गुरुवार, 10 जुलाई 2014

उच्च भारतीय संस्कृति की खातिर

चित्र साभारः गूगल
मैंने न केवल पत्नी बल्कि मोहल्ले वालो को भी कह दिया है कि अब मुझसे सेक्स पर कभी कोई बात न करे। न ही सेक्स एजुकेशन के फायदे गिनाए न कं डोम के। क्योंकि ये दोनों ही चीजें 'खुली अश्लीलता' परोसती हैं! दोनों ही हमारी 'समृद्ध भारतीय संस्कृति' के खिलाफ हैं! इसीलिए बेहतर हो, मुझसे केवल फल-फू ल-पेड़-पत्ते-धर्म-देवता-गंगा-पर्यावरण आदि के बारे में ही बातचीत की जाए।

न न इन सब पर किसी तरह का कोई 'प्रगतिशील तर्क' पेश न करें। प्रगतिशील तर्कों की हकीकत मैं अच्छे से जानता-समझता हूं। इन प्रगतिशील तर्कों ने ही हमारे देश की समृद्ध सांस्कृ तिक परंपरा का 'कबाड़ा' कर रखा है। बताइए, सेक्स जैसी 'निहायत व्यक्तिगत' चीज को भी सरेआम करके प्रगतिशील लोग तरह-तरह के तर्क पेश करते हैं। सेक्स एजुकेशन को 'मानसिक विकास' के वास्ते 'जरूरी' बताते हैं। कंडोम को हर वक्त पास रखने की सलाह हैं। भला ऐसा भी कहीं होता है!

कान खोलकर सुन लीजिए, सेक्स या सेक्स एजुकेशन या कं डोम हमारी सुसंस्कृ त भारतीय सनातनी व्यवस्था का हिस्सा नहीं। ये सब पश्चिम से परोसी गईं अश्लील चीजें हैं। उत्तर-आधुनिकता की सनक ने ही इन गंदी-भद्दी चीजों को बढ़ावा दिया है। मैं तो कहता हूं, प्रत्येक सनातनी भारतीय को इन सब खराब चीजों और बातों से बचकर रहना चाहिए।

मैं उन मंत्रीजी की बात से सौ फीसद सहमत हूं कि सेक्स ऐजुकेशन ने देश-समाज के बीच अश्लीलता फैलाने का ही काम किया है। अरे, सेक्स ऐजुकेशन भी कोई ऐजुकेशन है प्यारे। बेचारे कच्चे दिमागों को अश्लीलता के रास्तों पर ले जाने की जिद्द है।

सुन-समझ लीजिए, यह सरकार पिछली सरकार की तरह नहीं है। यह एक 'राष्ट्रवादी मूल्यों' की सरकार है। यहां भारतीय संस्कृति-परंपरा का विशेष ख्याल रखा जाता है। इसीलिए कह रहा हूं, अतिरिक्त खुलेपन और बेवजह की प्रगतिशीलता से बचिए।

फिर भी अगर सेक्स या सेक्स ऐजुकेशन पर बात करना जरूरी लगता हो तो मन ही मन में कीजिए। कहीं सरकार या मंत्री महोदय ने सुन लिया तो...।

राष्ट्रवादी सरकार के साथ रहकर भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को पहचानिए। दिन-रात भजन-कीर्तन एवं गुरुओं की चरण-वंदना कीजिए। शाखाओं में जाकर सच्चा देश-प्रेमी बनना सीखिए। सेक्स ऐजुकेशन की अश्लीलताएं सीखने से कुछ नहीं मिलेगा- सिवाय दिमागी-गंदगी के।

दूसरा नेक काम मैंने यह किया है कि अपने दिमाग के साथ-साथ मोबाइल व घर में से समस्त अश्लील किस्म के साहित्य व सामग्री को निकालकर बाहर फेंक दिया है। अब से बल्कि अभी से मैंने प्रयास शुरू कर दिया है, एक सच्चा हिंदुस्तानी बनने का। बस गेरूआ वस्त्र धारण करने की कमी और रह गई है, तो जल्द ही, उसे भी पूरा कर लूंगा। अब मेरा 'दूषित दिमाग' पुन: सुसंस्कृत होने के पथ पर अग्रसर है।

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