बुधवार, 6 अगस्त 2014

मैं भी लिखूंगा किताब!

चित्र साभारः गूगल
मैं अपनी किताब न लिखने की जिद को त्याग रहा हूं। मुझे अब समझ में आ गया है कि मशहूर होने के लिए खुद की किताब का होना बहुत जरूरी है। किताब अगर 'विवादस्पद' हो तो क्या कहना! विवाद से बहस का रास्ता खुलता है। और, बहस से मशहूर होने का चांस हाथ आता है।

साहित्यिक किताब का अब ज्यादा महत्त्व नहीं रहा। किताब अगर राजनीतिक है तो कवरेज पूरी मिलेगी। राजनीतिक होने के साथ-साथ किताब में अगर किसी ऊंची राजनीतिक हस्ती के व्यक्तिगत मसलों का जिक्र है फिर तो शोला भड़कना तय मानिए। शोला भड़काने के लिए लेखक को ज्यादा कुछ करने की आवश्यकता नहीं, इसके लिए मीडिया काफी है। मीडिया में ऐसे मसलों का आना मतलब 'ब्रेकिंग न्यूज' का बनना।

किताब के जरिए अपने व्यक्तित्व की मार्केटिंग कैसी की जाती है, इसे संजय बारू और नटवर सिंह से समझा जा सकता है। दावा है, अपने राजनीतिक जीवन में दोनों ने जित्ता भी नाम कमाया हो, उससे कहीं ज्यादा किताब लिखकर कमा लिया है। दोनों की किताबों के आज हर जगह चर्चो हैं। बहसें हो रही हैं। समीक्षाएं की जा रही हैं। पुराने-धुराने गड़े मुर्दे उघेड़े जा रहे हैं। मीडिया अपने तरीके से किताब के साथ-साथ ज्वलंत मसलों को मसाला लगाकर भुना रहा है। और क्या चाहिए प्यारे? घर बैठे हिट होने का यह तरीका मस्त है।

इसी तर्ज पर मैं भी किताब लिखना चाहता हूं। हालांकि मेरी किताब का राजनीतिक पक्ष उत्ता तगड़ा नहीं होगा, जित्ता नटवर सिंह का रहा। मगर साहित्यिक पक्ष को ही इत्ता तगड़ा बना दूंगा कि राजनीतिक जैसा लगेगा। साहित्य में राजनीति का घाल-मेल बरसों पुराना है। हां, यह बात अलग है कि मंजरे-आम पर उस तरह से आ नहीं पाता, जैसे आना चाहिए। पर कोई नहीं। जो किसी ने नहीं किया, मैं करूंगा।

आजकल जब हर कोई किसी न किसी तिकड़म के साथ मशहूर होने में लगा है तो फिर मैं ही क्यों पीछे रहूं? देखिए न, नटवर सिंह किताब लिखकर मशहूर हो गए। आमिर खान टेपरिकॉर्डर थामे पटरी पर न्यूड खड़े होकर मशहूर हो गए। एक नेताजी मुंह में रोटी ठूंसकर मशहूर हो गए। गोयल साहब बिहारियों को दिल्ली से बाहर भेजे जाने वाला बयान देकर मशहूर हो गए। आदि-आदि। तो फिर मैं भी किताब लिखकर मशहूर हो लेता हूं।

मशहूर या चर्चित होने का सबसे बड़ा फायदा यह मिलता है कि आप पर पहचान का संकट नहीं रहता। जो नहीं जानते, वे भी अच्छे से जान जाते हैं। हलवाई मिठाई कभी अपने लिए नहीं बनाता, मशहूर होने के लिए बनाता है ताकि नाम और पैसा कमा सके।

किताब का खाका मैंने दिमाग में तैयार कर लिया है। बस लिखना बाकी है। लेकिन उससे पहले जरा नटवर सिंहजी का 'आर्शीर्वाद' ले आऊं, क्या पता 'फल' जाए। है कि नहीं...!

1 टिप्पणी:

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

ज़रूर लिखिए -फलने का तो नहीं कह सकते 'फ़ूल'(आजकल फ को फ़ लिखने का फ़ैशन चल गया है,आगे आप ख़ुद समझदार हैं )ने का संतोष ज़रूर देगी!