रविवार, 17 अगस्त 2014

संस्मरण-मोड में हिंदी का लेखक

चित्र साभारः गूगल
हिंदी के लेखक को संस्मरण लिखने का बहुत शौक होता है। अपने लेखकिए करियर में चाहे वो कुछ और ढंग का न लिख पाया हो लेकिन संस्मरण बेहद जीन-जान लगाकर लिखता है। गजब यह है, हिंदी का लेखक हर बात-मुलाकात में से संस्मरण की जुगाड़ कर ही लेता है। संस्मरण लेखन का जुनून उस पर इस कदर तारी रहता है कि वो सोते-जागते, नहाते-धोते, चलते-दौड़ते, खाते-पीते संस्मरण-मोड में ही रहता है। ज्यादातर संस्मरण लेखकों के चेहरे भी संस्मरण जैसे ही दिखाई देते हैं।

शायद हिंदी के लेखक को संस्मरण-लेखन सबसे आसान विधा लगती है। इसीलिए जरा-सा उम्रदराज होते ही वो तुरंत संस्मरण-मोड में चला जाता है। फिर संस्मरण पर संस्मरण, संस्मरण पर संस्मरण लिख-लिखकर अपने वक्त के साथ-साथ हमारा वक्त भी खूब खराब करता है। चूंकि हिंदी की ज्यादातर पत्र-पत्रिकाएं संस्मरण विधा की दीवानी रहती हैं, इसलिए उसे छापती भी खूब हैं। कभी-कभी तो संस्मरण लेखक कहानी में ही संस्मरण का तडक़ा लगा देता है। तो कु छ कविता में भी संस्मरण की जुगाड़ बैठा लेते हैं।

अच्छा, संस्मरण लेखक के पास यह सुविधा रहती है कि वो किसी भी बात या व्यक्ति पर संस्मरण लिख सकता है। शब्दों का खजाना उसके कने रहता ही है। बात को विस्तार देने में उसे महारथ हासिल होता है। बस फिर क्या, हो गया संस्मरण तैयार। हिंग लगे न फिटकरी रंग चोखा का चोखा।

संस्मरण जब पत्रिका में छपता है फिर सबमें बंटता भी है। जोर देकर कहा जाता है, पढ़ें जरूर। पढक़र प्रतिक्रिया भी दें किंतु प्रतिक्रिया सकारात्मक होनी चाहिए। नकारात्मक प्रतिक्रिया को संस्मरण लेखक निगल नहीं पाता।

हालांकि एकाध दफा मुझसे भी संस्मरण पढऩे को कहा गया मगर पढ़ न सका। चलो एक-दो पन्ने हो तो पढ़ भी लिए जाएं, अब 15-20 पन्नों के संस्मरण पढऩे का टाइम किसके कने है। एक तो संस्मरण का नाम सुनते ही दिल-दिमाग पर आधा बुढ़ापा पहले ही छा जाता है। कहीं अगर ढंग से बैठकर पढ़ लिया जाए तो जवानी में ही बूढ़े होने का खतरा बना रहता है। फिर यह भी है कि संस्मरण तुम्हारे और पढ़ें हम; क्यों भला? यहां दिमाग पर वैसे ही इत्ता बोझ पड़ा रहता है, ऊपर से संस्मरण का बोझ और डाल लें। न न यह हमसे न होगा प्यारे।

संस्मरण आदि नितांत निजी मसले हैं, इसमें दूसरों को क्यों हिलगाना?

अक्सर देखा है, संस्मरण लिखते वक्त लेखक बेहद भावुक किस्म का हो जाता है। सामने वाले की बुराईयों पर भी अपनी भावनाओं का परदा डाल देता है। कभी-कभी तो लगता है, इत्ता भावनात्मक होकर कहीं अपना दिल ही न निकाल बैठे। संस्मरण लेखन काफी कुछ स्मृति-शेष से मिलता-जुलता मसला है।

इसीलिए प्यारे मेरी तो हर पल कोशिश यही रहती है कि मैं संस्मरण लिखने या पढऩे के चक्कर में न ही पड़ूं। दुनिया में और भी तरह का लेखन है संस्मरण के सिवाय। फिर भी जिन्हें केवल संस्मरण लेखन का ही शौक है, वे अपने शौक को पूरा करें पर दूसरों पर पढऩे का दबाव न डालें। एक दफा जो संस्मरण या आत्मकथा के चक्कर में पड़ गया समझिए आधा उम्रदराज तो तब ही हो जाएगा।

पता नहीं अंगरेजी लेखन में संस्मरण लेखक का क्या हाल रहता है? पर हां इत्ता अवश्य कह सकता हूं, अंगरेजी का लेखक हिंदी के लेखक की तरह इत्ती जल्दी संस्मरण-मोड में तो नहीं ही जाता होगा! उसके संस्मरण कम से कम हिंदी के लेखक से तो काफी जवान होते होंगे।

अब हिंदी के लेखक की मजबूरी यह है कि उसे अपने पूर्वजों की पुरातन परंपराओं-स्थापनाओं को ढोना है, तो ढो रहा है, कभी संस्मरण लेखन के माध्यम से तो कभी समीक्षा-आलोचना-आत्मकथा के। हिंदी के लेखक और लेखन की यही कहानी है।

2 टिप्‍पणियां:

कविता रावत ने कहा…

बहुत बढ़िया चिकोटी ....
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें!

expression ने कहा…

:-)

हम तो लिखते लिखते रह गए !!

अनु