सोमवार, 9 जून 2014

सीरियस बनाम जोकर

चित्र साभारः गूगल
मुझे सीरियस होना नहीं आता। हालांकि कई दफा प्रयास किए सीरियस होने के, कई किताबें पढ़ीं सीरियस होने के लिए किंतु नतीजा 'सिफर' ही रहा। मुझे खूब याद है, मैं तब भी सीरियस नहीं हुआ था, जब हाईस्कूल में ही पांच दफा फेल हुआ। केवल एक विषय को छोड़कर बाकी में दस अंक से अधिक नहीं पा सका था। फेल होने पर हर बार पिताजी से पिटाई का प्रसाद मिला करता था। लेकिन मेरी फितरत ही कुछ ऐसी थी कि मैं सीरियस नहीं होता था।

तब से लेकर आज तक मैंने अपनी नॉन-सीरियस फितरत को बरकरार रखा हुआ है। दुनिया चाहे इधर से उधर हो जाए या गर्मी पारे के सारे रिकार्ड तोड़ दे या फिर सोना टूट-टूटकर कांच ही क्यों न बन जाए मगर मैं सीरियस नहीं होऊंगा। सीरियस होने को मैं अपने तईं 'श्राप' मानता हूं। और सीरियस लोगों, सीरियस विचारों, सीरियस खान-पान से कोसों दूरी बनाकर रहता हूं। ताकि सीरियसनेस के कीटाणु मेरे भीतर प्रवेश न कर सकें।
मुझे सीरियस होने से कहीं बेहतर लगता है खुद का 'जोकर' होना। जोकर का काम ही हंसना-हंसाना और मुस्कुराहट की ताजगी बिखेरते रहना है। जोकर न कभी चेहरे-मोहरे में सीरियस होता है न हाव-भाव में। जोकर के साथ न विचारधारा न झंझट रहता है न वाद की बीमारी। जोकर अपनी जोकरपंती के साथ स्वतंत्र होता है।

ठीक यही खूबियां मुझ में हैं। मैं अपनी हंसी-मजाक की आदतों के साथ आजाद हूं। कोई ऊंचा या बड़ा साहित्यकार-लेखक-विचारक नहीं बल्कि जोकर ही मेरी प्रेरणा और आदर्श है। सही मायनों में उन विधायकजी को 'जोकरों का एमडी' होने का खिताब मुझे देना था नाकि युवराज को। खामखां युवराज को ऐसा कहकर विधायकजी ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी और मार ली। जबकि 'जोकरों का एमडी' होने का प्रत्येक गुण मुझमें मौजूद है। ऐसा मेरी पत्नी भी मुझसे कई दफा कह चुकी है। वो तो यहां तक कहती है कि मेरे व्यंग्य-लेख 'जोकरनुमा' ही होते हैं।

दरअसल, समाज और देश में आज जिस तरह का माहौल है, उसे सीरियस होकर नहीं केवल जोकर बने रहकर ही आसानी से समझा जा सकता है। क्या कीजिएगा, हमारे इर्द-गिर्द अक्सर कुछ बातें होती ही 'जोकरपंती' जैसी हैं। एक नन्ही-सी बात को जब तलक तिल का ताड़ नहीं बना लिया जाता, कथित पढ़े-लिखे बुद्धिजीवियों का हाजमा ही दुरुस्त नहीं होता। कभी-कभी तो मुझे बुद्धिजीवि बिरादरी से इत्ता डर लगता है कि मैं मेरे दिमाग में बसी जरा-बहुत बुद्धि को ही निकाल बाहर करने की सोचने लगता हूं। न बुद्धि दिमाग में रहेगी न बौद्धिक बोझ तले मैं दबूंगा। इसीलिए मेरी कोशिश रहती है कि मैं बुद्धि को परे रख जोकरपंती में ही व्यस्त रहूं।

ऐसा भी नहीं है कि जोकर को कभी दर्द नहीं होता। होता है किंतु वो अपने दर्द पर व्यंग्यात्मकता का लेप लगाकर हमेशा मुस्कुराता हुआ ही दिखता है। जैसे मेरा नाम जोकर में राज कपूर ने खुद जोकर बनकर किया। प्यारे, जोकर के किरदार को निभाना उत्ता भी आसान नहीं जित्ता लोगबाग समझते हैं। अपने गम पर मुस्कुराहट की परत चढ़ाना इत्ता आसान नहीं होता। इसीलिए मेरी निगाह में जोकर 'श्रेष्ठ' है क्योंकि उसने सीरियनेस को आदत नहीं बनाया हुआ है।

मैं खुद अपनी चार दिन की जिंदगी को जोकर बनकर ही जीना-बिताना चाहता हूं। न केवल जोकरों का एमडी बल्कि पूरी जोकर बिरादरी का हिस्सा ही बना रहना चाहता हूं ताकि निजी या दुनियावी सीरियसनेस से कोसों दूर रह सकूं।