रविवार, 1 जून 2014

मेरे कने डिग्री नहीं है

चित्र साभारः गूगल
मेरे मोहल्ले में एक मुझे छोड़कर सभी 'डिग्रिधारी' हैं। किसी के पास दो डिग्रियां हैं तो किसी के पास तीन या चार। सभी को अपनी डिग्रियों पर उत्ता ही नाज है, जित्ता अक्लमंद को अक्ल पर होता है। यही वजह है कि मोहल्ले के तमाम डिग्रिधारी मुझसे 'उचित दूरी' बनाकर रहते हैं। न मेरे घर आते हैं, न मुझे अपने घर बुलाते हैं। बीच राह कभी अगर आमना-सामना हो भी जाए, तो यों नजरें फेर लेते हैं मानो मुझसे जन्म-जन्मांतर की दुश्मनी हो। लेकिन मैं बुरा नहीं मानता। बुरा क्यों मानूं, जो चीज मेरे कने नहीं है, तो नहीं है। न ही मेरी कभी कोशिश रहेगी कि मैं डिग्री के चक्कर में पड़ूं।

हां, यह बात सही है कि मेरा शैक्षिक स्तर मोहल्ले के डिग्रिधारी बुद्धिजीवियों जित्ता 'ऊंचा' नहीं। हां, यह भी सही है कि मेरा उठना-बैठना 'लफंगों' के बीच ही ज्यादा है वनिस्पत 'काबिलों' के। बेशक मैं लेखक जरूर हूं किंतु लेखकों की तरह न रहता हूं न बोलता-चालता। दरअसल, दिखावटी और आत्ममुग्ध जिंदगी या रहन-सहन मुझे कतई पसंद नहीं। मैं जैसा अंदर से हूं, वैसा ही बाहर भी दिखना चाहता हूं। इसीलिए मैंने केवल उत्ती ही पढ़ाई की जित्ता मेरा दिमाग झेल पाया।

हालांकि परिवार वालो की तमन्ना मुझे टीचर या प्रोफेसर बनाने की ही थी लेकिन बना मैं लेखक। अमां, जो खुद ढंग से न पढ़ सका, वो बच्चों को क्या खाक पढ़ाएगा? मेरा दिमाग किताबी पढ़ाई से अधिक प्रैक्टिकल ज्ञान में ज्यादा लगा। क्योंकि दुनियादारी की तिकड़मों को समझने के लिए पढ़ाई की नहीं, प्रैक्टिकल होने की आवश्यकता ज्यादा है।

न न मैंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया कि मेरे कने डिग्री नहीं तो मैं बेहद पिछड़ा हुआ हूं। बल्कि मैं तो खुश होता हूं कि मैं डिग्रिधारी बुद्धिजीवियों के चंगुल से आजाद हूं। उनकी तरह न किंतु-परंतु में जीता हूं न ही हर वक्त इज्जत की फिक्र किया करता हूं। मेरी 'बेवकूफियां' ही मेरी डिग्री और मेरी पहचान हैं। आदमी समझदार डिग्री से नहीं, संवेदनशीलता से बनता है। और जिसके कने केवल डिग्री हो, संवेदनशीलता नहीं, उसका डिग्रीधारी होना बेकार है। बुद्धिजीवियों के बीच जित्ता बैठोगे, उत्ता ही दिमाग का कचरा करोगे।

इधर जो एक महिला सांसद की डिग्री को लेकर तमाम तरह के सवाल बुद्धिजीवि लोग उठा रहे हैं, उनसे मेरा बस यही कहना है कि डिग्री की योग्यता और दिमाग या परिश्रम की योग्यता में बहुत फर्क होता है मान्यवर। कभी-कभी बे-पढ़ा भी वो सबकुछ कर जाता है, जिसका ख्याल तक पढ़े-लिखे को कभी नहीं आता। दुनिया में जित्ते भी बड़े अविष्कार या प्रयोग हुए हैं, उनके जन्मदाता ज्यादातर 'बे-डिग्रीधारक' ही रहे हैं। डिग्री पढ़ाई-लिखाई का मानक तो हो सकती है किंतु व्यवहारिकता का नहीं।

डिग्री और डिप्लोमा पर बहस करने वाले जरा एक दफा देख तो लें अपने देश की शिक्षा का हाल। सैकड़ों की तादाद में बंदे बेरोजगार घुम रहे हैं। डिग्री पास होने के बाद भी रिक्शा ठेलने को मजबूर हैं। ऐसी डिग्री से भी क्या हासिल जो जीवन में 'डाउनफाल' ले आए।

डिग्री-डिप्लोमा पर बहस बेमानी है। जिनके कने डिग्रियां हैं, वे इतराए नहीं। और जिनके कने नहीं हैं, वे दुखी न हों मेरी तरह। डिग्री तो हाथ का मैल है प्यारे। किसान कने डिग्री नहीं होती मगर फिर भी वो फसल पैदा करके दिखाता है। अपनी मेहनत से देश के तमाम डिग्रीधारकों का पेट भरता है। फिर डिग्री पर इत्ता घमंड क्यों और किसलिए?

किसी को हो न हो किंतु मुझे खुद पर 'फर्क' है कि मेरे कने डिग्री नहीं।

कोई टिप्पणी नहीं: