गुरुवार, 3 जुलाई 2014

मेरा फुटबॉल प्रेम

चित्र साभारः गूगल
किन्हीं संकोचवश मैं अपनी प्रतिभाओं को बाहर नहीं आने देता। वरना, मेरे भीतर किस्म-किस्म की प्रतिभाएं हैं। कुछ प्रतिभाएं तो ऐसी हैं कि खुद मुझको यकीन नहीं होता।

अभी तक मैंने मेरी एक ही प्रतिभा (लेखकीय प्रतिभा) को बाहर आने दिया है। वो भी इसीलिए ताकि दुनिया मुझे कुछ-कुछ पहचान सके। कल को मेरे साथ मेरी पहचान का संकट आड़े न आए। मुझे इस बात की खुशी है कि मैं अपनी पहचान को बरकरार रख पाने में सफल हुआ हूं।

हां तो बात मेरे भीतर छिपी प्रतिभाओं की चल रही थी। आपको बताऊं, लेखन के साथ-साथ मेरे भीतर फुटबॉल की प्रतिभा भी गजब की है। बचपन में मैंने भी खूब फुटबॉल खेली है। पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा मेरा जोर फुटबॉल खेलने पर ही रहता था। एग्जाम में कम नंबर आना मुझे मंजूर था परंतु फुटबॉल के साथ कोई समझौता करना नहीं।

इन दिनों फीफा विश्वकप के बहाने मेरा फुटबॉल प्रेम फिर से जाग्रत हो गया है। दिल कर रहा है, लेखन और नौकरी छोड़कर ब्राजील चला जाऊं, फुटबॉल विश्वकप के जुनून में शामिल होने। मौका लगे तो दो-चार हाथ-पैर मैं भी मैदान में चला सकूं। नेमार को अपना गुरु बना, गोल दागने के कुछ टिप्स भी ले सकूं। फुटबॉल का जुनून मुझ पर नशे की तरह तारी रहे।

कहने को भले ही फुटबॉल हमारा खेल न रहा हो लेकिन प्यारे खेल तो खेल है, उसमें भेद-भाव कैसा? यों तो क्रिकेट भी हमारे देश का खेल नहीं मगर आज हम पर उसका नशा हद से बढ़कर है। वैसे, जो हमारे खेल रहे हैं, उनमें हमने कौन से झंडे गाड़ लिए हैं। हॉकी हो या कुश्ती सब में हम पदक की संभावनाएं ही तलाशते रहते हैं।

खैर, अभी बात केवल फुटबॉल पर। मेरे विचार में, न केवल खिलाड़ियों बल्कि लेखकों-साहित्यकारों को भी फुटबॉल खेलना चाहिए। फुटबॉल खेलने से शरीर और दिमाग चुस्त-दुरुस्त रहता है। हर समय एक ही अवस्था में बैठकर पन्नों को रंग-रंगकर लेखकों ने अपने दिमाग का दही बना लिया है। हर समय वैचारिक और बौद्धिक क्रांतियां भी तो ठीक नहीं प्यारे। लेखकों को अपने दिमाग को आराम देकर, शरीर को चुस्त बनाना चाहिए, फुटबॉल खेलकर।

कित्ता अच्छा लगे- जब भारत से लेखकों-साहित्यकारों की टीम फुटबॉल का विश्वकप खेलने उतरे। दुनिया भर में हमारा नाम हो। लोग कहें- अरे वाह भारत के तो लेखक-साहित्यकार भी फुटबॉल खेलते हैं। हम चाहें जीतें या न जीतें पर हिस्सेदारी तो करें। यही बहुत है।

फिलहाल, अभी यह विश्वकप निपट लेने दीजिए। अगली दफा मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि बतौर लेखक मैं भी फुटबॉल के विश्वकप में भाग ले सकूं। लेखन में जित्ता नाम कमाया है, उससे कहीं ज्यादा फुटबॉल खेलकर कमाऊं। आप लोगों की दुआएं चाहिए बस।

1 टिप्पणी:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को ब्लॉग बुलेटिन की आज कि बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन और ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।