सोमवार, 30 जून 2014

अच्छे दिन महंगाई के, खर्चीले दिन जनता के

चित्र साभारः गूगल
खबरें आ रही हैं कि महंगाई के अच्छे दिन और जनता के खर्चीले दिन आ गए हैं। यों भी, प्रधानमंत्रीजी कठोर आर्थिक फैसले लेने की धमकी पहले ही दे चुके हैं। शायद इस धमकी को थोक महंगाई दर ने अच्छे से समझ लिया। और उसने अपना असर दिखाना भी अब शुरू कर दिया है। नतीजतन, थोक महंगाई दर उछलकर 6 फीसद से ऊपर पहुंच गई।

वैसे, महंगाई के बारे में कहा कुछ नहीं जा सकता। चोरी-चुपके वो कब में बढ़ लेती है, किसी को पता भी नहीं चल पाता। बढ़े-बढ़े तीसमारखां आर्थिक पंडित फेल हो गए महंगाई को काबू कर पाने में। देखा नहीं, पिछली सरकार में खुद प्रधानमंत्रीजी अर्थशास्त्री होते हुए भी महंगाई पर लगाम न लगा सके। कित्ती-कित्ती खुशामतें कर लीं कि महंगाई कम हो जाए, महंगाई थम जाए, जनता को राहत मिल जाए लेकिन महंगाई कहां मानने वाली। उसने तो वही किया जो उसका मन किया। निगोड़ी महंगाई ने खामखां सरकार को और ‘निपटा‘ दिया।

वर्तमान सरकार ने महंगाई को कम करने के संकेत दिए तो हैं लेकिन यह लगता बहुत मुश्किल है। भला महंगाई के तिलिस्म से पार पाना हर किसी के बूते की बात नहीं। सिर्फ 'कड़े कदम' उठाने की बात सुनते ही महंगाई ने अपना 'रौद्ररूप' दिखाना अभी से शुरू कर दिया है। क्या सब्जी, क्या फल धीरे-धीरे हर चीज पर महंगाई अपना असर दिखाने लगी है। साथ-साथ प्याज भी रुला रहा है। आलू भी प्याज से मुकाबले में पीछे नहीं।

फिलहाल, रेल किराया बढ़ गया है। उम्मीद है, चीनी के दाम भी बढ़ेंगे। दाम बढ़ाना सरकार की मजबूरी है क्योंकि वो अच्छे दिन लाने को प्रतिबद्ध है।

फिर वही सवाल, जनता बेचारी क्या करे? अरे, करना क्या हैय या तो महंगाई को झेलने को तैयार रहे या फिर खाना-पीना छोड़कर किन्हीं जगलों में जाकर रहे। कंद-मूल-फल-पत्ते खाए और नदी का पानी पिए। प्यारे, जब समाज और सरकार के साथ रहना है, तो महंगाई को भी बर्दाशत पड़ेगा और गड्ढ़ों को भी। महंगाई और गड्ढ़े काफी हद तक एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों बढ़ने में तो 'अभ्यस्त' होते हैं किंतु 'भरने' में नहीं।

अब बेचारी सरकार की भी मजबूरी है कि कहां-कहां देखे! इधर महंगाई को संभाले या उधर पाकिस्तान-इराक से निपटे। विपक्ष भी सिर पर सवार है कि अब रोको महंगाई और पाकिस्तान को। खैर, विपक्ष का तो कम ही है कहना और कहते रहना।

मेरे विचार में, जनता को महंगाई के मुद्दे पर सरकार का उसी तरह से साथ देना चाहिए जैसा पिछली का दिया। मतलब, अच्छे दिन सरकार को देकर, बदले में खर्चीले दिन खुद ले ले। क्योंकि महंगाई तो थमने से रही प्यारे। महंगाई ने जब पिछली सरकार की नहीं सुनी, नई की क्या सुनेगी। अब करती रहे नई सरकार महंगाई रोकने पर माथा-पच्ची पर महंगाई पर भला किसका जोर चला है। शायद यही सोच-समझकर सरकार के एक मंत्री ने महंगाई की तुलना 'इंस्टेंट नूडल' से की होगी।

कोई नहीं, अभी तलक सरकार के अच्छे दिन रहे, अब महंगाई के अच्छे दिन शुरू हुए हैं। और जनता के खर्चीले दिन। इसमें इत्ता परेशान क्यों होना?

