गुरुवार, 31 जुलाई 2014

सनकियों के मोहल्ले में

चित्र साभारः गूगल
दरअसल, मेरा मोहल्ला 'सनकियों' से भरा पड़ा है। एक से बढ़कर एक फन्नेखां सनकी मौजूद है मेरे मोहल्ले में। मुझे खुद भी बहुत अच्छा लगता है सनकियों के बीच रहना व उठना-बैठना। सनकियों के कारण ही मेरा मोहल्ला हर समय 'खुशहाल' रहता है। यहां किसी के पास न इधर-उधर की चिंताएं हैं न अपने घर-परिवार, नाते-रिश्तेदार के झगड़े। सारे सनकी अपनी में ही ‘मस्त‘ रहते हैं।

मैं जब मोहल्ले में आया-आया था, खुद को बेहद समझदार समझता था। हर मामले में अपनी समझदारी जतलाता था। मगर मेरी समझदारी का रूतबा, सनकियों के बीच, ज्यादा दिनों तलक कायम न रह सका। धीरे-धीरे कर मैं भी सनकियों के बीच रहकर उनके रंग-ढंग में रंगने लगा। सनकियों के बीच रहकर ही मैं यह जान-समझ पाया कि समझदारी दिखाने या समझदार बने रहने में कोई 'तीसमारखाई' नहीं है। जिंदगी का असली लुत्फ तो सनकी बने रहने में है।

सनकी आदमी कभी अपने दिमाग पर अधिक 'लोड' नहीं लेता। सनक के हिसाब से अपनी चीजें-बातें सेट करता है। जिसे दुनिया के बुद्धिजीवि लोग सनक कहकर दुत्कार देते हैं, सनकी उसी के सहारे अपनी जिंदगी को चलाता है। सनकी के साथ न विचारधारा न झंझट रहता है न वाद की मारा-मारी। सनकी की सनक ही उसकी विचारधारा होती है, उसका वाद भी।

सनकी अपनी सनक का बेहद पक्का होता है। एक दफा जो सनक लग गई फिर उसे कोई डिगा नहीं सकता। सनकियों ने अपनी सनक के दम पर दुनिया में बहुत बड़े-बड़े कारनामों को अंजाम दिया है। पानी का सूत्र खोजने से लेकर सुई बनाने तक में सनकियों का प्रमुख योगदान रहा है। बहुत से सनकियों ने तो लेखन में भी बड़े-बड़े रिकार्ड कायम किए हैं। एक सनकी तो मैं ही हूं, जिसके लेखन की, पत्नी को छोड़कर, दुनिया दीवानी है। पत्नी मुझे सनकी तो मानती है किंतु लेखक मानने से इंकार करती है।

सनकी कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता। वर्तमान में जीता है। भविष्य के तईं ख्याली-पुलाव नहीं पकाता। जादू-टोने और लगाई-बुझाई में सनकी का रत्तीभर विश्वास नहीं होता। अपने दिमाग को वो उत्ता ही खरच करता है, जित्ती जरूरत होती है। सनकी का हमेशा से मानना रहा है- जरूरत से ज्यादा दिमाग केवल सियाने बुद्धिजीवि ही खरच किया करते हैं।

अपने मोहल्ले के सनकियों के बीच रहकर अब मैं पूर्णता सनकी हो चुका हूं। जिसका मुझे फकर है। सनकी होने का सुख बिना सनकी हुए नहीं लिया जा सकता। इसीलिए मेरी कोशिश यही रहती है कि मैं मेरे संपर्क में आए-रहे लोगों एवं मित्रों को ज्यादा से ज्यादा संख्या में सनकी बना सकूं।

हालांकि लोग मेरे सनकीपने का गाहे-बगाहे लोग ‘मजाक‘ उड़ाते जरूर हैं लेकिन मुझे पक्का यकीन है कि एक दिन वो सनक की हकीकत को समझेंगे।

मेरे विचार में, दुनिया के प्रत्येक बंदे-बंदी को सनक की ओर बढ़ना चाहिए। दिमाग में जब सनक बनी रहती है, तब दुनियादारी का बोझ काफी कम लगता है। खुद को बेहद 'हल्का' महसूस होता है। इसीलिए मैं मेरे मोहल्ले के सनकियों का तहे-दिल से शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मुझे सनकी बनाया। चाहे तो एक दफा आप भी बनकर देख लीजिए- 'सनकी'।

