मंगलवार, 8 जुलाई 2014

बजट की धुकधुकी

चित्र साभारः गूगल
इस दफा मन में आम बजट को लेकर धुकधुकी सी अधिक है। न जाने कैसा बजट होगा? क्या सस्ता और क्या महंगा होगा? इएमआइ का बोझ घटेगा कि बढ़ेगा? आयकर में कित्ती छूट मिलेगी, कित्ती नहीं? सेंसेक्स का मूड खराब रहेगा कि अच्छा? इसी तरह के तमाम सवाल दिमाग में हर समय उथल-पुथल सी मचाए रहते हैं।

हालांकि यह सरकार अच्छे दिन का वायदा करके ही सत्ता में आई है मगर आते ही महंगाई के बुरे दिन भी दिखला दिए हैं। अच्छे दिन पर बुरे दिन (महंगाई) भारी पड़ने लगे हैं। आम बजट के आने से पहले ही आम जनता की जेबों का कचूमर निकलने लगा है। तेल-गैस के साथ-साथ आलू-प्याज ने भी आम जनता की दुश्वारियां बढ़ा दी हैं। इसीलिए तो मन और भी बेचैन है कि आम बजट अभी कित्ता और बोझ लादेगा?

वैसे वित्त मंत्रीजी ने आम बजट की शुरूआत मीठे (हलुवए) के प्रतीकात्मक रूप में की है। साथ ही, उम्मीद भी जतलाई है कि आम बजट अच्छे दिन लाने का एक प्रभाव विस्तार होगा। किंतु मन में भारी संशय है कि आम बजट और अच्छे दिन के बहाने कहीं दिन और भी महंगे न हो जाएं?

यों, महंगे दिन और महंगा समय हम पर कोई खास असर तो नहीं डालता क्योंकि पिछली सरकार ने बहुत हद तक हमें इससे लड़ना-भिड़ना सिखला दिया है। जब भी महंगाई बढ़ती थी, हम कुछ दिन हल्ला काटते थे फिर खामोश होकर बैठ जाते थे। क्योंकि हमें मालूम था कि हम बहुत एडजेस्टवेल प्रवृति के इंसान हैं, महंगाई और सरकार को निभा लेंगे। देखिए, दस साल तलक निभाया। बजट चाहे कैसा भी आया, आम जनता होने के नाते बोझ हमने ही उठाया।

चूंकि अब परिदृश्य थोड़ा बदला जरूर है लेकिन असर पिछला ही बरकरार है। अच्छे दिन पर अब तलक हल्ला ही हल्ला मचा है पर चल अभी भी बुरे दिन ही रहे हैं। मगर कोई नहीं, सरकार ने वायदा किया है, अच्छे दिन लाने का तो लाएगी। अब यह बजट से आते हैं या सिर्फ बातों से; देखना बाकी है।
 
फिर भी, उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए आम बजट के बहाने अच्छे दिन की। अगर बजट में कुछ महंगा हो भी जाता है, तो यह समझकर स्वीकार कर लीजिएगा कि यह अच्छे दिन वाला अच्छा बजट है। भले ही असर में महंगा साबित हो। जब इत्ते-इत्ते महंगे बजट देख-झेल लिए फिर यह क्या चीज है?

बहरहाल, बजट से पहले बनी धुकधुकी एक सामान्य प्रक्रिया के तहत है। अक्सर ऐसा ही होता है, जब हमें कई तरह की आर्थिक चीजें बजट के रूप में मिलने वाली होती हैं। तो टेक इज इजी प्यारे

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