशल नेटवर्किंग के साथ। हिंदी को न कोई 'पछाड़' सकता है न 'उखाड़'। इसीलिए तो मैं हमारी हिंदी के प्रति 'बे-चिंतित' रहता हूं।

शनिवार, 13 सितंबर 2014

मॉल में हिंदी दिवस

चित्र साभारः गूगल

मेरे मोहल्ले में- एक मुझे छोड़कर- बाकी सभी हिंदी-प्रेमी साहित्यकार हैं। सभी वरिष्ठ हैं। सभी को हिंदी का कोई न कोई छोटा-बड़ा पुरस्कार मिल चुका है। सभी हिंदी की सेवा करने को 24x7 तत्पर रहते हैं। सभी की अपनी-अपनी हेल्प-लाइनें हैं। सभी के अपने-अपने पीआर हैं।

मेरे मोहल्ले में हर साल हिंदी दिवस पर हिंदी की चिंता एवं समृद्धि के वास्ते गोष्ठी का आयोजन किया जाता है। गोष्ठी में मेरे मोहल्ले के हिंदी-प्रेमियों के अतिरिक्त आस-पड़ोस के मोहल्लों के भी वरिष्ठ हिंदी-प्रेमी शिरकत करते हैं। मुझे गोष्ठी में इसीलिए नहीं बुलाया जाता क्योंकि मैं 'हिंग्लिश-प्रेमी' हूं। और चेतन भगत जैसे अंगरेजी-ब्रांड लेखक को पढ़ता व उसकी भाषा का पक्ष लेता हूं। मेरे बारे में उनका कहना है कि मुझे न हिंदी भाषा का ज्ञान है न तमीज।

इस मुद्दे पर मैं उनसे जिरह इसीलिए नहीं करता क्योंकि वे सभी वरिष्ठ हिंदी-प्रेमी हैं। खामखां कहीं खिसियाकर बुरा न मान जाएं। यों भी, हिंदी के वरिष्ठ कुछ ऐसे ही स्वभाव के मालिक होते हैं।

फिलहाल, देख पा रहा हूं कि मेरे मोहल्ले में हिंदी दिवस को लेकर गतिविधियां तेज हो गई हैं। बैनर छप गए हैं। गोष्ठी में आने व बोलने वालों की लिस्ट भी आ गई है। इस दफा गोष्ठी का विषय- हिंदी की पवित्रता और अंगरेजी का वायरस है। 'विषय धांसू है'- ऐसा मुझसे एक हिंदी-प्रेमी ने कहा। 'जी। हिंदी पर जो बन जाए वो धांसू ही होता है। हिंदी वैसे भी एक 'धांसू भाषा' है'- मैंने जवाब दिया।

अच्छा, गोष्ठी का आयोजन शहर के एक बेहद पॉश मॉल में किया जाना है। मॉल का फर्श इत्ता गोरा-चिट्टा है कि अक्सर मैं अपने जूते-चप्पल उतारकर अंदर दाखिल होता हूं। कहीं फर्श मैला न हो जाए। मॉल में हर प्रकार (पीने, खाने व मनोरंजन) की सुविधा है।
 
फिर भी, मैंने गोष्ठी के एक साथी आयोजक से पूछ ही लिया- 'हिंदी दिवस का आयोजन वो भी मॉल में- कुछ अजीब-सा नहीं लगता।' इस पर आयोजक का उत्तर था- 'मियां, अजीब-सा क्यों लगेगा? जब सबकुछ बदल रहा तो फिर हिंदी दिवस का आयोजन-स्थल क्यों न बदले? वही पुराने-पारंपरिक सड़कों-चौराहों, स्कूलों या घरों में ही हिंदी दिवस का आयोजन अब शोभा नहीं देता। मॉल में हिंदी दिवस का आयोजन हम इसीलिए कर रहे हैं ताकि हिंदी के आयोजकों को अंगरेजी वालों से 'तुच्छ' न माना-समझा जाए। 'सेंटरलाइजड एसी' मॉल में हिंदी पर बात ज्यादा 'कूल्ली' हो सकेगी, यू नो।

न न इसे आप हिंदी के प्रति 'दोगलापन' न कहें। हिंदी-प्रेमियों का हिंदी के प्रति प्रेम कुछ ऐसा ही है। सही भी है न, हिंदी की 'असली फिक्र' वरिष्ठ किस्म के हिंदी-प्रेमी नहीं करेंगे तो क्या मुझ जैसे 'हिंग्लिश-प्रेमी' करेंगे। क्यों...?

