सोमवार, 14 जुलाई 2014

वित्तमंत्रीजी के नाम खुली चिट्ठी

चित्र साभारः गूगल
माननीय वित्तमंत्रीजी,

अच्छे दिन की सरकार का पहला आर्थिक बजट पेश करने के लिए बधाई।

यों तो आम बजट में बहुत कुछ होता है किंतु मैं उस पर ही ध्यान ज्यादा देता हूं, जो मेरा मतलब का होता है। बे-मतलब की चीजों-बातों पर मैं दिमाग इसीलिए भी नहीं खपाता क्योंकि मेरे कने इत्ता दिमाग है ही नहीं। जो बात सरलता से दिमाग में बैठ जाए, वही अच्छी।

बहरहाल, आम बजट में आपने बहुत कुछ सस्ता और बहुत कुछ महंगा किया। बहुत कुछ सस्ता करने के वास्ते आपको बधाई और बहुत कुछ महंगा करने के वास्ते आपसे असहमति।

देखिए वित्तमंत्रीजी, मैं बेहद शौक-परस्त जिंदगी जीने का आदी हूं। शौक मेरी जरूरत और स्टेटस सिंबल है। मेरा मानना है, जिंदगी बिना शौक 'बे-रौनक' होती है। यों तो मेरे बहुत लंबे-चौड़े शौक नहीं हैं पर हां पान-मसाले और सिगरेट का मुझे बेइंतहा शौक है। चाहे एक दिन मैं लेखन न करूं तो चलेगा किंतु सिगरेट न पीयूं या मसाला न खाऊं, तो दिल में बेचैनी-सी होने लगती है। लगता है, जैसे बेहद जरूरी काम मुझसे छूटा चला जा रहा है। मुझे पक्का ध्यान है, बचपन में मैं गैर-जरूरी चीजों को बेचकर अपना ये शौक पूरा किया करता था। वाकई, वो भी क्या दिन थे।

मगर आपने तो सिगरेट-पान-मसाला ही महंगा कर दिया। यानी, मेरे जैसे जन्म-जात शौकिनों को जीते-जी अधमरा-सा कर दिया। बताइए, अब हम कहां जाएंगे? किससे अपना दर्द बयां करेंगे? एक तो वैसे ही खोखे वालो पर इत्ता उधार है, ऊपर से अब और बढ़ जाएगा। अब हम बे-फिक्र होकर फिक्र को धुएं में नहीं उड़ा पाएंगे। पहले दिन में डिब्बी पर डिब्बी पी जाया करते थे, मसाले पर मसाले खा जाया करते थे शायद अब यह हमारे तईं कठिन होगा।

सिगरेट-मसाले पर पैसे बढ़ाकर आपने एक तरह से हम पर बहुत जुलम ठहाया है। यह हमको कर्जदार बनाने की पूरी तैयारी है।

मैं अच्छे से जानता हूं, यह सब आपने हेल्थ-मिनिस्ट के बहकावे में आकर और टेलीविजन पर कुछ किस्सों को देखकर ही किया है। लेकिन सच्चाई इससे विपरित है वित्तमंत्रीजी। मेरा मानना है, कोई भी शौक अगर दायरे में रहकर किया जाए तो कभी नुकसान नहीं पहुंचा सकता। शौक जब आदत या बीमारी बन जाती है, फिर तो बाजा बजना निश्चित है। पर दूसरों की आदत का बदला आपने मुझसे क्यों लिया वित्तमंत्रीजी? करे कोई, भरे कोई; यह क्या बात हुई?

आपको अगर महंगा करने का इत्ता ही शौक था तो चीनी-तेल-आटा-दाल-सब्जी कर देते लेकिन सारा भार आपने सिगरेट-मसाले वालो पर ही डाल दिया।

खैर, शौक तो पूरा करना ही है। और करूंगा भी। चाहे कुछ हो जाए। पहले बड़ी पी लिया करता था, अब छोटी पियूंगा। नहीं तो बीड़ी से ही काम चलाऊंगा। मगर शौक जारी रखूंगा। क्योंकि यह मेरे स्टेटस से जुड़ा है।

फिर भी वित्तमंत्रीजी, मैं आपको दोबारा मौका देता हूं, अपने निर्णय पर पुर्नविचार का। जब तेल की बढ़ी कीमतें घट सकती हैं, तो फिर सिगरेट-मसाले की घटाने में क्या जाता है? शौकिनों को बड़ा मुश्किल हो पाता है, अपने शौक पर कंट्रोल कर पाना।

बहरहाल, आपको अभी हम समय दे रहे हैं सोचने-समझने का। नहीं तो दुनिया भर के सिगरेट पियक्कड़ और मसाला चबाऊ इस गैर-जरूरी वृद्धि के खिलाफ देश भर में आंदोलन करेंगे। धरना देंगे। जरूरत पड़ी तो सरकार का घेराव भी करेंगे।

जय सिगरेट। जय पान-मसाला। जय तंबाकू।

1 टिप्पणी:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, हिन्दी पत्रकारिता के आधार - प्रभास जोशी - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !