शनिवार, 30 अगस्त 2014

वरिष्ठों का मोहल्ला

चित्र साभारः गूगल
मेरे मोहल्ले को 'वरिष्ठों का मोहल्ला' कहा जाता है। मेरे मोहल्ले में ज्यादातर साहित्य और राजनीति के ही वरिष्ठ रहते हैं। हालांकि मैं अभी वरिष्ठ नहीं हुआ हूं मगर फिर भी वरिष्ठों के मोहल्ले में ही रहता हूं। लेकिन वरिष्ठों से 'दूरी' बनाकर। वरिष्ठ मेरी उपस्थिति को अपने बीच 'पसंद' नहीं करते। न ही मैं चाहता हूं कि कोई वरिष्ठ अपनी 'वरिष्ठता का दंभ' मुझ पर कायम करे। मैं बस दूर से ही मोहल्ले के वरिष्ठों की 'वरिष्ठतम गतिविधियों' को देखता-समझता रहता हूं।

यह बात दीगर है कि साहित्य और राजनीति के वरिष्ठ आपस में मिलकर न कभी बैठते हैं न बतियाते। दोनों के बीच एक खींचाव-सा हर समय बना रहता है। इस खींचाव का मुख्य कारण (जहां तक मैं समझ-जान पाया हूं) दोनों के मध्य 'वैचारिक भिन्नता' है। साहित्य के वरिष्ठ राजनीतिक मुद्दों पर राजनीति के वरिष्ठों से कभी 'सहमत' नहीं दिखते। न ही राजनीति के वरिष्ठ साहित्यिक मुद्दों पर साहित्य के वरिष्ठों से। दोनों ही जन अपनी ढपली अपना राग अपने-अपने खेमे वालो को सुनाते-बताते रहते हैं।

भले दूर रहकर या बैठकर ही सही दोनों फील्ड के वरिष्ठ एक-दूसरे की 'हूटिंग' का कभी कोई मौका नहीं छोड़ते। वरिष्ठों के बीच गाहे-बगाहे चलने वाली हूटिंग मुझे बेहद दिलचस्प लगा करती है। हूटिंग सुनकर अक्सर महसूस होता है कि वरिष्ठ लोग क्यों हर वक्त अपनी 'ऐंठ' में रहा करते हैं। दरअसल, वरिष्ठों की ऐंठ ही उन्हें राजनीति और साहित्य के बीच वरिष्ठतम बनाए हुए हैं। अक्सर अपने जमाने को याद करते हुए वे नई पीढ़ी वालो से कहते हैं कि जो- अपने समय में- हमने कर लिए तुम क्या खाकर करोगो?

इधर राजनीति में वरिष्ठों के दिन काफी बुरे चल रहे हैं। युवा पीढ़ी एक-एक कर पार्टी से वरिष्ठों को किनारे कर नए लोगों के तईं रास्ते खोल रही है। बेचारे आडवाणीजी और जोशीजी का इन दिनों यही हाल है। एक जमाने में दोनों ही जन पार्टी की 'नाक' हुए करते थे किंतु आज अपनी नाक बचाने के भी न रहे। बहुत करीने से वरिष्ठों को किनारे कर दिया गया है।

इस 'हशिएनुमा परिवर्तन' को मेरे मोहल्ले के राजनीति वरिष्ठ भी नहीं पचा पा रहे। युवा पीढ़ी पर निरंतर हूटिंग कर रहे हैं। कह रहे हैं- युवा पीढ़ी अपने वरिष्ठों की कद्र नहीं करती। जिन्होंने पार्टी के लिए इत्ता किया, उनका यह हश्र। अवसरवादी हैं सब के सब।

दूसरी तरफ, साहित्य के वरिष्ठ इस हश्र पर 'तालियां' बजा रहे हैं। अपनी वरिष्ठता पर 'इठला' रहे हैं। कह रहे हैं- हमारे यहां (साहित्य में) यह सब नहीं होता। हमारे यहां हर वरिष्ठ मौज में है। अभी भी हम साहित्य में पूजे-नवाजे जाते हैं।

मुझे लगता है, मेरे मोहल्ले के साहित्यिक वरिष्ठ शायद किसी 'गलतफहमी' में जी रहे हैं। उन्हें मालूम ही नहीं कि साहित्य में से भी अब वरिष्ठों के दिन लदने लगे हैं। युवा लेखक वरिष्ठों को केवल अपने लेखन के दम पर लगातार कड़ी चुनौतियां दे रहे हैं। साहित्य में भी वरिष्ठों की डिमांड सीन से अब गायब होने लगी है। इसे ही तो 'बदलाव' कहते हैं प्यारे।

फिलहाल, मैं मेरे मोहल्ले के राजनीतिक और साहित्यिक वरिष्ठों की खुशफहमियों को देख-सुन रहा हूं और मन ही मन गुनगुना रहा हूं- दिल के खुश रखने को गालिब यह ख्याल अच्छा है।

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

टूटी नाक के बुद्धिजीवि

चित्र साभारः गूगल
अरसा हुआ मेरे मोहल्ले के एक बड़े कम्युनिस्ट ने अपनी टूटी नाक दिखलाते हुए मुझसे कहा था- 'लीजिए, हमारी भी टूट गई।' तब मैंने उनको सांत्वना देते हुए बोला था- 'नकली लगवा लीजिए ताकि दुनिया को दिखलाने के लिए इज्जत बची रहे।' फिर मालूम नहीं कि उन बड़े कम्युनिस्ट महोदय ने नकली नाक लगवाई कि नहीं पर असली नाक के कम्युनिस्ट अब मुझे न के बराबर ही दिखालाई पड़ते हैं।

इधर, कुछ रोज से मेरे मोहल्ले के बुद्धिजीवियों की नाक टूटने की खबरें लगातार आ रही हैं। इनमें कई बुद्धिजीवि तो ऐसे हैं जिन्होंने अपनी नाक को बचाने के तईं ताउम्र संघर्ष किया। नेताओं से भिड़े। सरकार से लड़े। व्यवस्था के खिलाफ अड़े। मगर अब सुनने में आया है कि उनकी भी नाक टूट गई है।

हालांकि कहने वाले कह रहे हैं कि बुद्धिजीवियों ने अपनी नाक खुद ही तुड़वाई है, किसी ने जानकर नहीं तोड़ी। हो सकता है, यह बात सही हो क्योंकि बुद्धिजीवि बड़ा सियाना किस्म का प्राणी होता है, कब क्या कर बैठे किसी को पता नहीं चलता।