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

सेंसेक्स के अच्छे दिन

चित्र साभारः गूगल
सेंसेक्स एक दफा फिर से 'टॉप' पर है। टॉप पर पहुंचकर 'मुस्कुरा' रहा है। सेंसेक्स का इस तरह से मुस्कुराना मुझे अच्छा लगता है। सेंसेक्स की मुस्कुराहट बताती है कि अर्थव्यवस्था में 'अच्छे दिन' आना शुरू हो गए हैं। हालांकि सेंसेक्स के लिए अच्छे दिन का इंतजार काफी 'संघर्षपूर्ण' रहा फिर भी उसने 'हिम्मत' नहीं हारी। आड़े-तिरछे वक्त में हिम्मत न हारना सेंसेक्स का 'पैशन' रहा है।

दलाल पथ पर लगभग छह-सात साल बाद लौटती खुशियां 'संबल' देती हैं। पता चलता है कि सेंसेक्स सरकार के कामकाज से प्रसन्न है। सरकार अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के साथ-साथ सेंसेक्स के बारे में भी सकारात्मक सोच रही है। सकारात्मक सोच ही सेंसेक्स को मजबूत बनाए हुए है। सेंसेक्स की मजबूती में ही अर्थव्यवस्था और दलाल पथ की तरक्की निहित है।

अभी सरकार को आए महज सौ दिन ही तो हुए हैं। इन सौ दिनों में सेंसेक्स ने छब्बीस हजार से ऊपर पहुंचकर वो कर दिखाया है, जो शायद इत्ती जल्दी संभव न था। सेंसेक्स की चढ़ाई में आती मजबूती पर यों अफवाहें तो बहुत थीं कि- अब-तब गुब्बारा फटा ही। अब सेंसेक्स धड़ाम हुआ। अब तेजी का सफर थमा- मगर प्यारा सेंसेक्स न हिला न डिगा। हां, कुछ दिन गड़बड़-सड़बड़ जरूर रहे पर सेंसेक्स उनसे पार पा ही गया।

विपरित परिस्थियों से पार पाना सेंसेक्स का स्वभाव रहा है। अपने जीवन में सेंसेक्स ने इत्ता-इत्ता झेला है, इत्ती-इत्ती गिरावटें-ठोकरें खाई हैं कि साहस खुद-ब-खुद ही आता चला गया। साहस का दूसरा नाम ही तो सेंसेक्स है प्यारे।

सेंसेक्स के मूड से पता चल रहा है कि उसे प्रधानमंत्री की जापान यात्रा से काफी लाभ हुआ है। भारत और जापान की निजी एवं व्यापारिक गलबहियां सेंसेक्स को पसंद आ रही हैं। सेंसेक्स को भीतर से बल मिल रहा है, खुद को मजबूत करने-बनाने का। आखिर क्यों न हो, सेंसेक्स हमारी गुलाबी अर्थव्यवस्था की आन-बान-शान जो है। सेंसेक्स की स्थिरता, अर्थव्यवस्था की मजबूती, विकास का पैमाना ही तो आधुनिक भारत की मिसाल है। पिछली सरकारों ने तो आधुनिकता के नाम पर केवल सपने ही देखे और दिखाए थे। बेचारे सेंसेक्स की भद्द पिटी सो अलग। गिरा-गिराकर बेचारे सेंसेक्स को अधमरा-सा कर दिया।

मगर हाल के दिनों में सेंसेक्स में आती जान काफी 'आश्वस्त' करती है। सेंसेक्स के आते अच्छे दिन आर्थिक सकारात्मकता का संकेत देते हैं। और चाहिए भी क्या हमें...।

किंतु लगने वालो को लगता है कि सेंसेक्स के अच्छे दिन और अर्थव्यवस्था में खुशहाली 'क्षणिक' है। विकास की बात दिखावटी है। जापान के साथ दो लाख दस हजार करोड़ का निवेश 'बेमानी' है। अच्छे दिन सिर्फ नारा भर हैं, हकीकत कुछ और है। लेकिन हकीकत को दिखाने या बतलाले की हिम्मत कोई नहीं करता। फेसबुक या टि्वटर पर 'शाब्दिक क्रांति' कर, कुंए में से टर्र-टर्र की आवाजें निकालते रहते हैं सब के सब। शायद वे इस कॉस्पेट को समझना ही नहीं चाहते कि सेंसेक्स की सक्सेस और अर्थव्यवस्था की मजबूत किसी एक के लिए नहीं, हम सब के लिए है।