शनिवार, 19 जुलाई 2014

सोशल मीडिया पर गॉसिप

चित्र साभारः गूगल
प्यारे, जमाना 'सोशल मीडिया' का है। हर कोई सोशल मीडिया पर मौजूद है। सोशल मीडिया पर किसी बात या मुद्दे का 'गॉसिप' बन जाना, बहुत ही सहज है। सोशल मीडिया पर कुछ लोग सिर्फ गॉसिप करने के लिए ही तैयार और तैनात रहते हैं। राई को अगर पहाड़ बनाना है, तो सोशल मीडिया पर आएं।

समय आने पर सोशल मीडिया सबकी 'क्लास' लेता है। लेकिन इस क्लास में 'गंभीरता' से परहेज किया जाता है। गंभीरता यहां बरकरार इसलिए भी नहीं रह सकती क्योंकि गॉसिप का तड़का उस पर हावी रहता है। जहां गॉसिप, वहां गंभीरता या वैचारिता का भला क्या काम?

सोशल मीडिया पर गॉसिप का असर देखिए, शायद मारिया शारापोवा ने कभी सपने में सोचा भी न होगा कि उनका सचिन को न जानना, उनके ताईं बवाले-जान बन जाएगा। क्या फेसबुक, क्या टि्वटर पर शारापोवा के कमेंट की वो खिल्ली उड़ी कि वो भी खुद हैरान थीं। सोशल मीडिया पर आने वाला हर दूसरा कमेंट शारापोवा पर केंद्रित रहता था। बात ही बात में गॉसिप के दीवानों ने तो यहां तक लिख दिया कि वे मारिया शारापोवा को ही नहीं जानते।

मारिया शारापोवा पर गॉसिप का बाजार ठंडा पड़ा ही था कि वैदिक-हाफिज की मुलाकात ने इसे फिर से गर्मा दिया। अब सोशल मीडिया पर गॉसिपबाजों की गॉसिपिंग का केंद्र वैदिक-हाफिज बने हुए हैं। फेसबुक और टि्वटर पर वैदिक-हाफिज की मुलाकात को दो बिछड़े भाईयों के मिलन की निगाह से देखा जा रहा है। अखबारों में भले ही इस मुलाकात पर गंभीर खबरें या लेख आ रहे हों लेकिन सोशल मीडिया का माहौल एकदम गॉसिपमय है। गॉसिप भी ऐसी-ऐसी कि वैदिक-हाफिज पढ़ लें तो मन ही मन 'मुस्कुरा' दें।

जो हो पर सोशल मीडिया ने महिलाओं से गॉसिपिंग का एकाधिकार वापस लेकर हर किसी को उपलब्ध करवा दिया है। अब महिलाएं यह नहीं कह सकतीं कि सोशल प्लेटफार्म पर वे ही सबसे अधिक गॉसिप करती हैं। गॉसिपबाजी में अब बच्चे-जवान-बूढ़े सब के सब शामिल हो गए हैं। कहना न होगा, सोशल मीडिया का अस्तित्व ही गॉसिपिंग पर टिका है प्यारे। बिना गॉसिप सोशल मीडिया भला किस काम का!

सही भी है न, हर समय धीर-गंभीर-वैचारिक बातों-मुद्दों से बंधे रहना भी दिमाग को खतरे में डाल सकता है। फिर क्यों न, सोशल मीडिया पर गॉसिपिंग ही कर ली जाए। ताकि दिमाग और मूड रिलेक्स फील करें।

बहरहाल, जिन्हें मारिया शारापोवा, वैदिक-हाजिफ, नील नीतिन मुकेश, अरविंद केजरीवाल, राहुल गांधी आदि पर गंभीर-वैचारिक बहसें करनी हो करें किंतु सोशल मीडिया पर गॉसिपिंग यों ही चलती रहेगी। आखिर गॉसिप ही तो सोशल मीडिया की जान है प्यारे।