प्रायः मैंने देखा-सुना है कि सत्ता परिवर्तन होते ही खास किस्म की विचारधारा वाले बुद्धिजीवि अपनी नाक तुड़वा बैठते हैं। ऐसा वो जानकर किया करते हैं ताकि समाज की 'सहानुभूति' जुटा सकें। सहानुभूति जुटाने के मामले में बुद्धिजीवि बेहद 'चतुर' होता है। जहां उसे सरकार के बीच जगह बनाने या साहित्य के बीच पुरस्कार पाने की संभावना नजर आती है, झट्ट से पाला बदलकर गिरगिटनुमा हो जाता है। बुद्धि का इस्तेमाल समाज के लिए कम अपनी 'निजी नाक' को बचाने में अधिक करता है। जब नाक नहीं बचा पाता, तुड़वा लेता है ताकि बेलैंस बनाए रहे।

बुद्धिजीवि के लिए विचाराधारा नाक के बाल जैसी होती है। मन करा बढ़ा लिए, मन कर काट दिए। चूंकि नाक के अंदर के बाल नजर कम आते हैं इसीलिए बुद्धिजीवि भी अपनी विचाराधारा को उसी प्रकार 'मेनटेन' करके रखता है। और एक मैं हूं, जो अपनी नाक के बाल काटता ही नहीं। डर-सा लगा रहता है कि कहीं नाक के बाल काटने के चक्कर में मेरी नाक ही न कट जाए।

सच कहूं तो मुझे टूटे नाक के बुद्धिजीवि बेहद पसंद हैं। उनके साथ संगत करना मुझे अच्छा लगता है। टूटी नाक के बुद्धिजीवि ज्यादा बौद्धिकता भी नहीं झाड़ पाते। क्योंकि ज्यादा बौद्धिकता झाड़ने के चक्कर में ही तो उन्हें अपनी नाक से हाथ धोना पड़ा था। यों भी, ज्यादा बौद्धिक या प्रगतिशील होना न सेहत के वास्ते ठीक होता है न जीवन के। सौ झंझट हैं, बौद्धिक और प्रगतिशील होने के।

टूटी नाक के बुद्धिजीवियों को देखकर मेरा मन भी उनके जैसा होने को करता है। हालांकि मैंने कई दफा कोशिश की बुद्धिजीवि होने-बनने की लेकिन हर बार असफलता ही हाथ आई। अरे, मैंने तो तमाम प्रकार के टोने-टोटके तक कर-करवा कर देख लिए बुद्धिजीवि बनने के किंतु कोई फायदा नहीं। पिछले दिनों एक बड़े ज्योतिषी ने मेरा हाथ देखकर बताया था कि बुद्धिजीवि बनने का योग कम से कम इस जन्म में तो नहीं है मेरा।

खैर, कोई नहीं। मैं भले ही बुद्धिजीवि न हो-बन सका मगर टूटी नाक के बुद्धिजीवियों को देखकर मुझे बेहद संतोष मिलता है। फिर भी, जो बुद्धिजीवि अपनी टूटे नाक देखकर 'अपमानित-सा' महसूस करते हैं, उन्हें समय का साथ चलने की आदत डाल लेनी चाहिए। नहीं तो फिर हर कोई उन्हें टूटी नाक का बुद्धिजीवि कहकर 'चिढ़ता' रहेगा। और वे चिढ़ते...।

सोमवार, 25 अगस्त 2014

मुझे चाहिए भारत रत्न

चित्र साभारः गूगल
कायदे में भारत रत्न मुझे मिलना चाहिए। केवल मैं ही भारत रत्न का 'असली हकदार' हूं। चाहो तो अंतरराष्ट्रीय स्तर सर्वे करवा लो।

दरअसल, भारत रत्न पर मेरी दावेदारी वरिष्ठ लेखक होने के नाते भी बनती है। यों भी, साहित्य और राजनीति के मैदान में वरिष्ठों की खास ठस्का रही है। भारत रत्न तो क्या साहित्य और राजनीति का प्रत्येक वरिष्ठ खुद को किसी न किसी सम्मान-पुरस्कार का विशेष हकदार मानता है। मगर मैं जरा अलग किस्म का वरिष्ठ लेखक हूं। छोटे-छाटे पुरस्कार मैं लेता नहीं। हमेशा हाथ बड़े या ऊंचे पुरस्कार पर ही मारता हूं। उसी के वास्ते लॉबिंग करता हूं। यही वजह है कि साहित्य का हर ऊंचा पुरस्कार मेरे कने है। इस हकीकत को न मैं किसी से छिपाता हूं न शर्माता। मुझे अपनी बेबाकी पर नाज है।

भारत रत्न जैसे पुरस्कार बने ही मेरे लिए हैं। इसे आप मेरी कोरी लफ्फबाजी न समझें- हकीकत यही है। खुद को भारत रत्न दिए जाने का दावा मैं इसीलिए भी करता हूं क्योंकि मेरी गिनती न केवल देश बल्कि संसार के चुनिंदा वरिष्ठ लेखकों में होती है। न केवल भारत बल्कि विदेशों तक में मेरी लिखी किताबों पर निरंतर शोध-संवाद-विवाद-बहस होती रहती है। मुझे खुद ठीक से याद नहीं कि मैं अब तलक कित्ती विदेश यात्राएं कर आया हूं। मेरे परिचय में किताबों से ज्यादा लंबा जिक्र मेरी विदेश यात्राओं का है।

अब यह बात अलहदा है कि मुझ जैसे वरिष्ठ लेखक को मेरे ही मोहल्ले वाले न जाने न पहचानें पर संसार तो जानता-पहचानता है। मेरे लिखे-कहे का 'लोहा' पूरी दुनिया में माना जाता है।

एक लेखन ही नहीं और भी कई प्रकार की 'धांसू उपलब्धियां' भरी पड़ी हैं मेरे खाते में। लेखक होने के साथ-साथ मैं एक 'बेहतरीन पतंगबाज' भी हूं। सिर्फ  पतंगबाजी-पतंगबाजी में ही मेरे कई रिकार्ड, कई पुरस्कार हैं। लेखन से जब भी फुर्सत पाता हूं, पतंगबाजी करता हूं। सही मायनों में मैं 'लेखक-कम-पतंगबाज' हूं।

इत्ती योग्यताओं के बाद कोई 'शुबा' बचता नहीं मुझे भारत रत्न न मिलने का।

फिर भी, सरकार जिनको भारत रत्न देना चाहती है, शौक से दे, पर मेरा ध्यान भी रखे। अगर वे सब भारत रत्न के हकदार हैं तो मैं भी हूं। मुझे भारत रत्न मिलना न केवल लेखकीय बिरादरी बल्कि देश का भी सम्मान होगा।