खैर, जो नहीं समझना चाहते न समझें- मुझे या सेंसेक्स को क्या। दो-चार विकासविरोधियों के कारण न मैं न सेंसेक्स मुस्कुराना थोड़े ही न छोड़ देंगे। मुरझाए चेहरे को यह खासियत होती है कि वे न कभी खुद मुस्कुराते हैं न मुस्कुराने देते।

अभी तो यह प्यारे सेंसेक्स के मुस्कुराने की शुरूआत भर है- आगे-आगे देखिए अच्छे दिन कैसे और नजदीक आते हैं- सेंसेक्स, सरकार और अर्थव्यवस्था की बदौलत।

बुधवार, 3 सितंबर 2014

मोदी का डंका और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का पेट दर्द

चित्र साभारः गूगल
मोदी जापान क्या गए मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के पेट 'गड़बड़ा' गए। आए दिन मोहल्ले का कोई न कोई बुद्धिजीवि अपना पेट पकड़े मुझे नुक्कड़ पर ऊकड़ू बैठा नजर आता है। एकाध दफा मैंने उनके पेट का हाल जानने की कोशिश भी की किंतु मुझे कुछ नहीं बताया गया। कुछ नहीं.. कुछ खास नहीं- कहकर टाल गए। यों भी, मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील बुद्धिजीवि मुझे पसंद नहीं करते। उनकी निगाह में मैं दुनिया सबसे बेअक्ल और बकबास इंसान (लेखक) हूं। यही वजह है, मुझसे वे अपनी कोई बात शेयर नहीं करते। केवल अपने प्रगतिशीलों के गुट में ही तीर-तुक्के छोड़ते रहते हैं।

खैर। मुझे क्या...। मैं जो हूं सो हूं। जब मेरा मुझ पर बस नहीं चलता फिर प्रगतिशील बुद्धिजीवि तो बहुत दूर की बात हैं प्यारे।

ऐसा नहीं है कि मोदी के जापान जाने, जापान में अपना डंका बजाने, जापान के रास्ते बुलेट ट्रेन के सपने को सच बनाने, के पेट दर्द से मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील बुद्धिजीवि ही बेचैन हैं, दरअसल, यह बेचैनी देश की पूरी प्रगतिशील बुद्धिजीवि बिरादरी में है। गाहे-बगाहे देश के प्रगतिशील बुद्धिजीवि अपने पेट दर्द (या गड़बड़ी) को फेसबुक या टि्वटर पर बयां भी कर रहे हैं। उनके पेट सबसे अधिक इसीलिए भी दुख रहे हैं कि कैसे मोदी ने जापान को भारत के इत्ता करीब ला दिया! व्यापार से लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र तक में अपना डंका बजवा दिया! जो चीन में होना चाहिए था, वो जापान में कैसे हो गया! विकास के सिद्धांत और भाषा (हिंदी) की चमक ने तो बाजी ही पलटकर रख दी प्यारे।

यह करिश्मा देखकर प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के साथ-साथ हमारा विपक्ष भी खासा 'हैरान' है लेकिन अपनी हैरानी को व्यक्त करने की स्थिति में नहीं है। शायद इसीलिए उनके मंत्रीगण अपनी खीझ कुछ दूसरी तरह से निकाल और मिटा रहे हैं। मोदी ने तो खिसायानी बिल्लियों को खांबा नोचने तक की स्थिति में भी नहीं छोड़ा। हाय...।

मैंने देखा था- जापान में मोदी जब बांसुरी और ड्रम बजा रहे थे- मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों ने कानों में रूई ठूंस रखी थी ताकि परदे सलामत रहें। वैसे, मैंने सुना है कि प्रगतिशील बुद्धिजीवि कान के बेहद कच्चे और उधार की विचारधारा के बेहद पक्के होते हैं। प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के कानों पर मेरा कोई जोर तो नहीं, मैं तो बस अपने कानों की फिकर कर सकता हूं। कर रहा हूं।

