सोमवार, 11 अगस्त 2014

गंजों के पक्ष में

चित्र साभारः गूगल
हालांकि मैं स्वयं गंजा नहीं हूं मगर गंजों के प्रति दिल में 'बेहद सम्मान' रखता हूं। गंजों को मैं इस धरती का सबसे 'चिकना समझदार' मानता हूं। गंजे गंजा होने के बावजूद वो सब समझ लेते हैं, जिनको अच्छा से अच्छा बाल वाला भी नहीं समझ पाता। सिर पर बाल होने के कारण भले ही बाल वाले खुद को हीरो मानें किंतु गंजों से बेहतर कतई नहीं हो सकते।

मुझे इस बात का फकर है कि मेरे मोहल्ले में सबसे अधिक गंजे हैं। और, हर गंजा एक से बढ़कर एक है। गंजा होने के नाते भले ही वे दूसरों की मजाक का कारण बनते हों मगर बुरा कभी नहीं मानते। हमेशा हंसते रहते हैं। और कहते हैं- गंजे बाल वालो से ज्यादा भले होते हैं। गंजे सीधा दिमाग से सोचते हैं और बाल वाले बाल के साथ दिमाग से।

मेरे मोहल्ले के गंजे पढ़ते-लिखते बहुत हैं। हालांकि उनमें से न कोई लेखक है न साहित्यकार मगर मेरा दावा है वे अपनी 'चिकनी खोपड़ी' के बल पर बड़े से बड़े लेखक-साहित्यकार को खुल्ली मात दे सकते हैं।

गंजे अपनी प्रगतिशीलता का कथित प्रगतिशीलों की तरह प्रदर्शन नहीं करते। गंजे जित्ता अपनी चिकनी खोपड़ी से प्रगतिशील होते हैं, उत्ता व्यवहार में भी। मैंने ऐसे बहुत ही कम गंजे देखे हैं जिनके मुंह पर मायूसी या माथे पर किस्म-किस्म के बल पड़े रहते हों।

गंजे बेहद बलशाली होते हैं, ठीक शेट्टी जैसे। अव्वल तो किसी से बैर रखते नहीं लेकिन जब रखते हैं तो अपने स्टैंड पर कायम रहते हैं। गंजों को न कोई हड़का सकता है न धमका।

गंजा होने का सबसे बड़ा सुख बालों की केयर से पूर्ण-मुक्ति भी है। सिर पर बाल का होना किसी बवाल-ए-जान से कम नहीं होता। इंसान जित्ती फिकर अपनी सेहत की नहीं करता, उससे ज्यादा बालों की करता है। दो-चार बाल झड़े नहीं कि चिंता में डूब जाता है। तरह-तरह के तेल-क्रीम-शैंपू इस्तेमाल करता रहता है। लेकिन प्यारे बाल तो बाल हैं; न किसी के रोके रुके हैं न किसी के टोके टूटे। जिसे गंजा होना है, वो तो होकर ही रहेगा, चाहे कुछ कर लो।

गंजे गंजा होने की चिंता से दूर आराम की जिंदगी जीते हैं। उन्हें मालूम है कि अब बाल नहीं आने हैं तो नहीं ही आने हैं। फिर काहे का गम? गंजा होने से खरचा भी कित्ता बचता है। न कंधे का रगड़ा, न तेल का झंझट, न नाई की गुलामी। अपनी खोपड़ी, अपना राज।

मोहल्ले के गंजों को देखते हुए सोच रहा हूं- मैं भी गंजा हो जाऊं। गंजा होने के सुख को गंजों के साथ, उनके बीच रहकर, जीऊं। दिमाग के भीतर जो जरा-बहुत किंतु-परंतु बचे रह गए हैं, उन्हें चिकनी खोपड़ी करवा कर चिकना बना लूं। इस बहाने बे-फालतू की वैचारिकता से बच जाऊंगा।

गंजों और गंजा होने के प्रति मेरी 'पक्षधरता' एकदम 'पारदर्शी' है। कृपया, रत्ती भर शक न करें।

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