सोमवार, 14 जुलाई 2014

वित्तमंत्रीजी के नाम खुली चिट्ठी

चित्र साभारः गूगल
माननीय वित्तमंत्रीजी,

अच्छे दिन की सरकार का पहला आर्थिक बजट पेश करने के लिए बधाई।

यों तो आम बजट में बहुत कुछ होता है किंतु मैं उस पर ही ध्यान ज्यादा देता हूं, जो मेरा मतलब का होता है। बे-मतलब की चीजों-बातों पर मैं दिमाग इसीलिए भी नहीं खपाता क्योंकि मेरे कने इत्ता दिमाग है ही नहीं। जो बात सरलता से दिमाग में बैठ जाए, वही अच्छी।

बहरहाल, आम बजट में आपने बहुत कुछ सस्ता और बहुत कुछ महंगा किया। बहुत कुछ सस्ता करने के वास्ते आपको बधाई और बहुत कुछ महंगा करने के वास्ते आपसे असहमति।

देखिए वित्तमंत्रीजी, मैं बेहद शौक-परस्त जिंदगी जीने का आदी हूं। शौक मेरी जरूरत और स्टेटस सिंबल है। मेरा मानना है, जिंदगी बिना शौक 'बे-रौनक' होती है। यों तो मेरे बहुत लंबे-चौड़े शौक नहीं हैं पर हां पान-मसाले और सिगरेट का मुझे बेइंतहा शौक है। चाहे एक दिन मैं लेखन न करूं तो चलेगा किंतु सिगरेट न पीयूं या मसाला न खाऊं, तो दिल में बेचैनी-सी होने लगती है। लगता है, जैसे बेहद जरूरी काम मुझसे छूटा चला जा रहा है। मुझे पक्का ध्यान है, बचपन में मैं गैर-जरूरी चीजों को बेचकर अपना ये शौक पूरा किया करता था। वाकई, वो भी क्या दिन थे।

मगर आपने तो सिगरेट-पान-मसाला ही महंगा कर दिया। यानी, मेरे जैसे जन्म-जात शौकिनों को जीते-जी अधमरा-सा कर दिया। बताइए, अब हम कहां जाएंगे? किससे अपना दर्द बयां करेंगे? एक तो वैसे ही खोखे वालो पर इत्ता उधार है, ऊपर से अब और बढ़ जाएगा। अब हम बे-फिक्र होकर फिक्र को धुएं में नहीं उड़ा पाएंगे। पहले दिन में डिब्बी पर डिब्बी पी जाया करते थे, मसाले पर मसाले खा जाया करते थे शायद अब यह हमारे तईं कठिन होगा।

सिगरेट-मसाले पर पैसे बढ़ाकर आपने एक तरह से हम पर बहुत जुलम ठहाया है। यह हमको कर्जदार बनाने की पूरी तैयारी है।

मैं अच्छे से जानता हूं, यह सब आपने हेल्थ-मिनिस्ट के बहकावे में आकर और टेलीविजन पर कुछ किस्सों को देखकर ही किया है। लेकिन सच्चाई इससे विपरित है वित्तमंत्रीजी। मेरा मानना है, कोई भी शौक अगर दायरे में रहकर किया जाए तो कभी नुकसान नहीं पहुंचा सकता। शौक जब आदत या बीमारी बन जाती है, फिर तो बाजा बजना निश्चित है। पर दूसरों की आदत का बदला आपने मुझसे क्यों लिया वित्तमंत्रीजी? करे कोई, भरे कोई; यह क्या बात हुई?

आपको अगर महंगा करने का इत्ता ही शौक था तो चीनी-तेल-आटा-दाल-सब्जी कर देते लेकिन सारा भार आपने सिगरेट-मसाले वालो पर ही डाल दिया।

खैर, शौक तो पूरा करना ही है। और करूंगा भी। चाहे कुछ हो जाए। पहले बड़ी पी लिया करता था, अब छोटी पियूंगा। नहीं तो बीड़ी से ही काम चलाऊंगा। मगर शौक जारी रखूंगा। क्योंकि यह मेरे स्टेटस से जुड़ा है।

