गुरुवार, 28 अगस्त 2014

टूटी नाक के बुद्धिजीवि

चित्र साभारः गूगल
अरसा हुआ मेरे मोहल्ले के एक बड़े कम्युनिस्ट ने अपनी टूटी नाक दिखलाते हुए मुझसे कहा था- 'लीजिए, हमारी भी टूट गई।' तब मैंने उनको सांत्वना देते हुए बोला था- 'नकली लगवा लीजिए ताकि दुनिया को दिखलाने के लिए इज्जत बची रहे।' फिर मालूम नहीं कि उन बड़े कम्युनिस्ट महोदय ने नकली नाक लगवाई कि नहीं पर असली नाक के कम्युनिस्ट अब मुझे न के बराबर ही दिखालाई पड़ते हैं।

इधर, कुछ रोज से मेरे मोहल्ले के बुद्धिजीवियों की नाक टूटने की खबरें लगातार आ रही हैं। इनमें कई बुद्धिजीवि तो ऐसे हैं जिन्होंने अपनी नाक को बचाने के तईं ताउम्र संघर्ष किया। नेताओं से भिड़े। सरकार से लड़े। व्यवस्था के खिलाफ अड़े। मगर अब सुनने में आया है कि उनकी भी नाक टूट गई है।

हालांकि कहने वाले कह रहे हैं कि बुद्धिजीवियों ने अपनी नाक खुद ही तुड़वाई है, किसी ने जानकर नहीं तोड़ी। हो सकता है, यह बात सही हो क्योंकि बुद्धिजीवि बड़ा सियाना किस्म का प्राणी होता है, कब क्या कर बैठे किसी को पता नहीं चलता।

प्रायः मैंने देखा-सुना है कि सत्ता परिवर्तन होते ही खास किस्म की विचारधारा वाले बुद्धिजीवि अपनी नाक तुड़वा बैठते हैं। ऐसा वो जानकर किया करते हैं ताकि समाज की 'सहानुभूति' जुटा सकें। सहानुभूति जुटाने के मामले में बुद्धिजीवि बेहद 'चतुर' होता है। जहां उसे सरकार के बीच जगह बनाने या साहित्य के बीच पुरस्कार पाने की संभावना नजर आती है, झट्ट से पाला बदलकर गिरगिटनुमा हो जाता है। बुद्धि का इस्तेमाल समाज के लिए कम अपनी 'निजी नाक' को बचाने में अधिक करता है। जब नाक नहीं बचा पाता, तुड़वा लेता है ताकि बेलैंस बनाए रहे।

बुद्धिजीवि के लिए विचाराधारा नाक के बाल जैसी होती है। मन करा बढ़ा लिए, मन कर काट दिए। चूंकि नाक के अंदर के बाल नजर कम आते हैं इसीलिए बुद्धिजीवि भी अपनी विचाराधारा को उसी प्रकार 'मेनटेन' करके रखता है। और एक मैं हूं, जो अपनी नाक के बाल काटता ही नहीं। डर-सा लगा रहता है कि कहीं नाक के बाल काटने के चक्कर में मेरी नाक ही न कट जाए।

सच कहूं तो मुझे टूटे नाक के बुद्धिजीवि बेहद पसंद हैं। उनके साथ संगत करना मुझे अच्छा लगता है। टूटी नाक के बुद्धिजीवि ज्यादा बौद्धिकता भी नहीं झाड़ पाते। क्योंकि ज्यादा बौद्धिकता झाड़ने के चक्कर में ही तो उन्हें अपनी नाक से हाथ धोना पड़ा था। यों भी, ज्यादा बौद्धिक या प्रगतिशील होना न सेहत के वास्ते ठीक होता है न जीवन के। सौ झंझट हैं, बौद्धिक और प्रगतिशील होने के।

टूटी नाक के बुद्धिजीवियों को देखकर मेरा मन भी उनके जैसा होने को करता है। हालांकि मैंने कई दफा कोशिश की बुद्धिजीवि होने-बनने की लेकिन हर बार असफलता ही हाथ आई। अरे, मैंने तो तमाम प्रकार के टोने-टोटके तक कर-करवा कर देख लिए बुद्धिजीवि बनने के किंतु कोई फायदा नहीं। पिछले दिनों एक बड़े ज्योतिषी ने मेरा हाथ देखकर बताया था कि बुद्धिजीवि बनने का योग कम से कम इस जन्म में तो नहीं है मेरा।

खैर, कोई नहीं। मैं भले ही बुद्धिजीवि न हो-बन सका मगर टूटी नाक के बुद्धिजीवियों को देखकर मुझे बेहद संतोष मिलता है। फिर भी, जो बुद्धिजीवि अपनी टूटे नाक देखकर 'अपमानित-सा' महसूस करते हैं, उन्हें समय का साथ चलने की आदत डाल लेनी चाहिए। नहीं तो फिर हर कोई उन्हें टूटी नाक का बुद्धिजीवि कहकर 'चिढ़ता' रहेगा। और वे चिढ़ते...।

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