मंगलवार, 3 जून 2014

मूर्खता की डिग्री

चित्र साभारः गूगल
मुझे मूर्खता में महारत हासिल है। मूर्खता से जुड़ी तमाम डिग्रियां हैं मेरे कने। मूर्ख मेरे 'आदर्श' हैं और मूर्खता मेरी 'प्रेरणा'। मूर्ख और मूर्खता के बीच मैं खुद को बेहद सहज महसूस करता हूं। न किसी उच्च विचार को अपने भीतर आने देता हूं न ही किसी विचारवान से नाता-रिश्ता रखता हूं। विचारवान के विचार को सहन करने की शक्ति मेरे दिमाग में नहीं है। मैं अपनी मूर्खताओं के साथ मस्त रहना ज्यादा पसंद करता हूं।

लोगों को ऐसा भ्रम है कि मूर्खें में अक्ल नहीं होती। मूर्ख सिवाय मूर्खता के कुछ नहीं कर सकते। पर मैं ऐसा नहीं मानता। चूंकि मैं खुद मूर्ख हूं इसीलिए मूर्खता की प्रत्येक अच्छाई-बुराई को बेहतर समझ सकता हूं।

बेफिक्री मूर्खें का पहला गुण है। जिस आदर्शवाद को बुद्धिजीवि लोग अपने सीने से लगाए-लगाए घुमते हैं, मूर्खें के लिए वो 'बेतुकावाद' है। अरे काहे का आदर्शवाद? जो आदर्शवाद बुद्धिजीवियों को हमेशा 'यथास्थितिवादी' बनाए रखे, उससे उचित दूरी बनाए रखना ही बेहतर। अब देखिए न, बुद्धिजीवि लोग स्मृति ईरानी की डिग्री के कैसे पीछे पड़े हुए हैं। रात-दिन बस डिग्री और डिग्री पर ही बहस छेड़े हुए हैं। डिग्री न हुई, पेट की गैस हो गई- खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। खुद जित्ते बुद्धिजीवियों कने डिग्रियां हैं, क्या वे सब के सब होशियार (काबिल) हैं! बताएं।

ज्यादा दूर क्यों जाते हो, मुझे ही देख लो न। मैं तो गर्व के साथ हर किसी से यही कहता हूं- मेरे कने मूर्खता की डिग्री है। लो अब कर लो, मेरी भी खिंचाई। लेकिन मैं बुरा नहीं मानूंगा। क्योंकि मैं जो हूं, सो हूं। मुझे मूर्खता के साथ जिंदगी को जीने में घणा आनंद आता है। मैं उन यथास्थितिवादी बुद्धिजीवियों की तरह नहीं हूं, जो बुद्धि से बाहर निकल कर दुनिया को न समझना चाहते हैं न देखना।

पिछली सरकार में एक से बढ़कर एक डिग्रीधारी मंत्री-नेता रहे, देख लीजिए, सरकार और देश को कित्ता 'काबिल' बना दिया? डिग्रीधारी अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री तक महंगाई पर काबू न पा सके और डिग्रीधारी शिक्षामंत्री ने देश के शिक्षा के स्तर को इत्ता ऊंचा, इत्ता ऊंचा उठा दिया कि अब ठीक से देखने में ही नहीं आ पाता।

अगर डिग्रियों के चक्कर में ही उलझे रहोगे तो न खुद चैन से जी पाओगे, न दूसरे को जीने दोगे। डिग्री के भ्रम से बाहर निकलकर प्रैक्टिल की दुनिया में कदम रखो प्यारे।

मुझे मेरी मूर्खता की डिग्री पर नाज है। सौ होशियारों के बीच एक मूर्ख भी तो होना चाहिए, जो भीड़ से थोड़ा अलग लगे-दिखे।

ध्यान रखियो, मूर्खें का फ्यूजर बुद्धिजीवियों (काबिलों) से अधिक ब्राइट है। जय हो।

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