फिलहाल, इंतजार में हूं कब प्रधानमंत्रीजी मेरे नाम की घोषण- भारत रत्न- के लिए करते हैं। कृपया, आप सब भी दुआ करें।

शनिवार, 23 अगस्त 2014

काश! मैं भैंस होता

चित्र साभारः गूगल
बेशक, आप हंसेंगे मगर यह सच है कि मैं इंसान क्यों हूं, भैंस क्यों नहीं? मुझे अपने इंसान होने पर बेहद 'रंज' होता है। दिन-रात ऊपर वाले को कोसता रहता हूं कि मुझे इंसान क्यों बनाया? मैं इंसान बनने के लायक था ही नहीं। मुझे तो भैंस होना चाहिए था।

भैंस होता तो आज वीआइपी ट्रीटमेंट पा रहा होता। चौबीस घंटे मंत्रीजी के चेलों के संरक्षण में रहता। अच्छे से खिलाई-पिलाई होती। यहां-वहां की टहल के लिए सरकारी गाड़ी (हूटर वाली) मिलती। धोखे से अगर कहीं गुम हो जाता तो पूरा का पूरा सरकारी अमला मेरी खोजा-खाजी में व्यस्त हो जाता। अन्य भैंसों की तरह मेरे भी 'ऐश' होती।

लेकिन अपनी किस्मत को कहां ले जाऊं? इंसान बना बैठा हूं, वो भी दौ कौड़ी का। न मेरी घर में कोई औकात है न बाहर। हर जगह इंसानों की तरह दुत्कार-हड़काया जाता हूं। अपनी तकलीफ लेकर न किसी मंत्री के पास जा सकता हूं न मोहल्ले के सभासद के पास। बस मन मसोस कर जाता हूं कि हाय! मैं इंसान क्यों हूं?

भैंसों के प्रति मेरा प्रेम नया नहीं है। बरसों पुराना है। लेकिन यह तब से और अधिक बढ़ गया है, जब से एक धाकड़ मंत्रीजी की भैंसों के वीआइपी ट्रीटमेंट का पता चला है। मंत्रीजी की भैंसों को जिस मुस्तैदी से ढूंढ़ा या खरीदकर (हूटर वाली) सरकारी गाड़ी में बैठाकर लाया गया, कमाल है। कित्ती उम्दा किस्मत पाई हुई हैं, मंत्रीजी की भैंसें। समूचे समाजवाद का मंत्रीजी की भैंसों के आगे नतमस्तक होना, वाकई बहुत बड़ी बात है प्यारे। कह सकते हैं कि समाजवाद केवल इंसानों के प्रति ही नहीं बल्कि भैंसों के प्रति भी समाजवादी दृष्टि रखता है। इसीलिए समाजवाद में मेरी मंत्रीजी जित्ती ही आस्था है।

हालांकि कहने वाले कह रहे हैं कि भैंसों को वीआइपी ट्रीटमेंट देना न न्यायसंगत है न तर्कसंगत। अब कहने वालो को कौन समझाए कि ये मंत्रीजी भैंसें हैं कि टटपूंजीए की नहीं। जब मंत्रीजी वीआइपी ट्रीटमेंट के हकदार हो सकते हैं तो फिर उनकी भैंसें क्यों नहीं? कहने वालो को शायद मालूम नहीं कि पिछली दफा भैंसों की सुरक्षा में हुई चूक का खामियाजा जिम्मेदारों को संस्पेंड होकर भुगतना पड़ा था। फिर दोबारा चूक क्यों होती भला?

भैंसों के शाही ठाठ को देखकर मेरा बार-बार मन कर रहा है खुद भैंस हो जाने का। दुआ कर रहा हूं, जल्द से जल्द इस शरीर से मुक्त पाकर, भैंसे बन जाऊं। इंसान होकर वीआइपी दरजे का ट्रीटमेंट भले न मिल पाया हो, किंतु भैंस बनकर तो मिल ही जाएगा न।

कहना न होगा कि समजावादी सरकार में भैंसों के अच्छे दिन चल रहे हैं, इस पर किसी को 'एतराज' भला क्यों हो?

मंगलवार, 19 अगस्त 2014

मेरी भी जासूसी कराओ

चित्र साभारः गूगल
मेरी जासूसी होने या करवाने का सुख अभी तलक मुझे नहीं मिला है। जबकि मैं दिल से चाहता हूं कि कोई मेरी जासूसी भी करे। मेरी जासूसी के चर्चे समाज के साथ-साथ मीडिया जगत में भी हों। लेखकिए बिरादरी में मेरी जासूसी को लेकर लंबे-लंबे लेख लिखे जाएं एवं बहस हो। अरे, लेखक हुआ तो क्या हुआ, जासूसी मेरी भी बनती है!

अमूमन, लेखकों की जासूसी पर कोई ध्यान नहीं देता। कहते हैं- लेखक है। भला लेखक कने ऐसा क्या है, जिसकी जासूसी होनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है। जासूसी लेखक की भी बनती है। आज का लेखक पहले वाला लेखक नहीं रहा। अब लेखकों के भी ऊंचे-ऊंचे लोगों से संबंध होते हैं। कौन सा लेखक किस लेखक की 'वाट' लगाने की तैयारी में हैं, किससे जुगाड़ गांठकर क्या लिख व छपवा रहा है, इसका पता जासूसों को होना चाहिए।

मैं तो लेखकों की जासूसी के वास्ते एक अलग ‘लेखकिए जासूसी विभाग‘ बनावाने के पक्ष में हूं। सरकार को इसका संज्ञान लेना चाहिए।

देखिए, नेता और लेखक में कोई ज्यादा फर्क नहीं होता। दोनों ही समाज से जुड़े होते हैं। दोनों ही जनता और पाठक आड़ में अपनी-अपनी 'राजनीति' करते हैं। दोनों के ही अपने-अपने गुट होते हैं। दोनों ही हर वक्त इस तिकड़म में लगे रहते हैं कि किसे उठाना है और किसे गिराना।

गाहे-बगाहे नेताओं की तो जासूसी हो जाती है किंतु लेखकों की नहीं होती। नेताओं की जासूसी होने की खबर फैलते ही सियासत में हंगामा-सा मच जाता है। क्या अखबार, क्या चैनल सब पर नेताजी की जासूसी के बहाने तीखी बहसें होने लगती हैं। पक्ष-विपक्ष आपस में भीड़ जाते हैं। संसद में हल्ला मचता है। कहीं-कहीं पर धरना-प्रदर्शन भी हो जाता है।

