शनिवार, 23 अगस्त 2014

काश! मैं भैंस होता

चित्र साभारः गूगल
बेशक, आप हंसेंगे मगर यह सच है कि मैं इंसान क्यों हूं, भैंस क्यों नहीं? मुझे अपने इंसान होने पर बेहद 'रंज' होता है। दिन-रात ऊपर वाले को कोसता रहता हूं कि मुझे इंसान क्यों बनाया? मैं इंसान बनने के लायक था ही नहीं। मुझे तो भैंस होना चाहिए था।

भैंस होता तो आज वीआइपी ट्रीटमेंट पा रहा होता। चौबीस घंटे मंत्रीजी के चेलों के संरक्षण में रहता। अच्छे से खिलाई-पिलाई होती। यहां-वहां की टहल के लिए सरकारी गाड़ी (हूटर वाली) मिलती। धोखे से अगर कहीं गुम हो जाता तो पूरा का पूरा सरकारी अमला मेरी खोजा-खाजी में व्यस्त हो जाता। अन्य भैंसों की तरह मेरे भी 'ऐश' होती।

लेकिन अपनी किस्मत को कहां ले जाऊं? इंसान बना बैठा हूं, वो भी दौ कौड़ी का। न मेरी घर में कोई औकात है न बाहर। हर जगह इंसानों की तरह दुत्कार-हड़काया जाता हूं। अपनी तकलीफ लेकर न किसी मंत्री के पास जा सकता हूं न मोहल्ले के सभासद के पास। बस मन मसोस कर जाता हूं कि हाय! मैं इंसान क्यों हूं?

भैंसों के प्रति मेरा प्रेम नया नहीं है। बरसों पुराना है। लेकिन यह तब से और अधिक बढ़ गया है, जब से एक धाकड़ मंत्रीजी की भैंसों के वीआइपी ट्रीटमेंट का पता चला है। मंत्रीजी की भैंसों को जिस मुस्तैदी से ढूंढ़ा या खरीदकर (हूटर वाली) सरकारी गाड़ी में बैठाकर लाया गया, कमाल है। कित्ती उम्दा किस्मत पाई हुई हैं, मंत्रीजी की भैंसें। समूचे समाजवाद का मंत्रीजी की भैंसों के आगे नतमस्तक होना, वाकई बहुत बड़ी बात है प्यारे। कह सकते हैं कि समाजवाद केवल इंसानों के प्रति ही नहीं बल्कि भैंसों के प्रति भी समाजवादी दृष्टि रखता है। इसीलिए समाजवाद में मेरी मंत्रीजी जित्ती ही आस्था है।

हालांकि कहने वाले कह रहे हैं कि भैंसों को वीआइपी ट्रीटमेंट देना न न्यायसंगत है न तर्कसंगत। अब कहने वालो को कौन समझाए कि ये मंत्रीजी भैंसें हैं कि टटपूंजीए की नहीं। जब मंत्रीजी वीआइपी ट्रीटमेंट के हकदार हो सकते हैं तो फिर उनकी भैंसें क्यों नहीं? कहने वालो को शायद मालूम नहीं कि पिछली दफा भैंसों की सुरक्षा में हुई चूक का खामियाजा जिम्मेदारों को संस्पेंड होकर भुगतना पड़ा था। फिर दोबारा चूक क्यों होती भला?

भैंसों के शाही ठाठ को देखकर मेरा बार-बार मन कर रहा है खुद भैंस हो जाने का। दुआ कर रहा हूं, जल्द से जल्द इस शरीर से मुक्त पाकर, भैंसे बन जाऊं। इंसान होकर वीआइपी दरजे का ट्रीटमेंट भले न मिल पाया हो, किंतु भैंस बनकर तो मिल ही जाएगा न।

कहना न होगा कि समजावादी सरकार में भैंसों के अच्छे दिन चल रहे हैं, इस पर किसी को 'एतराज' भला क्यों हो?

2 टिप्‍पणियां:

रचना त्रिपाठी ने कहा…

भैस बनकर कहीं इधर-उधर मेरा मतलब ऐरे-गैरे तबेले में पैदा हो गए तो क्या होगा... जरा सोचिए ...ग्रह-गोचर के दृष्टिकोण से कुछ उपाय अवश्य करें.... रोज सुबह उठ स्नान कर कुछ ब्राह्मणों को दान दक्षिणा देते रहे...और समाजवादी चालीसा का नियमित पाठ करते रहें...निश्चय ही ईश्वर आपकी मनोकामना पूरी करेंगे...
:)

Anshu Mali Rastogi ने कहा…

आपकी सलाह सर आंखों पर रचनाजी।