सोमवार, 7 जुलाई 2014

जमाखोरों के पक्ष में

चित्र साभारः गूगल
हालांकि मैं जमाखोर तो नहीं मगर जमाखोरों के प्रति मन में 'सम्मान का भाव' रखता हूं! जमाखोरों की दूरदर्शिता का कायल हूं। जमाखोरों ने अपनी मेहनत के दम पर जमाखोरी को उस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया कि अब सरकार भी उनसे घबराने लगी है। जमाखोर सरकार की निगाह में न केवल देश बल्कि जनता के भी 'खलनायक' हैं। जमाखोर सरकार के साथ-साथ जनता का बजट भी गड़बड़ा देते हैं। जमाखोरी करते जमाखोर हैं और सुननी सरकार को पड़ती है।

इधर सरकार अब जमाखोरों के खिलाफ 'सख्ती' के मूड में है। जमाखोरी को कानूनन अपराध और जमाखोरों को अपराधी बनाना चाहती है। जमाखोरों के खिलाफ एकदम इत्ती सख्ती, हजम नहीं हो पा रही प्यारे। बेचारे जमाखोरों का कसूर ही क्या है? कौन सी जमाखोरी वे अपने हित के लिए करते हैं? पानी जब सिर से ऊपर गुजरने को होता है, तब ही तो वे जमाखोरी के मैदान में कूदते हैं। वरना, तो जमाखोर अपनी ढपली, अपना राग बजाने में ही मस्त रहते हैं।

सरकार दरअसल महंगाई को काबू में करने के लिए जमाखोरों पर जुलम करना चाहती है। जबकि महंगाई का जमाखोरों या जमाखोरी से दूर-दूर तक का कोई लेना-देना नहीं! महंगाई को बढ़ना-घटाना तो सरकार और मंत्रियों का काम है। सरकार का घाटा पूरा नहीं हो पाता तो सरकार महंगाई बढ़ा देती है। या फिर अंतरराष्ट्रीय मामलों या मुद्दों का हवाला देकर महंगाई को जनता पर थोप देती है।

अब देखिए न, संकट इराक पर आया हुआ है, तेल के दाम अपने यहां बढ़ रहे हैं। दगा मानसून दे रहा है, कीमत जनता से वसूली जा रही है। दाम सब्जियों के चढ़ रहे हैं, सरकार कह रही है, ऐसा जमाखोरों की वजह से हो रहा है। भला इसमें जमाखोर क्या करें? जमाखोर न इराक संकट लाए हैं, न मानसून को रोके हुए हैं और न ही सब्जियों की कालाबाजारी कर रहे हैं। फिर भला जमाखोर दोषी कैसे हुए?

आलू-प्याज की कीमतें बढ़ने में जमाखोरों का हाथ थोड़े ही है। इस दफा आलू-प्याज जनता ने ज्यादा खा लिया होगा, बचा होगा नहीं, इसीलिए दाम चढ़ गए हैं। महंगाई केवल जमाखोरी की वजह से नहीं जनता के ज्यादा खाने से भी बढ़ा करती है। और, महंगाई का सबसे अधिक रोना वही लोग रोते हैं, जिनकी तोंद हद से बाहर होती है। जनता अपने खाने पर तो कंट्रोल करती नहीं और दोष खामखां जमाखोरों को दिया जाता है। यह भेद-भाव ठीक नहीं।

साफ-सीधी सी बात है। जब पिछली सरकार महंगाई की नाक में नकेल नहीं कस पाई तो नई सरकार क्या कर लेगी? वायदा भले ही किया हो अच्छे दिन लाने का मगर महंगाई पर यह लागू नहीं होता। महंगाई का तो काम ही है बढ़ना और वह बढ़कर रहेगी। सरकार भले ही आलू-प्याज को आवश्यक वस्तु घोषित कर दे पर महंगाई के बचकर कहां जा पाएंगे? ऐसे में तो जनता को पहल करनी चाहिए- आलू-प्याज न खाने की। जमाखोरों पर पाबंदी लगाने से क्या हासिल?

आखिर जमाखोर भी इस देश और लोकतंत्र का एक हिस्सा हैं। वे अगर शांत रहते हैं तो इसका यह मतलब नहीं कि सरकार उनका उत्पीड़न करे। जमाखोर अमूमन बेहद शांतिप्रिय किस्म के इंसान होते हैं। बेहद शांति के साथ अपनी जमाखोरियों को अंजाम देते हैं। चूंकि घर-परिवार उनका भी है, इसीलिए उन्हें भी हक है बाजार और जनता से दो पैसे कमाने का। सरकार इस तरह से बेचारे जमाखोरों के पेट पर लात नहीं मार सकती।

मैं फिर कहता हूं, महंगाई बढ़ने में जमाखोर नहीं सरकार की नीतियां जिम्मेदार होती हैं। सरकार जनता के साथ-साथ जमाखोरों की भावनाओं को भी समझने का प्रयास करे।

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