बस ऐसा ही सबकुछ लेखकों की जासूसी के बहाने भी होना चाहिए। मिसाल के तौर पर, अगर मेरी जासूसी हो तो उसे 'प्रमुख खबर' बनना चाहिए। मेरे लेखन, मेरे प्रकाशन, मेरे संबंध, मेरे पुरस्कार आदि-इत्यादि के बारे में बकायदा जासूसी होकर लेखकिए समाज को पता चलना चाहिए। संभव हो तो मेरी जासूसी का प्रकरण संसद के भीतर पर उठाना चाहिए। आखिर दुनिया को पता तो लगे कि लेखक की जासूसी का असर नेता से कमतर नहीं होता।

न जाने नेता लोग अपनी जासूसी को 'अपमान का मुद्दा' क्यों बना लेते हैं? जबकि जासूसी एक मस्त विधा है। यों भी, सामान्य इंसान की तो कोई जासूसी करता-करवाता नहीं। जासूसी हमेशा नाम वाले बंदे की ही होती है। जासूसी में नाम आने का मतलब है- 'प्रतिष्ठा में वृद्धि'। क्या समझे...!

मुझे ही देख लीजिए न, मैं तो अपनी जासूसी करवाने के पक्ष में जाने कब से हूं। एक अपनी नहीं प्रत्येक बड़े लेखक की भी। पर कोई करता ही नहीं। अभी तलक मैंने लिखकर नाम कमाया, थोड़ा-बहुत अगर जासूसी के बहाने भी कमा लूंगा तो भला किसका क्या चला जाएगा?

अरे, सरकार तो सरकार आज तलक मेरी जासूसी मेरी पत्नी ने भी कभी नहीं करवाई, इसका भी मुझे बेहद दुख है। कम से कम पत्नी तो मेरी जासूसी करवा ही सकती थी। पता नहीं मेरी पत्नी को मुझ पर इत्ता विश्वास क्यों है? जबकि आजकल की पत्नियां जासूसी मामले में पतियों से ज्यादा सजग होती हैं। पर हाय! मेरी ऐसी किस्मत कहां!

फिर भी, मैं चाहूंगा कि बतौर लेखक मेरी भी जासूसी हो। ताकि मेरा मान लेखकिए बिरादरी के साथ राजनीतिक हलकों में भी बढ़ सके। क्यों प्यारे, है कि नहीं।

नंगा होने के लिए दिमाग चाहिए

चित्र साभारः गूगल
नंगा होने के लिए शरीर से ज्यादा दिमाग की जरूरत होती है। यों नंगा तो हर कोई हर कहीं हो सकता है किंतु दिमाग लगाकर नंगा होने की बात ही कुछ और है। दिमाग लगाकर नंगा होने में 'स्टाइल' झलकता है। आजकल जमाना स्टाइल का है। जिसके कने अपना स्टाइल है, वो ही सबसे अधिक स्मार्ट है।

कहने वाले कह रहे हैं कि फिल्म पीके के पोस्टर में आमिर खान ने नंगा होकर न केवल अपनी छवि बल्कि भारतीय संस्कृति का भी 'अपमान' किया है। यह देश के युवाओं को नग्नत्त्व के रास्ते पर ले जाने की चाल है। दरअसल, ऐसा कहने वाले लोग 'नादान' हैं। वे शरीर से नंगा होने और दिमाग लगाकर नंगा होने के फर्क को जानते-समझते ही नहीं। आमिर खान जैसा परफेक्शनिस्ट अगर पोस्टर में नंगा हुआ है, तो जरूर उसके पीछे कारण रहा होगा। बे-कारण फिल्म लाइन में भला कौन नंगा होता है?

कोई फिल्म की कहानी की मांग के अनुसार नंगा होता है। कोई गाने की मांग के अनुसार नंगा होता है। कोई एकस्पोज करने की खातिर नंगा होता है। कोई जगह बनाने के लिए नंगा होता है। यानी, नंगा होने के पीछे कोई न कोई मतलब जरूर रहता है। कुछ ऐसे भी होते हैं जो बेमतलब नंगे होते हैं। उनके नंगा होने के कारण को केवल वे ही समझ सकते हैं।

बताते हैं, आमिर खान बाजार की नब्ज को पकड़ने के महारथी हैं। उन्हें मालूम है कि बाजार में कौन-सी चीज कैसे बिक या बेची जा सकती हैं। इत्ते सालों से फिल्म लाइन में वे बेचा-बाची ही तो करते आए हैं। मंगल पांडे में मूंछों का स्टाइल बेचा। गजनी में बालों का स्टाइल बेचा। और अब पीके में टेपरिकार्डर का सहारा पाकर नग्नत्त्व को बेचने की जुगाड़ में हैं। यह उनका हिट होने का फार्मूला है।

वैसे यह बात अच्छी है कि हमारे देश में सबकुछ बिककर हिट हो जाता है। इंटरटेनमेंट के नाम पर जब डर्टी पिक्चर बिक कर हिट हो सकती है तो फिर पीके क्या चीज है? बेचने वाले को बस बेचने की कला आनी चाहिए। फिर नंगापन बेचो या कामासूत्रा... कोई फर्क नहीं पड़ता।

अपने दमदार दिमाग के बहाने आमिर खान नग्नत्त्व को चर्चा और बहस में ले आए हैं। इसका पूरा फायदा आगे चलकर उन्हें और उनकी पीके को मिलेगा- तय है। लेकिन हम-आप आमिर खान के बहाने भारतीय संस्कृति की दुहाईयां दे-देकर यों ही आसमान सिर पर उठाए रहेंगे। और वे अपने माल को बेचकर पतली गली से खिसक लेंगे।

तो नग्नत्त्व पर माथे पर लकीरें डालना छोड़कर उसे एन्जॉय कीजिए।

रविवार, 17 अगस्त 2014

संस्मरण-मोड में हिंदी का लेखक

चित्र साभारः गूगल
हिंदी के लेखक को संस्मरण लिखने का बहुत शौक होता है। अपने लेखकिए करियर में चाहे वो कुछ और ढंग का न लिख पाया हो लेकिन संस्मरण बेहद जीन-जान लगाकर लिखता है। गजब यह है, हिंदी का लेखक हर बात-मुलाकात में से संस्मरण की जुगाड़ कर ही लेता है। संस्मरण लेखन का जुनून उस पर इस कदर तारी रहता है कि वो सोते-जागते, नहाते-धोते, चलते-दौड़ते, खाते-पीते संस्मरण-मोड में ही रहता है। ज्यादातर संस्मरण लेखकों के चेहरे भी संस्मरण जैसे ही दिखाई देते हैं।

