शनिवार, 30 अगस्त 2014

वरिष्ठों का मोहल्ला

चित्र साभारः गूगल
मेरे मोहल्ले को 'वरिष्ठों का मोहल्ला' कहा जाता है। मेरे मोहल्ले में ज्यादातर साहित्य और राजनीति के ही वरिष्ठ रहते हैं। हालांकि मैं अभी वरिष्ठ नहीं हुआ हूं मगर फिर भी वरिष्ठों के मोहल्ले में ही रहता हूं। लेकिन वरिष्ठों से 'दूरी' बनाकर। वरिष्ठ मेरी उपस्थिति को अपने बीच 'पसंद' नहीं करते। न ही मैं चाहता हूं कि कोई वरिष्ठ अपनी 'वरिष्ठता का दंभ' मुझ पर कायम करे। मैं बस दूर से ही मोहल्ले के वरिष्ठों की 'वरिष्ठतम गतिविधियों' को देखता-समझता रहता हूं।

यह बात दीगर है कि साहित्य और राजनीति के वरिष्ठ आपस में मिलकर न कभी बैठते हैं न बतियाते। दोनों के बीच एक खींचाव-सा हर समय बना रहता है। इस खींचाव का मुख्य कारण (जहां तक मैं समझ-जान पाया हूं) दोनों के मध्य 'वैचारिक भिन्नता' है। साहित्य के वरिष्ठ राजनीतिक मुद्दों पर राजनीति के वरिष्ठों से कभी 'सहमत' नहीं दिखते। न ही राजनीति के वरिष्ठ साहित्यिक मुद्दों पर साहित्य के वरिष्ठों से। दोनों ही जन अपनी ढपली अपना राग अपने-अपने खेमे वालो को सुनाते-बताते रहते हैं।

भले दूर रहकर या बैठकर ही सही दोनों फील्ड के वरिष्ठ एक-दूसरे की 'हूटिंग' का कभी कोई मौका नहीं छोड़ते। वरिष्ठों के बीच गाहे-बगाहे चलने वाली हूटिंग मुझे बेहद दिलचस्प लगा करती है। हूटिंग सुनकर अक्सर महसूस होता है कि वरिष्ठ लोग क्यों हर वक्त अपनी 'ऐंठ' में रहा करते हैं। दरअसल, वरिष्ठों की ऐंठ ही उन्हें राजनीति और साहित्य के बीच वरिष्ठतम बनाए हुए हैं। अक्सर अपने जमाने को याद करते हुए वे नई पीढ़ी वालो से कहते हैं कि जो- अपने समय में- हमने कर लिए तुम क्या खाकर करोगो?

इधर राजनीति में वरिष्ठों के दिन काफी बुरे चल रहे हैं। युवा पीढ़ी एक-एक कर पार्टी से वरिष्ठों को किनारे कर नए लोगों के तईं रास्ते खोल रही है। बेचारे आडवाणीजी और जोशीजी का इन दिनों यही हाल है। एक जमाने में दोनों ही जन पार्टी की 'नाक' हुए करते थे किंतु आज अपनी नाक बचाने के भी न रहे। बहुत करीने से वरिष्ठों को किनारे कर दिया गया है।

इस 'हशिएनुमा परिवर्तन' को मेरे मोहल्ले के राजनीति वरिष्ठ भी नहीं पचा पा रहे। युवा पीढ़ी पर निरंतर हूटिंग कर रहे हैं। कह रहे हैं- युवा पीढ़ी अपने वरिष्ठों की कद्र नहीं करती। जिन्होंने पार्टी के लिए इत्ता किया, उनका यह हश्र। अवसरवादी हैं सब के सब।

दूसरी तरफ, साहित्य के वरिष्ठ इस हश्र पर 'तालियां' बजा रहे हैं। अपनी वरिष्ठता पर 'इठला' रहे हैं। कह रहे हैं- हमारे यहां (साहित्य में) यह सब नहीं होता। हमारे यहां हर वरिष्ठ मौज में है। अभी भी हम साहित्य में पूजे-नवाजे जाते हैं।

मुझे लगता है, मेरे मोहल्ले के साहित्यिक वरिष्ठ शायद किसी 'गलतफहमी' में जी रहे हैं। उन्हें मालूम ही नहीं कि साहित्य में से भी अब वरिष्ठों के दिन लदने लगे हैं। युवा लेखक वरिष्ठों को केवल अपने लेखन के दम पर लगातार कड़ी चुनौतियां दे रहे हैं। साहित्य में भी वरिष्ठों की डिमांड सीन से अब गायब होने लगी है। इसे ही तो 'बदलाव' कहते हैं प्यारे।

फिलहाल, मैं मेरे मोहल्ले के राजनीतिक और साहित्यिक वरिष्ठों की खुशफहमियों को देख-सुन रहा हूं और मन ही मन गुनगुना रहा हूं- दिल के खुश रखने को गालिब यह ख्याल अच्छा है।

6 टिप्‍पणियां:

मधु अरोड़ा, मुंबई ने कहा…

अंशुमालीजी,
बहुत ही अच्‍छा लिखा.....तुलनात्‍मक अध्‍ययन...पैनी नज़र के दर्शन....बधाई....

निर्मला कपिला ने कहा…

तो क्या हमारा हाल भी एडवानी जोशी जी जैसा होने वाला है लो जी बुरे दिन आ गये1

कविता रावत ने कहा…

समय बड़ा बलवान ..एक दिन सबके ही दिन लद जाते हैं
...बहुत सही

RR ने कहा…

बहुत बढ़िया लेख अंशुमाली जी ।

jyoti khare ने कहा…

बहुत बढ़िया पड़ताल
क्या खूब वर्णन
उत्कृष्ट प्रस्तुति
बधाई

आग्रह है --
भीतर ही भीतर -------

वाणी गीत ने कहा…

परिवर्तन सृष्टि का नियम है। अस्वीकार से बदलता नहीं!