मुझे उम्मीद है, जनता आप ही महंगाई के खर्चीले दिनों से निपट लेगी। जैसा- अब तलक निपटती चली आई है। महंगाई दर 6 फीसद तक पहुंचे या 8 फीसद तक अंततः जेब जनता की ही ढीली होनी है। फिलहाल, जनता मानकर चले उसके अच्छे दिन चुनावी नतीजे आने से पहले तक ही थे, अब सारे दिन खर्चीले ही खर्चीले होने वाले हैं।

तो प्यारे प्रेम से बोलो- जय महंगाई, जय अच्छे दिन।

मंगलवार, 24 जून 2014

अच्छे दिन और बढ़ा रेल किराया

चित्र साभारः गूगल
सरकार का बहुत-बहुत शुक्रिया जो उसने अच्छे दिन आने वाले हैं चुनावी नारे की शुरूआत रेल किराया बढ़ाकर की। मैं सरकार के इस फैसले का तहे-दिल से समर्थन करता हूं। मैं जानता हूं, अच्छे दिन जुबान हिलाने या हाथ लहराने भर से नहीं आ जाते। अच्छे दिन लाने के लिए कुछ कड़े कदम उठाने ही पड़ते हैं। और उठाने चाहिए भी। यों भी, चुनावी नारों से न देश चलता है, न जनता का हित सधता है।

मात्र 14.2 फीसद ही तो रेल किराया बढ़ा है। कोई खास नहीं। बढ़े किराए को लेकर कुछ दिनों तक यहां-वहां हाय-तौबा मचेगी, फिर सब शांत होकर बैठ जाएंगे। इसी बढ़े किराए पर खुद भी यात्रा करेंगे और अपने नाते-रिश्तेदारों को भी करवाएंगे। यहां किसके पास इत्ता समय है, जो बढ़े किराए या महंगाई पर अपना दिमाग खपाए। इस सब की तो हमें दस साल से आदत जैसी हो गई है।

अभी तलक कुछ पता ही नहीं चल रहा था कि सरकार हमारे बीच है भी कि नहीं। सरकार की असली उपस्थिति का पता हमें तब ही चल पाता है, जब महंगाई या किराया बढ़ता है। बिना कुछ बढ़े पता ही नहीं चलता कि हम देश या समाज के बीच रह भी रहें कि नहीं। हमारी अच्छे दिन लाने वाली सरकार ने रेल किराया बढ़ाकर इस बात की मुनादी पिटवा दी है कि वो भी अपनी खास जगह रखती है।

देखा नहीं, पिछली सरकार ने कित्ते-कित्ते महंगे तरीकों से अपनी खास उपस्थिति को हमारे बीच दस साल तलक बनाए रखा। सरकार किराया और महंगाई बढ़ाती रही, और हम हो-हल्ला काटकर भी एडजस्ट करते रहे। एडजस्टमेंट के मामले में हमारा जवाब नहीं। दुनिया का चाहे कोई भी देश हो, एडजस्टमेंट के मामले में हमसे मुकाबला कतई नहीं कर सकता। पिछली सरकार की बदौलत ही हम एडजस्टमेंट का कायदा सीख-समझ पाए।

मुझे उम्मीद है, अब तलक कुछ लोग बढ़े रेल किराए के बीच खुद को एडजस्ट कर भी चुके होंगे। क्योंकि इसी में उनकी और सरकार की भलाई है। आखिर अच्छे दिनों का ख्याल सरकार के साथ-साथ हम नहीं रखेंगे तो भला क्या इराक और अमेरिका रखेंगे?

बढ़े रेल किराए या महंगाई के लिए सरकार को सीधे दोष न दें। इस कड़े फैसले में कुछ हाथ इराक संकट का भी है। बेचारा सेंसेक्स तो इराक संकट से इस कदर डर-सा गया है कि हर रोज थोड़ा-बहुत लुढ़क ही जाता है। सेंसेक्स भी क्या करे, उसकी मजबूरी है।

जो भी हो, सरकार की अच्छे दिन लाने की मंशा पर जरा भी शक न करें। अच्छे दिन जरूर आएंगे चाहे- किराया बढ़ाना पड़े या आलू-प्याज-टमाटर के भाव। कभी-कभी अच्छे दिन महंगाई के रास्ते भी लाने पड़ते हैं। अर्थशास्त्री इस रहस्य को बहुत अच्छे से जानते-समझते हैं।

तो प्यारे बढ़े रेल किराए का स्वागत इस विश्वास पर कीजिए कि सरकार अच्छे दिन लाने के लिए पूर्णता प्रतिबद्ध है। कृपया, मुंह न लटकाएं। सरकार की मजबूरी को समझें। ऐसे ही अभी और भी अच्छे दिन आने वाले हैं।