फिर भी वित्तमंत्रीजी, मैं आपको दोबारा मौका देता हूं, अपने निर्णय पर पुर्नविचार का। जब तेल की बढ़ी कीमतें घट सकती हैं, तो फिर सिगरेट-मसाले की घटाने में क्या जाता है? शौकिनों को बड़ा मुश्किल हो पाता है, अपने शौक पर कंट्रोल कर पाना।

बहरहाल, आपको अभी हम समय दे रहे हैं सोचने-समझने का। नहीं तो दुनिया भर के सिगरेट पियक्कड़ और मसाला चबाऊ इस गैर-जरूरी वृद्धि के खिलाफ देश भर में आंदोलन करेंगे। धरना देंगे। जरूरत पड़ी तो सरकार का घेराव भी करेंगे।

जय सिगरेट। जय पान-मसाला। जय तंबाकू।

गुरुवार, 10 जुलाई 2014

उच्च भारतीय संस्कृति की खातिर

चित्र साभारः गूगल
मैंने न केवल पत्नी बल्कि मोहल्ले वालो को भी कह दिया है कि अब मुझसे सेक्स पर कभी कोई बात न करे। न ही सेक्स एजुकेशन के फायदे गिनाए न कं डोम के। क्योंकि ये दोनों ही चीजें 'खुली अश्लीलता' परोसती हैं! दोनों ही हमारी 'समृद्ध भारतीय संस्कृति' के खिलाफ हैं! इसीलिए बेहतर हो, मुझसे केवल फल-फू ल-पेड़-पत्ते-धर्म-देवता-गंगा-पर्यावरण आदि के बारे में ही बातचीत की जाए।

न न इन सब पर किसी तरह का कोई 'प्रगतिशील तर्क' पेश न करें। प्रगतिशील तर्कों की हकीकत मैं अच्छे से जानता-समझता हूं। इन प्रगतिशील तर्कों ने ही हमारे देश की समृद्ध सांस्कृ तिक परंपरा का 'कबाड़ा' कर रखा है। बताइए, सेक्स जैसी 'निहायत व्यक्तिगत' चीज को भी सरेआम करके प्रगतिशील लोग तरह-तरह के तर्क पेश करते हैं। सेक्स एजुकेशन को 'मानसिक विकास' के वास्ते 'जरूरी' बताते हैं। कंडोम को हर वक्त पास रखने की सलाह हैं। भला ऐसा भी कहीं होता है!

कान खोलकर सुन लीजिए, सेक्स या सेक्स एजुकेशन या कं डोम हमारी सुसंस्कृ त भारतीय सनातनी व्यवस्था का हिस्सा नहीं। ये सब पश्चिम से परोसी गईं अश्लील चीजें हैं। उत्तर-आधुनिकता की सनक ने ही इन गंदी-भद्दी चीजों को बढ़ावा दिया है। मैं तो कहता हूं, प्रत्येक सनातनी भारतीय को इन सब खराब चीजों और बातों से बचकर रहना चाहिए।

मैं उन मंत्रीजी की बात से सौ फीसद सहमत हूं कि सेक्स ऐजुकेशन ने देश-समाज के बीच अश्लीलता फैलाने का ही काम किया है। अरे, सेक्स ऐजुकेशन भी कोई ऐजुकेशन है प्यारे। बेचारे कच्चे दिमागों को अश्लीलता के रास्तों पर ले जाने की जिद्द है।

सुन-समझ लीजिए, यह सरकार पिछली सरकार की तरह नहीं है। यह एक 'राष्ट्रवादी मूल्यों' की सरकार है। यहां भारतीय संस्कृति-परंपरा का विशेष ख्याल रखा जाता है। इसीलिए कह रहा हूं, अतिरिक्त खुलेपन और बेवजह की प्रगतिशीलता से बचिए।

फिर भी अगर सेक्स या सेक्स ऐजुकेशन पर बात करना जरूरी लगता हो तो मन ही मन में कीजिए। कहीं सरकार या मंत्री महोदय ने सुन लिया तो...।

राष्ट्रवादी सरकार के साथ रहकर भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को पहचानिए। दिन-रात भजन-कीर्तन एवं गुरुओं की चरण-वंदना कीजिए। शाखाओं में जाकर सच्चा देश-प्रेमी बनना सीखिए। सेक्स ऐजुकेशन की अश्लीलताएं सीखने से कुछ नहीं मिलेगा- सिवाय दिमागी-गंदगी के।

दूसरा नेक काम मैंने यह किया है कि अपने दिमाग के साथ-साथ मोबाइल व घर में से समस्त अश्लील किस्म के साहित्य व सामग्री को निकालकर बाहर फेंक दिया है। अब से बल्कि अभी से मैंने प्रयास शुरू कर दिया है, एक सच्चा हिंदुस्तानी बनने का। बस गेरूआ वस्त्र धारण करने की कमी और रह गई है, तो जल्द ही, उसे भी पूरा कर लूंगा। अब मेरा 'दूषित दिमाग' पुन: सुसंस्कृत होने के पथ पर अग्रसर है।

रेल बजट बनाम सेंसेक्स

चित्र साभारः गूगल
सेंसेक्स के अच्छे खासे अच्छे दिन चल रहे थे कि रेल बजट ने बीच में आकर काम खराब कर दिया। रेलमंत्री ने बुलेट ट्रेन चलाने की घोषणा क्या करी, सेंसेक्स गश खाकर धड़ाम हो गया। लगता है, सेंसेक्स को न रेल बजट पसंद आया, न बुलेट ट्रेन का इरादा। सेंसेक्स ने एक ही दिन में पांच सौ अंकों का गोता क्या लगाया कि चारों तरफ किस्म-किस्म की अफवाहों का बाजार गर्म होने लगा। सुनने में आया है कि विदेशी निवेशक शेयर बाजार से अपना पैसा निकालने के मूड में हैं! आम बजट के बाद वे ऐसा कर सकते हैं!

चाहे बजट हो या महंगाई या अफवाह सारी मार अंतत: पड़ती सेंसेक्स पर ही है। एक तो वो वैसे ही इत्ता संवेदनशील होता है कि जरा-सी छींक पर सहम जाता है, ऊपर से अफवाह की गर्मी बेचारे को और पिघला देती है। देखिए न, बहाना रेल बजट का बना, नुकसान बेचारे सेंसेक्स को उठाना पड़ा।
ऐसा कम ही होता है, जब रेल बजट पर सेंसेक्स कोई प्रतिक्रिया दे। उसका दारोमदार तो आम बजट पर टिका होता है। लेकिन इस दफा तो कमाल ही हो गया। उधर, रेलमंत्री ने बजट पेश किया, इधर सेंसेक्स आपे से बाहर हो गया। चलिए, प्रतीकात्मक तौर पर थोड़ा-बहुत गिर जाता, बर्दाशत कर लेते, लेकिन एकदम पांच सौ अंक, बहुत होते हैं जनाब।

अब उड़ाने वाले खिल्ली उड़ा रहे हैं कि देखो, अच्छे दिन का सेंसेक्स रेल बजट पर ही धड़ाम हो गया। बुलेट ट्रेन का तोहफा कबूल नहीं कर पाया। अभी रेल बजट पर यह हाल है, तो आम बजट पर क्या होगा? कहने वालो का क्या है, कु छ भी कहते-बोलते रहते हैं। किंतु सेंसेक्स के मन की बात तो केवल सेंसेक्स ही जान सकता है। हम तो केवल अनुमान लगा सकते हैं। सेंसेक्स अगर इत्ता गिरा है, तो कोई न कोई कारण तो रहा ही होगा? सेंसेक्स कोई हर समय भांग तो चढ़ाए रहता नहीं कि जहां-तहां बेसुध होकर लुढक़ जाए।

और फिर इत्ते लंबे से निरंतर नई बुलंदियों को छू रहे सेंसेक्स ने अगर पांच सौ अंक का गोता लगा भी लिया तो कौन-सा पहाड़ टूट गया? या कौन सा सूरज ने दक्षिण से निकलना शुरू कर दिया? छब्बीस हजार का मुकाम हासिन करना कोई छोटी बात नहीं होती प्यारे। अच्छों-अच्छों के टांके ढीले पड़ जाते हैं।

सेंसेक्स ने अगर अब तलक अच्छे दिन दिए हैं, तो एकाध बुरे दिन के लिए भी हमें तैयार रहना चाहिए। हमारा सेंसेक्स बहुत समझदार है। वो अच्छे से जानता है कि उसे कहां गिरना है और कहां चढऩा और कहां सुस्त पड़े रहना।

आम बजट के बाद देखिएगा सेंसेक्स की बुलेट चाल।

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

बजट की धुकधुकी

चित्र साभारः गूगल
इस दफा मन में आम बजट को लेकर धुकधुकी सी अधिक है। न जाने कैसा बजट होगा? क्या सस्ता और क्या महंगा होगा? इएमआइ का बोझ घटेगा कि बढ़ेगा? आयकर में कित्ती छूट मिलेगी, कित्ती नहीं? सेंसेक्स का मूड खराब रहेगा कि अच्छा? इसी तरह के तमाम सवाल दिमाग में हर समय उथल-पुथल सी मचाए रहते हैं।

हालांकि यह सरकार अच्छे दिन का वायदा करके ही सत्ता में आई है मगर आते ही महंगाई के बुरे दिन भी दिखला दिए हैं। अच्छे दिन पर बुरे दिन (महंगाई) भारी पड़ने लगे हैं। आम बजट के आने से पहले ही आम जनता की जेबों का कचूमर निकलने लगा है। तेल-गैस के साथ-साथ आलू-प्याज ने भी आम जनता की दुश्वारियां बढ़ा दी हैं। इसीलिए तो मन और भी बेचैन है कि आम बजट अभी कित्ता और बोझ लादेगा?

वैसे वित्त मंत्रीजी ने आम बजट की शुरूआत मीठे (हलुवए) के प्रतीकात्मक रूप में की है। साथ ही, उम्मीद भी जतलाई है कि आम बजट अच्छे दिन लाने का एक प्रभाव विस्तार होगा। किंतु मन में भारी संशय है कि आम बजट और अच्छे दिन के बहाने कहीं दिन और भी महंगे न हो जाएं?

यों, महंगे दिन और महंगा समय हम पर कोई खास असर तो नहीं डालता क्योंकि पिछली सरकार ने बहुत हद तक हमें इससे लड़ना-भिड़ना सिखला दिया है। जब भी महंगाई बढ़ती थी, हम कुछ दिन हल्ला काटते थे फिर खामोश होकर बैठ जाते थे। क्योंकि हमें मालूम था कि हम बहुत एडजेस्टवेल प्रवृति के इंसान हैं, महंगाई और सरकार को निभा लेंगे। देखिए, दस साल तलक निभाया। बजट चाहे कैसा भी आया, आम जनता होने के नाते बोझ हमने ही उठाया।

चूंकि अब परिदृश्य थोड़ा बदला जरूर है लेकिन असर पिछला ही बरकरार है। अच्छे दिन पर अब तलक हल्ला ही हल्ला मचा है पर चल अभी भी बुरे दिन ही रहे हैं। मगर कोई नहीं, सरकार ने वायदा किया है, अच्छे दिन लाने का तो लाएगी। अब यह बजट से आते हैं या सिर्फ बातों से; देखना बाकी है।
 
फिर भी, उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए आम बजट के बहाने अच्छे दिन की। अगर बजट में कुछ महंगा हो भी जाता है, तो यह समझकर स्वीकार कर लीजिएगा कि यह अच्छे दिन वाला अच्छा बजट है। भले ही असर में महंगा साबित हो। जब इत्ते-इत्ते महंगे बजट देख-झेल लिए फिर यह क्या चीज है?

बहरहाल, बजट से पहले बनी धुकधुकी एक सामान्य प्रक्रिया के तहत है। अक्सर ऐसा ही होता है, जब हमें कई तरह की आर्थिक चीजें बजट के रूप में मिलने वाली होती हैं। तो टेक इज इजी प्यारे

सोमवार, 7 जुलाई 2014

जमाखोरों के पक्ष में

चित्र साभारः गूगल
हालांकि मैं जमाखोर तो नहीं मगर जमाखोरों के प्रति मन में 'सम्मान का भाव' रखता हूं! जमाखोरों की दूरदर्शिता का कायल हूं। जमाखोरों ने अपनी मेहनत के दम पर जमाखोरी को उस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया कि अब सरकार भी उनसे घबराने लगी है। जमाखोर सरकार की निगाह में न केवल देश बल्कि जनता के भी 'खलनायक' हैं। जमाखोर सरकार के साथ-साथ जनता का बजट भी गड़बड़ा देते हैं। जमाखोरी करते जमाखोर हैं और सुननी सरकार को पड़ती है।