शायद हिंदी के लेखक को संस्मरण-लेखन सबसे आसान विधा लगती है। इसीलिए जरा-सा उम्रदराज होते ही वो तुरंत संस्मरण-मोड में चला जाता है। फिर संस्मरण पर संस्मरण, संस्मरण पर संस्मरण लिख-लिखकर अपने वक्त के साथ-साथ हमारा वक्त भी खूब खराब करता है। चूंकि हिंदी की ज्यादातर पत्र-पत्रिकाएं संस्मरण विधा की दीवानी रहती हैं, इसलिए उसे छापती भी खूब हैं। कभी-कभी तो संस्मरण लेखक कहानी में ही संस्मरण का तडक़ा लगा देता है। तो कु छ कविता में भी संस्मरण की जुगाड़ बैठा लेते हैं।

अच्छा, संस्मरण लेखक के पास यह सुविधा रहती है कि वो किसी भी बात या व्यक्ति पर संस्मरण लिख सकता है। शब्दों का खजाना उसके कने रहता ही है। बात को विस्तार देने में उसे महारथ हासिल होता है। बस फिर क्या, हो गया संस्मरण तैयार। हिंग लगे न फिटकरी रंग चोखा का चोखा।

संस्मरण जब पत्रिका में छपता है फिर सबमें बंटता भी है। जोर देकर कहा जाता है, पढ़ें जरूर। पढक़र प्रतिक्रिया भी दें किंतु प्रतिक्रिया सकारात्मक होनी चाहिए। नकारात्मक प्रतिक्रिया को संस्मरण लेखक निगल नहीं पाता।

हालांकि एकाध दफा मुझसे भी संस्मरण पढऩे को कहा गया मगर पढ़ न सका। चलो एक-दो पन्ने हो तो पढ़ भी लिए जाएं, अब 15-20 पन्नों के संस्मरण पढऩे का टाइम किसके कने है। एक तो संस्मरण का नाम सुनते ही दिल-दिमाग पर आधा बुढ़ापा पहले ही छा जाता है। कहीं अगर ढंग से बैठकर पढ़ लिया जाए तो जवानी में ही बूढ़े होने का खतरा बना रहता है। फिर यह भी है कि संस्मरण तुम्हारे और पढ़ें हम; क्यों भला? यहां दिमाग पर वैसे ही इत्ता बोझ पड़ा रहता है, ऊपर से संस्मरण का बोझ और डाल लें। न न यह हमसे न होगा प्यारे।

संस्मरण आदि नितांत निजी मसले हैं, इसमें दूसरों को क्यों हिलगाना?

अक्सर देखा है, संस्मरण लिखते वक्त लेखक बेहद भावुक किस्म का हो जाता है। सामने वाले की बुराईयों पर भी अपनी भावनाओं का परदा डाल देता है। कभी-कभी तो लगता है, इत्ता भावनात्मक होकर कहीं अपना दिल ही न निकाल बैठे। संस्मरण लेखन काफी कुछ स्मृति-शेष से मिलता-जुलता मसला है।

इसीलिए प्यारे मेरी तो हर पल कोशिश यही रहती है कि मैं संस्मरण लिखने या पढऩे के चक्कर में न ही पड़ूं। दुनिया में और भी तरह का लेखन है संस्मरण के सिवाय। फिर भी जिन्हें केवल संस्मरण लेखन का ही शौक है, वे अपने शौक को पूरा करें पर दूसरों पर पढऩे का दबाव न डालें। एक दफा जो संस्मरण या आत्मकथा के चक्कर में पड़ गया समझिए आधा उम्रदराज तो तब ही हो जाएगा।

पता नहीं अंगरेजी लेखन में संस्मरण लेखक का क्या हाल रहता है? पर हां इत्ता अवश्य कह सकता हूं, अंगरेजी का लेखक हिंदी के लेखक की तरह इत्ती जल्दी संस्मरण-मोड में तो नहीं ही जाता होगा! उसके संस्मरण कम से कम हिंदी के लेखक से तो काफी जवान होते होंगे।

अब हिंदी के लेखक की मजबूरी यह है कि उसे अपने पूर्वजों की पुरातन परंपराओं-स्थापनाओं को ढोना है, तो ढो रहा है, कभी संस्मरण लेखन के माध्यम से तो कभी समीक्षा-आलोचना-आत्मकथा के। हिंदी के लेखक और लेखन की यही कहानी है।

सोमवार, 11 अगस्त 2014

आमिर खान का नग्नत्त्व

चित्र साभारः गूगल
यों तो मेरे मोहल्ले में जित्ते प्रशंसक सलमान खान के हैं, उत्ते ही आमिर खान के भी। मोहल्ले वालो से दोनों खानों की शायद ही कोई फिल्म छूटी हो जिसे उन्होंने न देखा हो। किस फिल्म में किस खान ने क्या कहा, क्या एक्शन दिखाया, कौन-सा गाना गाया और किस हीरोइन के संग रोमांस किया, उन्हें सब मालूम रहता है। यहां तक कि दोनों खानों की जन्मतिथियां भी उन्हें रट हुई हैं, अपनी भले ही याद न रह पाती हों।

अभी पिछले दिनों तक सलमान के प्रशंसक अपने गॉगिल को कॉलर के पीछे लटकाए हर वक्त एक्शन के मूड में रहते थे। और आमिर खान के प्रशंसक बहुत दिनों तक गजनी स्टाइल में चांद घुटवाकर। कुछ ने अपने हाथ और पेट पर किस्म-किस्म के टैटू भी गुदवा लिए थे। मोहल्ले के सियाने बुर्जुग लौंडो के हीरोपंती स्टाइल पर अक्सर बिगड़ते रहते हैं। और शिकायतें कोतवाली तक भी पहुंच जाया करती हैं।

अभी तलक अपनी आदत से न लौंडे बाज आए हैं न सियाने बुर्जुग।

इधर, चार-पांच दिनों से मेरे मोहल्ले के आमिर खान प्रशंसक लौंडो ने एक नया स्टाइल धारण किया है। यह स्टाइल आमिर खान के हालिया रिलीज हुए पोस्टर (फिल्म पीके) जैसा है। जिस लौंडे को देखो वो बिन सोचे-समझे नंगा होकर हाथ में पुराना रेडियो या टेपरिकार्डर थामे रेल की पटरी पर जाकर खड़ा हो जाता है। अब तलक पांच सात लौंडे तो मेरे ही घर आ चुके हैं, पुराना रेडियो या टेपरिकार्डर मांगने। दो ही बचे थे, सो दे दिए।

