मंगलवार, 19 अगस्त 2014

मेरी भी जासूसी कराओ

चित्र साभारः गूगल
मेरी जासूसी होने या करवाने का सुख अभी तलक मुझे नहीं मिला है। जबकि मैं दिल से चाहता हूं कि कोई मेरी जासूसी भी करे। मेरी जासूसी के चर्चे समाज के साथ-साथ मीडिया जगत में भी हों। लेखकिए बिरादरी में मेरी जासूसी को लेकर लंबे-लंबे लेख लिखे जाएं एवं बहस हो। अरे, लेखक हुआ तो क्या हुआ, जासूसी मेरी भी बनती है!

अमूमन, लेखकों की जासूसी पर कोई ध्यान नहीं देता। कहते हैं- लेखक है। भला लेखक कने ऐसा क्या है, जिसकी जासूसी होनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है। जासूसी लेखक की भी बनती है। आज का लेखक पहले वाला लेखक नहीं रहा। अब लेखकों के भी ऊंचे-ऊंचे लोगों से संबंध होते हैं। कौन सा लेखक किस लेखक की 'वाट' लगाने की तैयारी में हैं, किससे जुगाड़ गांठकर क्या लिख व छपवा रहा है, इसका पता जासूसों को होना चाहिए।

मैं तो लेखकों की जासूसी के वास्ते एक अलग ‘लेखकिए जासूसी विभाग‘ बनावाने के पक्ष में हूं। सरकार को इसका संज्ञान लेना चाहिए।

देखिए, नेता और लेखक में कोई ज्यादा फर्क नहीं होता। दोनों ही समाज से जुड़े होते हैं। दोनों ही जनता और पाठक आड़ में अपनी-अपनी 'राजनीति' करते हैं। दोनों के ही अपने-अपने गुट होते हैं। दोनों ही हर वक्त इस तिकड़म में लगे रहते हैं कि किसे उठाना है और किसे गिराना।

गाहे-बगाहे नेताओं की तो जासूसी हो जाती है किंतु लेखकों की नहीं होती। नेताओं की जासूसी होने की खबर फैलते ही सियासत में हंगामा-सा मच जाता है। क्या अखबार, क्या चैनल सब पर नेताजी की जासूसी के बहाने तीखी बहसें होने लगती हैं। पक्ष-विपक्ष आपस में भीड़ जाते हैं। संसद में हल्ला मचता है। कहीं-कहीं पर धरना-प्रदर्शन भी हो जाता है।

बस ऐसा ही सबकुछ लेखकों की जासूसी के बहाने भी होना चाहिए। मिसाल के तौर पर, अगर मेरी जासूसी हो तो उसे 'प्रमुख खबर' बनना चाहिए। मेरे लेखन, मेरे प्रकाशन, मेरे संबंध, मेरे पुरस्कार आदि-इत्यादि के बारे में बकायदा जासूसी होकर लेखकिए समाज को पता चलना चाहिए। संभव हो तो मेरी जासूसी का प्रकरण संसद के भीतर पर उठाना चाहिए। आखिर दुनिया को पता तो लगे कि लेखक की जासूसी का असर नेता से कमतर नहीं होता।

न जाने नेता लोग अपनी जासूसी को 'अपमान का मुद्दा' क्यों बना लेते हैं? जबकि जासूसी एक मस्त विधा है। यों भी, सामान्य इंसान की तो कोई जासूसी करता-करवाता नहीं। जासूसी हमेशा नाम वाले बंदे की ही होती है। जासूसी में नाम आने का मतलब है- 'प्रतिष्ठा में वृद्धि'। क्या समझे...!

मुझे ही देख लीजिए न, मैं तो अपनी जासूसी करवाने के पक्ष में जाने कब से हूं। एक अपनी नहीं प्रत्येक बड़े लेखक की भी। पर कोई करता ही नहीं। अभी तलक मैंने लिखकर नाम कमाया, थोड़ा-बहुत अगर जासूसी के बहाने भी कमा लूंगा तो भला किसका क्या चला जाएगा?

अरे, सरकार तो सरकार आज तलक मेरी जासूसी मेरी पत्नी ने भी कभी नहीं करवाई, इसका भी मुझे बेहद दुख है। कम से कम पत्नी तो मेरी जासूसी करवा ही सकती थी। पता नहीं मेरी पत्नी को मुझ पर इत्ता विश्वास क्यों है? जबकि आजकल की पत्नियां जासूसी मामले में पतियों से ज्यादा सजग होती हैं। पर हाय! मेरी ऐसी किस्मत कहां!

फिर भी, मैं चाहूंगा कि बतौर लेखक मेरी भी जासूसी हो। ताकि मेरा मान लेखकिए बिरादरी के साथ राजनीतिक हलकों में भी बढ़ सके। क्यों प्यारे, है कि नहीं।

2 टिप्‍पणियां:

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

किससे जुगाड़ गांठकर क्या लिख व छपवा रहा है,


यह वास्‍तव में ही बहुत गहन प्रश्‍न है.

Anshu Mali Rastogi ने कहा…

जी। काजलजी। यकीनन।