सच बताऊं, मैं मेरे मोहल्ले के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की मोदी सरकार पर की गई टिप्पणियों को ज्यादा गंभीरता से लेता भी नहीं क्योंकि ऐंवई टिप्पणियां करते रहना उनकी आदात में शुमार है। वे पिछली सरकारों पर भी ऐसे ही टिप्पणियां करते रह चुके हैं। शायद टिप्पणियां कर-कर ही वे अपने पेट की गड़बड़ी (दर्द) को शांत कर लेते हों। जब बंदे कने अपना करने को कुछ नहीं होता तो वो सिर्फ टिप्पणियां करता है ताकि जुबान और पेट का हाजमा दुरुस्त रहे।

देखो प्यारे, न पिछली सरकारें चली हैं न वर्तमान सरकार प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के भुनभुनाने या रूठने से चलने वाली है। सरकार को जो करना है, करेगी ही। फिर भी अगर मेरे मोहल्ले या देश के प्रगतिशील बुद्धिजीवि अपने पेट को गड़बड़ (दर्द) रखना चाहते हैं तो शौक से रखें। क्योंकि पेट है उनका। है कि नहीं...।

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

कवि और रायता

चित्र साभारः गूगल
अमूमन कवि रायता नहीं फैलाते। रायता फैलाने वालो में आलोचकों की भूमिका मुख्य होती है। आलोचक इसीलिए भी रायता अधिक फैलाते हैं ताकि पाठकों के बीच अपनी 'हनक' को बरकरार रख सकें। खुद मैं कई दफा आलोचकों के फैलाए रायते का शिकार हुआ हूं। इसीलिए मेरी कोशिश यही रहती है कि मैं आलोचकों से अधिक से अधिक दूरी बनाकर रखूं। फ्री-फंट में अपना रायता फैलवाना भला कौन चाहेगा? है कि नहीं।

मगर उन कवि महोदय ने तो कमाल ही कर दिया। खुले आम यह कहकर कि- फलां पार्टी के सदस्यों ने मुझसे दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाने के वास्ते संपर्क किया था- जबरदस्त रायता फैला दिया है। आजकल प्रत्येक सोशल साइट और मोहल्ले के नुक्कड़ पर कवि महोदय के फैलाए रायते के ही चर्चें हैं। खुद उनकी पार्टी वाले परेशान हैं कि फैलाए गए रायते को कैसे सिमेटा जाए। हालांकि पार्टी चीफ स्वयं रायता-फैलाऊ एक्सपर्ट हैं पर इस दफा उनकी बोलती भी बंद है।

वैसे यह कोई पहली बार नहीं है, जब कवि महोदय ने रायता फैलाया हो। जब भी उन्हें मौका मिलता है- किसी न किसी बहाने रायता फैलाकर अपनी और पार्टी की 'भद्द' पिटवा ही देते हैं। लेकिन बाज फिर भी नहीं आते। शायद रायता फैलाना कवि महोदय का 'फेवरेट शगल' हो। सुना है, उन्होंने अपनी तुकबंदी युक्त कविताओं से भी कई बार रायता फैलाया है। मेरे मोहल्ले में ही कई दीवाने, कई पागल हैं उनकी कविताओं के।

चूंकि कवि महोदय अब पक्की राजनीति में हैं इसीलिए रायता फैलाना और भी जरूरी हो जाता है। कवि महोदय को अच्छे से मालूम है कि कविता के मंच से कहीं बेहतर रायता राजनीति में फैलाया जा सकता है। लेकिन यह भी है कि कविता के मंच से फैलाए गए रायते को तो फिर भी सिमेटा जा सकता है पर राजनीति में एक दफा जो रायता फैल गया तो फैल ही गया। फिर अच्छे-अच्छे इसे सिमेट नहीं पाते।

एक तरह से कवि महोदय ने रायता फैलाकर ठीक ही किया। कम से कम अपने मन की भीतरी इच्छा तो जाहिर कर दी। और सोशल नेटवर्किंग वालो को बैठे-ठाले मुद्दा दे दिया- मन लगाने को। आजकल मन का लगना सबसे जरूरी है, चाहे कैसे या किसी भी सूरत से लगे।

बहरहाल, रायते के फैलने से प्याले में तूफान का आना लाजिमी था- आया भी। अब प्रयास यह हो रहे हैं कि फैलाए गए रायते का लाभ कैसे उठाया जाए। दिल्ली की गद्दी जित्ती महत्त्वपूर्ण उनके लिए है, इनके लिए भी है। दोनों तरफ से रस्साकशी जारी है। और रायते का फैलाव निरंतर बढ़ाता ही जा रहा है।