इधर सरकार अब जमाखोरों के खिलाफ 'सख्ती' के मूड में है। जमाखोरी को कानूनन अपराध और जमाखोरों को अपराधी बनाना चाहती है। जमाखोरों के खिलाफ एकदम इत्ती सख्ती, हजम नहीं हो पा रही प्यारे। बेचारे जमाखोरों का कसूर ही क्या है? कौन सी जमाखोरी वे अपने हित के लिए करते हैं? पानी जब सिर से ऊपर गुजरने को होता है, तब ही तो वे जमाखोरी के मैदान में कूदते हैं। वरना, तो जमाखोर अपनी ढपली, अपना राग बजाने में ही मस्त रहते हैं।

सरकार दरअसल महंगाई को काबू में करने के लिए जमाखोरों पर जुलम करना चाहती है। जबकि महंगाई का जमाखोरों या जमाखोरी से दूर-दूर तक का कोई लेना-देना नहीं! महंगाई को बढ़ना-घटाना तो सरकार और मंत्रियों का काम है। सरकार का घाटा पूरा नहीं हो पाता तो सरकार महंगाई बढ़ा देती है। या फिर अंतरराष्ट्रीय मामलों या मुद्दों का हवाला देकर महंगाई को जनता पर थोप देती है।

अब देखिए न, संकट इराक पर आया हुआ है, तेल के दाम अपने यहां बढ़ रहे हैं। दगा मानसून दे रहा है, कीमत जनता से वसूली जा रही है। दाम सब्जियों के चढ़ रहे हैं, सरकार कह रही है, ऐसा जमाखोरों की वजह से हो रहा है। भला इसमें जमाखोर क्या करें? जमाखोर न इराक संकट लाए हैं, न मानसून को रोके हुए हैं और न ही सब्जियों की कालाबाजारी कर रहे हैं। फिर भला जमाखोर दोषी कैसे हुए?

आलू-प्याज की कीमतें बढ़ने में जमाखोरों का हाथ थोड़े ही है। इस दफा आलू-प्याज जनता ने ज्यादा खा लिया होगा, बचा होगा नहीं, इसीलिए दाम चढ़ गए हैं। महंगाई केवल जमाखोरी की वजह से नहीं जनता के ज्यादा खाने से भी बढ़ा करती है। और, महंगाई का सबसे अधिक रोना वही लोग रोते हैं, जिनकी तोंद हद से बाहर होती है। जनता अपने खाने पर तो कंट्रोल करती नहीं और दोष खामखां जमाखोरों को दिया जाता है। यह भेद-भाव ठीक नहीं।

साफ-सीधी सी बात है। जब पिछली सरकार महंगाई की नाक में नकेल नहीं कस पाई तो नई सरकार क्या कर लेगी? वायदा भले ही किया हो अच्छे दिन लाने का मगर महंगाई पर यह लागू नहीं होता। महंगाई का तो काम ही है बढ़ना और वह बढ़कर रहेगी। सरकार भले ही आलू-प्याज को आवश्यक वस्तु घोषित कर दे पर महंगाई के बचकर कहां जा पाएंगे? ऐसे में तो जनता को पहल करनी चाहिए- आलू-प्याज न खाने की। जमाखोरों पर पाबंदी लगाने से क्या हासिल?

आखिर जमाखोर भी इस देश और लोकतंत्र का एक हिस्सा हैं। वे अगर शांत रहते हैं तो इसका यह मतलब नहीं कि सरकार उनका उत्पीड़न करे। जमाखोर अमूमन बेहद शांतिप्रिय किस्म के इंसान होते हैं। बेहद शांति के साथ अपनी जमाखोरियों को अंजाम देते हैं। चूंकि घर-परिवार उनका भी है, इसीलिए उन्हें भी हक है बाजार और जनता से दो पैसे कमाने का। सरकार इस तरह से बेचारे जमाखोरों के पेट पर लात नहीं मार सकती।

