सोमवार, 30 जून 2014

अच्छे दिन महंगाई के, खर्चीले दिन जनता के

चित्र साभारः गूगल
खबरें आ रही हैं कि महंगाई के अच्छे दिन और जनता के खर्चीले दिन आ गए हैं। यों भी, प्रधानमंत्रीजी कठोर आर्थिक फैसले लेने की धमकी पहले ही दे चुके हैं। शायद इस धमकी को थोक महंगाई दर ने अच्छे से समझ लिया। और उसने अपना असर दिखाना भी अब शुरू कर दिया है। नतीजतन, थोक महंगाई दर उछलकर 6 फीसद से ऊपर पहुंच गई।

वैसे, महंगाई के बारे में कहा कुछ नहीं जा सकता। चोरी-चुपके वो कब में बढ़ लेती है, किसी को पता भी नहीं चल पाता। बढ़े-बढ़े तीसमारखां आर्थिक पंडित फेल हो गए महंगाई को काबू कर पाने में। देखा नहीं, पिछली सरकार में खुद प्रधानमंत्रीजी अर्थशास्त्री होते हुए भी महंगाई पर लगाम न लगा सके। कित्ती-कित्ती खुशामतें कर लीं कि महंगाई कम हो जाए, महंगाई थम जाए, जनता को राहत मिल जाए लेकिन महंगाई कहां मानने वाली। उसने तो वही किया जो उसका मन किया। निगोड़ी महंगाई ने खामखां सरकार को और ‘निपटा‘ दिया।

वर्तमान सरकार ने महंगाई को कम करने के संकेत दिए तो हैं लेकिन यह लगता बहुत मुश्किल है। भला महंगाई के तिलिस्म से पार पाना हर किसी के बूते की बात नहीं। सिर्फ 'कड़े कदम' उठाने की बात सुनते ही महंगाई ने अपना 'रौद्ररूप' दिखाना अभी से शुरू कर दिया है। क्या सब्जी, क्या फल धीरे-धीरे हर चीज पर महंगाई अपना असर दिखाने लगी है। साथ-साथ प्याज भी रुला रहा है। आलू भी प्याज से मुकाबले में पीछे नहीं।

फिलहाल, रेल किराया बढ़ गया है। उम्मीद है, चीनी के दाम भी बढ़ेंगे। दाम बढ़ाना सरकार की मजबूरी है क्योंकि वो अच्छे दिन लाने को प्रतिबद्ध है।

फिर वही सवाल, जनता बेचारी क्या करे? अरे, करना क्या हैय या तो महंगाई को झेलने को तैयार रहे या फिर खाना-पीना छोड़कर किन्हीं जगलों में जाकर रहे। कंद-मूल-फल-पत्ते खाए और नदी का पानी पिए। प्यारे, जब समाज और सरकार के साथ रहना है, तो महंगाई को भी बर्दाशत पड़ेगा और गड्ढ़ों को भी। महंगाई और गड्ढ़े काफी हद तक एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों बढ़ने में तो 'अभ्यस्त' होते हैं किंतु 'भरने' में नहीं।

अब बेचारी सरकार की भी मजबूरी है कि कहां-कहां देखे! इधर महंगाई को संभाले या उधर पाकिस्तान-इराक से निपटे। विपक्ष भी सिर पर सवार है कि अब रोको महंगाई और पाकिस्तान को। खैर, विपक्ष का तो कम ही है कहना और कहते रहना।

मेरे विचार में, जनता को महंगाई के मुद्दे पर सरकार का उसी तरह से साथ देना चाहिए जैसा पिछली का दिया। मतलब, अच्छे दिन सरकार को देकर, बदले में खर्चीले दिन खुद ले ले। क्योंकि महंगाई तो थमने से रही प्यारे। महंगाई ने जब पिछली सरकार की नहीं सुनी, नई की क्या सुनेगी। अब करती रहे नई सरकार महंगाई रोकने पर माथा-पच्ची पर महंगाई पर भला किसका जोर चला है। शायद यही सोच-समझकर सरकार के एक मंत्री ने महंगाई की तुलना 'इंस्टेंट नूडल' से की होगी।

कोई नहीं, अभी तलक सरकार के अच्छे दिन रहे, अब महंगाई के अच्छे दिन शुरू हुए हैं। और जनता के खर्चीले दिन। इसमें इत्ता परेशान क्यों होना?

मुझे उम्मीद है, जनता आप ही महंगाई के खर्चीले दिनों से निपट लेगी। जैसा- अब तलक निपटती चली आई है। महंगाई दर 6 फीसद तक पहुंचे या 8 फीसद तक अंततः जेब जनता की ही ढीली होनी है। फिलहाल, जनता मानकर चले उसके अच्छे दिन चुनावी नतीजे आने से पहले तक ही थे, अब सारे दिन खर्चीले ही खर्चीले होने वाले हैं।

तो प्यारे प्रेम से बोलो- जय महंगाई, जय अच्छे दिन।

3 टिप्‍पणियां:

yashoda agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना बुधवार 17 जुलाई 2014 को लिंक की जाएगी...............
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सटीक व्यंग...

कविता रावत ने कहा…

अगर सरकार के पास इलाज नहीं हैं इस बढ़ती महंगाई का तो एक काम तो वे कर सकते हैं इस 'महंगाई' नाम की जगह दूसरा कोई नाम सर्वसम्मति से सदन में पास करवा लेना चाहिए। जनता खुश हो लेगी उसे भूलकर और दूसरे नाम को पाकर

बहुत बढ़िया