गुरुवार, 31 जुलाई 2014

सनकियों के मोहल्ले में

चित्र साभारः गूगल
दरअसल, मेरा मोहल्ला 'सनकियों' से भरा पड़ा है। एक से बढ़कर एक फन्नेखां सनकी मौजूद है मेरे मोहल्ले में। मुझे खुद भी बहुत अच्छा लगता है सनकियों के बीच रहना व उठना-बैठना। सनकियों के कारण ही मेरा मोहल्ला हर समय 'खुशहाल' रहता है। यहां किसी के पास न इधर-उधर की चिंताएं हैं न अपने घर-परिवार, नाते-रिश्तेदार के झगड़े। सारे सनकी अपनी में ही ‘मस्त‘ रहते हैं।

मैं जब मोहल्ले में आया-आया था, खुद को बेहद समझदार समझता था। हर मामले में अपनी समझदारी जतलाता था। मगर मेरी समझदारी का रूतबा, सनकियों के बीच, ज्यादा दिनों तलक कायम न रह सका। धीरे-धीरे कर मैं भी सनकियों के बीच रहकर उनके रंग-ढंग में रंगने लगा। सनकियों के बीच रहकर ही मैं यह जान-समझ पाया कि समझदारी दिखाने या समझदार बने रहने में कोई 'तीसमारखाई' नहीं है। जिंदगी का असली लुत्फ तो सनकी बने रहने में है।

सनकी आदमी कभी अपने दिमाग पर अधिक 'लोड' नहीं लेता। सनक के हिसाब से अपनी चीजें-बातें सेट करता है। जिसे दुनिया के बुद्धिजीवि लोग सनक कहकर दुत्कार देते हैं, सनकी उसी के सहारे अपनी जिंदगी को चलाता है। सनकी के साथ न विचारधारा न झंझट रहता है न वाद की मारा-मारी। सनकी की सनक ही उसकी विचारधारा होती है, उसका वाद भी।

सनकी अपनी सनक का बेहद पक्का होता है। एक दफा जो सनक लग गई फिर उसे कोई डिगा नहीं सकता। सनकियों ने अपनी सनक के दम पर दुनिया में बहुत बड़े-बड़े कारनामों को अंजाम दिया है। पानी का सूत्र खोजने से लेकर सुई बनाने तक में सनकियों का प्रमुख योगदान रहा है। बहुत से सनकियों ने तो लेखन में भी बड़े-बड़े रिकार्ड कायम किए हैं। एक सनकी तो मैं ही हूं, जिसके लेखन की, पत्नी को छोड़कर, दुनिया दीवानी है। पत्नी मुझे सनकी तो मानती है किंतु लेखक मानने से इंकार करती है।

सनकी कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता। वर्तमान में जीता है। भविष्य के तईं ख्याली-पुलाव नहीं पकाता। जादू-टोने और लगाई-बुझाई में सनकी का रत्तीभर विश्वास नहीं होता। अपने दिमाग को वो उत्ता ही खरच करता है, जित्ती जरूरत होती है। सनकी का हमेशा से मानना रहा है- जरूरत से ज्यादा दिमाग केवल सियाने बुद्धिजीवि ही खरच किया करते हैं।

अपने मोहल्ले के सनकियों के बीच रहकर अब मैं पूर्णता सनकी हो चुका हूं। जिसका मुझे फकर है। सनकी होने का सुख बिना सनकी हुए नहीं लिया जा सकता। इसीलिए मेरी कोशिश यही रहती है कि मैं मेरे संपर्क में आए-रहे लोगों एवं मित्रों को ज्यादा से ज्यादा संख्या में सनकी बना सकूं।

हालांकि लोग मेरे सनकीपने का गाहे-बगाहे लोग ‘मजाक‘ उड़ाते जरूर हैं लेकिन मुझे पक्का यकीन है कि एक दिन वो सनक की हकीकत को समझेंगे।

मेरे विचार में, दुनिया के प्रत्येक बंदे-बंदी को सनक की ओर बढ़ना चाहिए। दिमाग में जब सनक बनी रहती है, तब दुनियादारी का बोझ काफी कम लगता है। खुद को बेहद 'हल्का' महसूस होता है। इसीलिए मैं मेरे मोहल्ले के सनकियों का तहे-दिल से शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मुझे सनकी बनाया। चाहे तो एक दफा आप भी बनकर देख लीजिए- 'सनकी'।

1 टिप्पणी:

BLOGPRAHARI ने कहा…

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