रविवार, 10 अगस्त 2014

टमाटर पर 'लाल' सियासत

चित्र साभारः गूगल
प्याज पर छिड़ी सियासत की जंग का नजारा हम कई दफा देख-सुन चुके हैं। सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या अब भाजपा की हो प्याज ने बहुत ऊंचे-ऊंचे खेल खेले हैं। लेकिन इधर बाजी थोड़ा पलटी है। सियासत के केंद्र में अब टमाटर आ गया है। टमाटर पर लालम-लाल बहस जारी है। टमाटर ने न केवल सियासतदानों बल्कि अपने खाने वालो को भी लाल किया हुआ है। संसद के भीतर-बाहर नेता-सांसद कह रहे हैं- टमाटर महंगा होकर बहुत दुख दे रहा है। और, टमाटर खाने वाले कह रहे हैं- टमाटर हमारी सब्जी की जरूरत है।

सरकार अजीब से हालात में है कि करे तो क्या करे? चुनावी नारों और साभाओं में वायदा तो किया था अच्छे दिन लाने का लेकिन बीच-बीच में बुरे दिन लफड़ा किए हुए हैं। कभी प्याज रूलाता है, कभी आलू बे-दम कर जाता है, कभी पेट्रोल आग भड़काता है तो अब टमाटर ने लाल आंखें दिखा रखी हैं। ऊपर से निरंतर बढ़ती महंगाई और जमाखोरों का दबदबा सरकार के अच्छे दिन पर भारी पड़ते जा रहे हैं। दबी-खुली जुबान में अब लोग सरकार से पूछने भी लगे हैं- कहां हैं अच्छे वाले दिन? अभी कित्ता और इंतजार करें?

खैर, सरकार और सियासत के बीच मसला चाहे जो-जैसा भी हो किंतु मैं टमाटर के महंगा होने के पक्ष में हूं। निश्चित ही टमाटर को महंगा होना चाहिए। प्यारे, जब प्याज-आलू-दाल-दूध महंगे हो सकते हैं तो टमाटर के लाल (महंगा) होने में क्या हर्ज है? आखिर टमाटर को भी मौका मिलना चाहिए अपने दम पर सियासत में हलचल मचाने और अपने खाने वालो को महंगे में लाल करने का।

एक दफे को बंदा सब्जी में बिन प्याज खाए रह सकता है परंतु बिन टमाटर नहीं। सब्जी में जब तलक टमाटर की लाली न हो, मजा ही नहीं आता प्यारे। सलाद में टमाटर। पेट में कीड़े हों तो टमाटर। गालों की लाली बरकरार रखने को टमाटर। यहां तक कि टमाटर का उपयोग 'तारीफ' करने में भी किया जाता है। अब इत्ती खुबियों वाला टमाटर अगर कुछ महंगा हो भी गया तो क्या गलत हुआ? जैसे सबके आए टमाटर के भी अच्छे दिन आने चाहिए न।

कहने वाले खीझ में कह रहे हैं कि होने दो महंगा ससुरे को हम खाना ही बंद कर देंगे। थोड़े दिन बाद खुद-ब-खुद लाइन पर आ जाएगा। अमां, तो तुरंत से पहले बंद कर दीजिए न खाना। किनने मना किया है? न कभी टमाटर ने कहा होगा कि आओ मुझे खाओ। खाकर सेहत 'लाल' बनाओ।

यों भी, टमाटर के महंगा होने में एक अकेले गलती उसी की थोड़े है, सियासत से लेकर मौसम तक, हर कोई थोड़ा-बहुत जिम्मेवार है। अभी यह खबर भी पढ़ी कि भारत से काफी मात्रा में टमाटर पाकिस्तान भेजा जाएगा। पाकियों को भारत (खासकर, नासिक) का टमाटर बहुत पसंद है। अब आप ही बताइए कि कैसे न हो टमाटर की कीमतें लाल? अमां, टमाटर की जगह टिंडा, भसीड़ा, तुरई, परवल आदि भेज दो। टमाटर भेजकर क्यों आम आदमी की जेबें लाल किए हुए हो?

मेरे मोहल्ले में हालत यह है कि एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी को टमाटर नहीं दे रहा। बहुत से तो बाहर से ही कह देते हैं कि हम टमाटर खाते ही नहीं! मोहल्ले के सियाने तो पहले ही टमाटर का स्टॉक घर में भर चुके हैं। तिजोरियों में से रुपया-पैसा निकालकर उसमें टमाटर रख लिया है। पहले तो एक-दूसरे को अपने घर खाने पर बुला भी लिया करते थे मगर अब पूरी तरह से बंद है। कहीं टमाटर की पोल न खुल जाए।

अभी हाल एक बैंक का विज्ञापन देखा, जिसमें लिखा था- उनके यहां टमाटर के तईं लॉकर्स की सुविधा दी जा रही है। कमाल है, प्याज-आलू-टमाटर का स्टेटस इत्ता बड़ा हो जाएगा, कभी सपने में भी नहीं सोचा था! अब तो सोना-चांदी भी टमाटर के आगे बेमानी से लगने लगे हैं।

बढ़ी कीमत और सियासत के बीच ट्रैक पर दौड़ते टमाटर को पकड़ पाना सरकार तो क्या आम आदमी के लिए भी मुश्किल-सा लग रहा है। तो प्यारे समझदारी इसी में है कि टमाटर की लाली पर ज्यादा मोहित न हो, अपनी जीभ को काबू में रखो, अभी टमाटर के अच्छे दिन चल रहे हैं। अच्छे दिन में कौन क्या से क्या हो-बन जाता है शायद 'अब' बताने की जरूरत नहीं।

फिलहाल, यह समय टमाटर का है सिर्फ टमाटर का।

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