मंगलवार, 24 जून 2014

अच्छे दिन और बढ़ा रेल किराया

चित्र साभारः गूगल
सरकार का बहुत-बहुत शुक्रिया जो उसने अच्छे दिन आने वाले हैं चुनावी नारे की शुरूआत रेल किराया बढ़ाकर की। मैं सरकार के इस फैसले का तहे-दिल से समर्थन करता हूं। मैं जानता हूं, अच्छे दिन जुबान हिलाने या हाथ लहराने भर से नहीं आ जाते। अच्छे दिन लाने के लिए कुछ कड़े कदम उठाने ही पड़ते हैं। और उठाने चाहिए भी। यों भी, चुनावी नारों से न देश चलता है, न जनता का हित सधता है।

मात्र 14.2 फीसद ही तो रेल किराया बढ़ा है। कोई खास नहीं। बढ़े किराए को लेकर कुछ दिनों तक यहां-वहां हाय-तौबा मचेगी, फिर सब शांत होकर बैठ जाएंगे। इसी बढ़े किराए पर खुद भी यात्रा करेंगे और अपने नाते-रिश्तेदारों को भी करवाएंगे। यहां किसके पास इत्ता समय है, जो बढ़े किराए या महंगाई पर अपना दिमाग खपाए। इस सब की तो हमें दस साल से आदत जैसी हो गई है।

अभी तलक कुछ पता ही नहीं चल रहा था कि सरकार हमारे बीच है भी कि नहीं। सरकार की असली उपस्थिति का पता हमें तब ही चल पाता है, जब महंगाई या किराया बढ़ता है। बिना कुछ बढ़े पता ही नहीं चलता कि हम देश या समाज के बीच रह भी रहें कि नहीं। हमारी अच्छे दिन लाने वाली सरकार ने रेल किराया बढ़ाकर इस बात की मुनादी पिटवा दी है कि वो भी अपनी खास जगह रखती है।

देखा नहीं, पिछली सरकार ने कित्ते-कित्ते महंगे तरीकों से अपनी खास उपस्थिति को हमारे बीच दस साल तलक बनाए रखा। सरकार किराया और महंगाई बढ़ाती रही, और हम हो-हल्ला काटकर भी एडजस्ट करते रहे। एडजस्टमेंट के मामले में हमारा जवाब नहीं। दुनिया का चाहे कोई भी देश हो, एडजस्टमेंट के मामले में हमसे मुकाबला कतई नहीं कर सकता। पिछली सरकार की बदौलत ही हम एडजस्टमेंट का कायदा सीख-समझ पाए।

मुझे उम्मीद है, अब तलक कुछ लोग बढ़े रेल किराए के बीच खुद को एडजस्ट कर भी चुके होंगे। क्योंकि इसी में उनकी और सरकार की भलाई है। आखिर अच्छे दिनों का ख्याल सरकार के साथ-साथ हम नहीं रखेंगे तो भला क्या इराक और अमेरिका रखेंगे?

बढ़े रेल किराए या महंगाई के लिए सरकार को सीधे दोष न दें। इस कड़े फैसले में कुछ हाथ इराक संकट का भी है। बेचारा सेंसेक्स तो इराक संकट से इस कदर डर-सा गया है कि हर रोज थोड़ा-बहुत लुढ़क ही जाता है। सेंसेक्स भी क्या करे, उसकी मजबूरी है।

जो भी हो, सरकार की अच्छे दिन लाने की मंशा पर जरा भी शक न करें। अच्छे दिन जरूर आएंगे चाहे- किराया बढ़ाना पड़े या आलू-प्याज-टमाटर के भाव। कभी-कभी अच्छे दिन महंगाई के रास्ते भी लाने पड़ते हैं। अर्थशास्त्री इस रहस्य को बहुत अच्छे से जानते-समझते हैं।

तो प्यारे बढ़े रेल किराए का स्वागत इस विश्वास पर कीजिए कि सरकार अच्छे दिन लाने के लिए पूर्णता प्रतिबद्ध है। कृपया, मुंह न लटकाएं। सरकार की मजबूरी को समझें। ऐसे ही अभी और भी अच्छे दिन आने वाले हैं।

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