मैं फिर कहता हूं, महंगाई बढ़ने में जमाखोर नहीं सरकार की नीतियां जिम्मेदार होती हैं। सरकार जनता के साथ-साथ जमाखोरों की भावनाओं को भी समझने का प्रयास करे।

गुरुवार, 3 जुलाई 2014

मेरा फुटबॉल प्रेम

चित्र साभारः गूगल
किन्हीं संकोचवश मैं अपनी प्रतिभाओं को बाहर नहीं आने देता। वरना, मेरे भीतर किस्म-किस्म की प्रतिभाएं हैं। कुछ प्रतिभाएं तो ऐसी हैं कि खुद मुझको यकीन नहीं होता।

अभी तक मैंने मेरी एक ही प्रतिभा (लेखकीय प्रतिभा) को बाहर आने दिया है। वो भी इसीलिए ताकि दुनिया मुझे कुछ-कुछ पहचान सके। कल को मेरे साथ मेरी पहचान का संकट आड़े न आए। मुझे इस बात की खुशी है कि मैं अपनी पहचान को बरकरार रख पाने में सफल हुआ हूं।

हां तो बात मेरे भीतर छिपी प्रतिभाओं की चल रही थी। आपको बताऊं, लेखन के साथ-साथ मेरे भीतर फुटबॉल की प्रतिभा भी गजब की है। बचपन में मैंने भी खूब फुटबॉल खेली है। पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा मेरा जोर फुटबॉल खेलने पर ही रहता था। एग्जाम में कम नंबर आना मुझे मंजूर था परंतु फुटबॉल के साथ कोई समझौता करना नहीं।

इन दिनों फीफा विश्वकप के बहाने मेरा फुटबॉल प्रेम फिर से जाग्रत हो गया है। दिल कर रहा है, लेखन और नौकरी छोड़कर ब्राजील चला जाऊं, फुटबॉल विश्वकप के जुनून में शामिल होने। मौका लगे तो दो-चार हाथ-पैर मैं भी मैदान में चला सकूं। नेमार को अपना गुरु बना, गोल दागने के कुछ टिप्स भी ले सकूं। फुटबॉल का जुनून मुझ पर नशे की तरह तारी रहे।

कहने को भले ही फुटबॉल हमारा खेल न रहा हो लेकिन प्यारे खेल तो खेल है, उसमें भेद-भाव कैसा? यों तो क्रिकेट भी हमारे देश का खेल नहीं मगर आज हम पर उसका नशा हद से बढ़कर है। वैसे, जो हमारे खेल रहे हैं, उनमें हमने कौन से झंडे गाड़ लिए हैं। हॉकी हो या कुश्ती सब में हम पदक की संभावनाएं ही तलाशते रहते हैं।

खैर, अभी बात केवल फुटबॉल पर। मेरे विचार में, न केवल खिलाड़ियों बल्कि लेखकों-साहित्यकारों को भी फुटबॉल खेलना चाहिए। फुटबॉल खेलने से शरीर और दिमाग चुस्त-दुरुस्त रहता है। हर समय एक ही अवस्था में बैठकर पन्नों को रंग-रंगकर लेखकों ने अपने दिमाग का दही बना लिया है। हर समय वैचारिक और बौद्धिक क्रांतियां भी तो ठीक नहीं प्यारे। लेखकों को अपने दिमाग को आराम देकर, शरीर को चुस्त बनाना चाहिए, फुटबॉल खेलकर।

कित्ता अच्छा लगे- जब भारत से लेखकों-साहित्यकारों की टीम फुटबॉल का विश्वकप खेलने उतरे। दुनिया भर में हमारा नाम हो। लोग कहें- अरे वाह भारत के तो लेखक-साहित्यकार भी फुटबॉल खेलते हैं। हम चाहें जीतें या न जीतें पर हिस्सेदारी तो करें। यही बहुत है।

फिलहाल, अभी यह विश्वकप निपट लेने दीजिए। अगली दफा मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि बतौर लेखक मैं भी फुटबॉल के विश्वकप में भाग ले सकूं। लेखन में जित्ता नाम कमाया है, उससे कहीं ज्यादा फुटबॉल खेलकर कमाऊं। आप लोगों की दुआएं चाहिए बस।