गजब यह है कि हर लौंडा अपना नंगा (रेडियो या टेपरिकार्डर के साथ) फोटू खींचवाकर फेसबुक या ट्विटर पर चिपका रहा है। यकायक आस-पड़ोस के मोहल्लों की दुकानों में पुराने रेडियो और टेपरिकार्डर की मांग बहुत बढ़ गई है। लोगों ने तो ब्लैक तक करना शुरू कर दिया है।

मोहल्ले के संत-महात्मा व बड़े-बूढ़े आमिर खान स्टाइल इस नंगई को देखकर बेहद खफा हैं। कह रहे हैं- आमिर खान ने बीच पटरी नंगे खड़े होकर लौंडो को नंगा होना सिखा दिया है। समाज में अपसंस्कृति और अश्लीलता फैल रही है। सामाजिक एवं सांस्कृति ताना-बाना नष्ट हो रहा है। लेकिन दीवानगी में डूबे नंगे लौंडो को अब कौन समझाए? हर कोई एक दूसरे से बेहतर नंगा होकर दिखाने की जुगत में लगा हुआ है।

देने वाले तर्क दे रहे हैं कि यह आमिर खान का अपना प्रॉफेशनिलिस्ट स्टाइल है। सुर्खियां पाने का फंडा है। आमिर खान ने इस पोस्टर के बहाने बताया है कि नंगई को भी बेचा जा सकता है। आखिर वे फिल्मकार (अभिनेता) हैं, कुछ भी कर सकते हैं।

किंतु मेरी चिंता आमिर खान का पटरी पर यों नंगे खड़ा होना नहीं है। मेरा तो सवाल बस इत्ता-सा है, कल को अगर पूनम पांडे, सनी लियोनी, शर्लिन चोपड़ा आदि इस स्टाइल में आकर अगर पटरी पर खड़ी होती हैं, तो समाज क्या प्रतिक्रिया देगा? और मेरे मोहल्ले के लौंडे उन्हें किस निगाह से देखेंगे?

गंजों के पक्ष में

चित्र साभारः गूगल
हालांकि मैं स्वयं गंजा नहीं हूं मगर गंजों के प्रति दिल में 'बेहद सम्मान' रखता हूं। गंजों को मैं इस धरती का सबसे 'चिकना समझदार' मानता हूं। गंजे गंजा होने के बावजूद वो सब समझ लेते हैं, जिनको अच्छा से अच्छा बाल वाला भी नहीं समझ पाता। सिर पर बाल होने के कारण भले ही बाल वाले खुद को हीरो मानें किंतु गंजों से बेहतर कतई नहीं हो सकते।

मुझे इस बात का फकर है कि मेरे मोहल्ले में सबसे अधिक गंजे हैं। और, हर गंजा एक से बढ़कर एक है। गंजा होने के नाते भले ही वे दूसरों की मजाक का कारण बनते हों मगर बुरा कभी नहीं मानते। हमेशा हंसते रहते हैं। और कहते हैं- गंजे बाल वालो से ज्यादा भले होते हैं। गंजे सीधा दिमाग से सोचते हैं और बाल वाले बाल के साथ दिमाग से।

मेरे मोहल्ले के गंजे पढ़ते-लिखते बहुत हैं। हालांकि उनमें से न कोई लेखक है न साहित्यकार मगर मेरा दावा है वे अपनी 'चिकनी खोपड़ी' के बल पर बड़े से बड़े लेखक-साहित्यकार को खुल्ली मात दे सकते हैं।

गंजे अपनी प्रगतिशीलता का कथित प्रगतिशीलों की तरह प्रदर्शन नहीं करते। गंजे जित्ता अपनी चिकनी खोपड़ी से प्रगतिशील होते हैं, उत्ता व्यवहार में भी। मैंने ऐसे बहुत ही कम गंजे देखे हैं जिनके मुंह पर मायूसी या माथे पर किस्म-किस्म के बल पड़े रहते हों।

गंजे बेहद बलशाली होते हैं, ठीक शेट्टी जैसे। अव्वल तो किसी से बैर रखते नहीं लेकिन जब रखते हैं तो अपने स्टैंड पर कायम रहते हैं। गंजों को न कोई हड़का सकता है न धमका।

गंजा होने का सबसे बड़ा सुख बालों की केयर से पूर्ण-मुक्ति भी है। सिर पर बाल का होना किसी बवाल-ए-जान से कम नहीं होता। इंसान जित्ती फिकर अपनी सेहत की नहीं करता, उससे ज्यादा बालों की करता है। दो-चार बाल झड़े नहीं कि चिंता में डूब जाता है। तरह-तरह के तेल-क्रीम-शैंपू इस्तेमाल करता रहता है। लेकिन प्यारे बाल तो बाल हैं; न किसी के रोके रुके हैं न किसी के टोके टूटे। जिसे गंजा होना है, वो तो होकर ही रहेगा, चाहे कुछ कर लो।

गंजे गंजा होने की चिंता से दूर आराम की जिंदगी जीते हैं। उन्हें मालूम है कि अब बाल नहीं आने हैं तो नहीं ही आने हैं। फिर काहे का गम? गंजा होने से खरचा भी कित्ता बचता है। न कंधे का रगड़ा, न तेल का झंझट, न नाई की गुलामी। अपनी खोपड़ी, अपना राज।

मोहल्ले के गंजों को देखते हुए सोच रहा हूं- मैं भी गंजा हो जाऊं। गंजा होने के सुख को गंजों के साथ, उनके बीच रहकर, जीऊं। दिमाग के भीतर जो जरा-बहुत किंतु-परंतु बचे रह गए हैं, उन्हें चिकनी खोपड़ी करवा कर चिकना बना लूं। इस बहाने बे-फालतू की वैचारिकता से बच जाऊंगा।

गंजों और गंजा होने के प्रति मेरी 'पक्षधरता' एकदम 'पारदर्शी' है। कृपया, रत्ती भर शक न करें।

रविवार, 10 अगस्त 2014

टमाटर पर 'लाल' सियासत

चित्र साभारः गूगल
प्याज पर छिड़ी सियासत की जंग का नजारा हम कई दफा देख-सुन चुके हैं। सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या अब भाजपा की हो प्याज ने बहुत ऊंचे-ऊंचे खेल खेले हैं। लेकिन इधर बाजी थोड़ा पलटी है। सियासत के केंद्र में अब टमाटर आ गया है। टमाटर पर लालम-लाल बहस जारी है। टमाटर ने न केवल सियासतदानों बल्कि अपने खाने वालो को भी लाल किया हुआ है। संसद के भीतर-बाहर नेता-सांसद कह रहे हैं- टमाटर महंगा होकर बहुत दुख दे रहा है। और, टमाटर खाने वाले कह रहे हैं- टमाटर हमारी सब्जी की जरूरत है।

सरकार अजीब से हालात में है कि करे तो क्या करे? चुनावी नारों और साभाओं में वायदा तो किया था अच्छे दिन लाने का लेकिन बीच-बीच में बुरे दिन लफड़ा किए हुए हैं। कभी प्याज रूलाता है, कभी आलू बे-दम कर जाता है, कभी पेट्रोल आग भड़काता है तो अब टमाटर ने लाल आंखें दिखा रखी हैं। ऊपर से निरंतर बढ़ती महंगाई और जमाखोरों का दबदबा सरकार के अच्छे दिन पर भारी पड़ते जा रहे हैं। दबी-खुली जुबान में अब लोग सरकार से पूछने भी लगे हैं- कहां हैं अच्छे वाले दिन? अभी कित्ता और इंतजार करें?

खैर, सरकार और सियासत के बीच मसला चाहे जो-जैसा भी हो किंतु मैं टमाटर के महंगा होने के पक्ष में हूं। निश्चित ही टमाटर को महंगा होना चाहिए। प्यारे, जब प्याज-आलू-दाल-दूध महंगे हो सकते हैं तो टमाटर के लाल (महंगा) होने में क्या हर्ज है? आखिर टमाटर को भी मौका मिलना चाहिए अपने दम पर सियासत में हलचल मचाने और अपने खाने वालो को महंगे में लाल करने का।

एक दफे को बंदा सब्जी में बिन प्याज खाए रह सकता है परंतु बिन टमाटर नहीं। सब्जी में जब तलक टमाटर की लाली न हो, मजा ही नहीं आता प्यारे। सलाद में टमाटर। पेट में कीड़े हों तो टमाटर। गालों की लाली बरकरार रखने को टमाटर। यहां तक कि टमाटर का उपयोग 'तारीफ' करने में भी किया जाता है। अब इत्ती खुबियों वाला टमाटर अगर कुछ महंगा हो भी गया तो क्या गलत हुआ? जैसे सबके आए टमाटर के भी अच्छे दिन आने चाहिए न।

कहने वाले खीझ में कह रहे हैं कि होने दो महंगा ससुरे को हम खाना ही बंद कर देंगे। थोड़े दिन बाद खुद-ब-खुद लाइन पर आ जाएगा। अमां, तो तुरंत से पहले बंद कर दीजिए न खाना। किनने मना किया है? न कभी टमाटर ने कहा होगा कि आओ मुझे खाओ। खाकर सेहत 'लाल' बनाओ।

यों भी, टमाटर के महंगा होने में एक अकेले गलती उसी की थोड़े है, सियासत से लेकर मौसम तक, हर कोई थोड़ा-बहुत जिम्मेवार है। अभी यह खबर भी पढ़ी कि भारत से काफी मात्रा में टमाटर पाकिस्तान भेजा जाएगा। पाकियों को भारत (खासकर, नासिक) का टमाटर बहुत पसंद है। अब आप ही बताइए कि कैसे न हो टमाटर की कीमतें लाल? अमां, टमाटर की जगह टिंडा, भसीड़ा, तुरई, परवल आदि भेज दो। टमाटर भेजकर क्यों आम आदमी की जेबें लाल किए हुए हो?

मेरे मोहल्ले में हालत यह है कि एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी को टमाटर नहीं दे रहा। बहुत से तो बाहर से ही कह देते हैं कि हम टमाटर खाते ही नहीं! मोहल्ले के सियाने तो पहले ही टमाटर का स्टॉक घर में भर चुके हैं। तिजोरियों में से रुपया-पैसा निकालकर उसमें टमाटर रख लिया है। पहले तो एक-दूसरे को अपने घर खाने पर बुला भी लिया करते थे मगर अब पूरी तरह से बंद है। कहीं टमाटर की पोल न खुल जाए।

अभी हाल एक बैंक का विज्ञापन देखा, जिसमें लिखा था- उनके यहां टमाटर के तईं लॉकर्स की सुविधा दी जा रही है। कमाल है, प्याज-आलू-टमाटर का स्टेटस इत्ता बड़ा हो जाएगा, कभी सपने में भी नहीं सोचा था! अब तो सोना-चांदी भी टमाटर के आगे बेमानी से लगने लगे हैं।

बढ़ी कीमत और सियासत के बीच ट्रैक पर दौड़ते टमाटर को पकड़ पाना सरकार तो क्या आम आदमी के लिए भी मुश्किल-सा लग रहा है। तो प्यारे समझदारी इसी में है कि टमाटर की लाली पर ज्यादा मोहित न हो, अपनी जीभ को काबू में रखो, अभी टमाटर के अच्छे दिन चल रहे हैं। अच्छे दिन में कौन क्या से क्या हो-बन जाता है शायद 'अब' बताने की जरूरत नहीं।

फिलहाल, यह समय टमाटर का है सिर्फ टमाटर का।

बुधवार, 6 अगस्त 2014

मैं भी लिखूंगा किताब!

चित्र साभारः गूगल
मैं अपनी किताब न लिखने की जिद को त्याग रहा हूं। मुझे अब समझ में आ गया है कि मशहूर होने के लिए खुद की किताब का होना बहुत जरूरी है। किताब अगर 'विवादस्पद' हो तो क्या कहना! विवाद से बहस का रास्ता खुलता है। और, बहस से मशहूर होने का चांस हाथ आता है।

साहित्यिक किताब का अब ज्यादा महत्त्व नहीं रहा। किताब अगर राजनीतिक है तो कवरेज पूरी मिलेगी। राजनीतिक होने के साथ-साथ किताब में अगर किसी ऊंची राजनीतिक हस्ती के व्यक्तिगत मसलों का जिक्र है फिर तो शोला भड़कना तय मानिए। शोला भड़काने के लिए लेखक को ज्यादा कुछ करने की आवश्यकता नहीं, इसके लिए मीडिया काफी है। मीडिया में ऐसे मसलों का आना मतलब 'ब्रेकिंग न्यूज' का बनना।

किताब के जरिए अपने व्यक्तित्व की मार्केटिंग कैसी की जाती है, इसे संजय बारू और नटवर सिंह से समझा जा सकता है। दावा है, अपने राजनीतिक जीवन में दोनों ने जित्ता भी नाम कमाया हो, उससे कहीं ज्यादा किताब लिखकर कमा लिया है। दोनों की किताबों के आज हर जगह चर्चो हैं। बहसें हो रही हैं। समीक्षाएं की जा रही हैं। पुराने-धुराने गड़े मुर्दे उघेड़े जा रहे हैं। मीडिया अपने तरीके से किताब के साथ-साथ ज्वलंत मसलों को मसाला लगाकर भुना रहा है। और क्या चाहिए प्यारे? घर बैठे हिट होने का यह तरीका मस्त है।

इसी तर्ज पर मैं भी किताब लिखना चाहता हूं। हालांकि मेरी किताब का राजनीतिक पक्ष उत्ता तगड़ा नहीं होगा, जित्ता नटवर सिंह का रहा। मगर साहित्यिक पक्ष को ही इत्ता तगड़ा बना दूंगा कि राजनीतिक जैसा लगेगा। साहित्य में राजनीति का घाल-मेल बरसों पुराना है। हां, यह बात अलग है कि मंजरे-आम पर उस तरह से आ नहीं पाता, जैसे आना चाहिए। पर कोई नहीं। जो किसी ने नहीं किया, मैं करूंगा।

आजकल जब हर कोई किसी न किसी तिकड़म के साथ मशहूर होने में लगा है तो फिर मैं ही क्यों पीछे रहूं? देखिए न, नटवर सिंह किताब लिखकर मशहूर हो गए। आमिर खान टेपरिकॉर्डर थामे पटरी पर न्यूड खड़े होकर मशहूर हो गए। एक नेताजी मुंह में रोटी ठूंसकर मशहूर हो गए। गोयल साहब बिहारियों को दिल्ली से बाहर भेजे जाने वाला बयान देकर मशहूर हो गए। आदि-आदि। तो फिर मैं भी किताब लिखकर मशहूर हो लेता हूं।

मशहूर या चर्चित होने का सबसे बड़ा फायदा यह मिलता है कि आप पर पहचान का संकट नहीं रहता। जो नहीं जानते, वे भी अच्छे से जान जाते हैं। हलवाई मिठाई कभी अपने लिए नहीं बनाता, मशहूर होने के लिए बनाता है ताकि नाम और पैसा कमा सके।

किताब का खाका मैंने दिमाग में तैयार कर लिया है। बस लिखना बाकी है। लेकिन उससे पहले जरा नटवर सिंहजी का 'आर्शीर्वाद' ले आऊं, क्या पता 'फल' जाए। है कि नहीं...!

सोमवार, 4 अगस्त 2014

चाहता था सलमान खान बनना, बन लेखक गया

चित्र साभारः गूगल
मुझे नहीं मालूम कि मैं लेखक कैसे और क्यों बन गया? लेखक बनने की मैंने कभी सोची भी नहीं थी। मेरा सपना तो सलमान खान जैसा बनने का था। सलमान खान जैसी बॉडी बनाने का था। सलमान खान जैसा हेयर स्टाइल रखने का था। सलमान खान जैसी फैन-फॉलोइंग बनाने का था। सलमान खान की तरह फिल्मों में 'दमदार हीरो' का किरदार निभाने का था।

लेकिन किस्मत को कहां ले जाऊं? किस्मत से ज्यादा भला यहां किसी को कुछ मिला है अब तक? अब चूंकि मेरी किस्मत में ही नहीं था सलमान खान जैसा बनना, सो न बन सका। महज लेखक बनकर ही रह गया। और, वो भी हिंदी का। अंगरेजी में हाथ जरा तंग था, इसलिए बात बनी नहीं। नहीं तो आज मैं भी अंगरेजी का दूसरा चेतन भगत होता! हाय! मेरी किस्मत यहां भी गच्चा दे गई।

भले ही, मैं सलमान खान न बन सका पर सलमान के प्रति दिल में अथाह इज्जत और प्यार रखता हूं। दिन का शायद ही कोई ऐसा घंटा जाता हो, जब मैं सलमान को याद न करता हूं। सलमान की फिल्म न देखता हूं। सच बताऊं, सलमान की फिल्म में मैं सलमान से ज्यादा उसकी बॉडी को देखता हूं। सलमान की बॉडी को देखकर मुझे 'एनर्जी' मिलती है। इत्ती उम्र में भी सलमान अपनी बॉडी को मेनटेन किए हुए है, यह वाकई बड़ी बात है। वरना, इत्ता ध्यान कौन रखता है?

अभी हाल जब से सलमान की किक देखी है, उसके प्रति मोह और बढ़ गया है। सलमान ने यह साबित कर दिया है कि मात्र किक के दम पर भी करोड़ों की कमाई की जा सकती है। सलमान की किक स्थापित तुर्रमखांओं की किकों को तोड़ने में सफल हुई। और, एक मैं हूं जो मात्र लेखन के दम पर कमाई करने की सोचता हूं लेकिन होती नहीं। यों भी, हिंदी का लेखक लेखन से कमाई के मामले में पीछे ही रहता है।

अब कहने को लोग कहते हैं कि सलमान को किस बात की चिंता? फिल्मों से करोड़ों की कमाई हो रही है। शादी की नहीं है, जो जिम्मेदारी को समझे। अकेले हो तो कुछ भी करो। कैसे भी रहो, कौन है रोकने-टोकने वाला। तब ही तो सलमान बॉडी में इत्ता फिट है। जो हो पर यह सब भी हवा में मैनेज नहीं हो जाता। इसके लिए हुनर चाहिए जो सलमान में है।

यह सलमान की जिंदादिली ही है, जो इत्ते विवादों-मुकदमों के बीच भी खुद को मेनटेन किए हुए है। खुशमिजाजी में भी सलमान का कोई जवाब नहीं। रही बात सलमान के गुस्से की तो इस मुकाम पर पहुंचकर गुस्सा किसी को भी आ सकता है। टेक इट इजी प्यारे।

फिलहाल, इस जन्म में तो कोई चांस मिलता दिखता नहीं सलमान खान जैसा होने-बनने का मगर अगले जन्म में मेरी कोशिश पूरी रहेगी कि मैं सलमान खान ही बनूं। क्योंकि जो बात सलमान खान में है, वो किसी में नहीं।