गुरुवार, 19 जून 2014

आ भी जाओ प्यारे मानसून

चित्र साभारः गूगल
प्यारे मानूसन, अच्छे मानसून, तुम कब आओगे? अब और अधिक देर न करो जल्द आ जाओ। इस समय हमें तुम्हारी बेहद जरूरत है। हमारी हर सुबह इसी उम्मीद के साथ होती है कि तुम आज आओगे और धरती पर बरसकर सूरज चचा के ताप से मुक्ति दिलाओगे। तुम नहीं जानते, सूरज चचा ने अपने ताप से धरती पर कैसा 'कहर' बरपाया हुआ है। सूरज चचा न दिन में चैन लेने दे रहे हैं, न रात को चैन से सोने दे रहे। आंख खुलते ही सुबह-सुबह छत पर टंगे मिलते हैं। न जाने किस जन्म का बदला सूरज चचा हमसे ले रहे हैं?

प्यारे मानसून, मैं जानता हूं तुम बहुत 'शक्तिशाली' हो। सूरज, गर्मी, पारा, बत्ती ये सभी तुमसे पनाह मांगते हैं। तुम्हारे आगे किसी का भी बस नहीं चलता। एक दफा अगर तुम शुरू हो गए तो फिर किसी के रोके नहीं रुकते। पिछले सालों में हम तुम्हारे विकट रूप को देख चुके हैं। इस समय गर्मी के मारे हमारा जो हाल है, उसे केवल तुम्हीं संवार-संभाल सकते हो। पारा है कि 46-47 डिग्री से नीचे उतरने का नाम ही नहीं लेता। गर्मी का असर इत्ता है कि मेरी कमीज से लेकर टैंक के पानी तक सबकु छ उबला हुआ लगता-मिलता है। उबले पानी में हाथ डालने में डर लगता है कि कहीं झुलस न जाएं। आंख उठाकर आसमान की तरफ देखने की हिम्मत नहीं होती। सूरज चचा तुरंत अपनी किरणों के तीर छोड़ देते हैं।

गर्मी, पारे को झेलने के साथ-साथ बत्ती के तीखे नखरों को भी बर्दाशत कर रहे हैं। क्या करें, बिन बत्ती या तो हाथ-पंखा झलते रहते हैं या फिर बदन पर से कपड़ों को हटा ऐसे ही बैठ जाते हैं। अव्वल तो हवा चल ही नहीं रही, जो चल रही है, वो गर्म इस कदर है कि सिर भन्ना जाता है। बत्ती न आने की शिकायत जाने कित्ती दफा बत्तीघर वालो से की। मगर वे कहते हैं, हमारे हाथ में कु छ नहीं, सब ऊपर वालो के हाथ है। ऊपर वाले हैं कि कु छ सुनने-समझने को तैयार ही नहीं। टका-सा जवाब दे देते हैं, उत्पादन घट गया है, तो हम क्या करें?

मार हर जगह, हर तरीके से पड़ रही है। और हम मार खाने को 'अभिशप्त' हैं।

प्यारे मानसून, अब तुम ही हमारी 'अंतिम उम्मीद' हो। सारी निगाहें बस तुम्हीं पर टिकी हैं। हम धरतीवासी तरस रहे हैं, तुम्हारी फु हार में भीग जाने को। पर खबर में ऐसा सुना है कि इस दफा तुम सामान्य से कम बरसोगे। शायद अभी करेल में कहीं अटके हुए हो। लेकिन वहां भी अभी उस तरह नहीं बरस पाए हो। यार, ऐसा न करो। कु छ तो हम धरतीवासियों का ख्याल करो। गर्मी-पारे ने हालत खराब कर रखी है। ज्यादा हालत खराब हो गई तो कहीं ऊपर जाने की टिकट न कटवाना पड़ जाए। इसीलिए माई डियर मानसून, तुम बिना रूके, बिना अटके हमारे यहां आ जाओ।

कम से कम अभी इत्ता तो बरस ही जाओ कि हम पारे के दंश से कु छ तो उभर सकें। दिन में न सही कम से कम रात में तो चैन की नींद ले सकें। गर्म हवा ठंडी हवा का एहसास देने लगे। तुम बरसोगे तो बत्तीवाले भी हम पर थोड़ा मेहरबान रहेंगे। बेवजह न हम उन पर, न वे हम पर झल्लाएंगे।

तुम्हारी खातिर मैं हर तरह का टोना-टोटका करने को तैयार हूं। अपने सिर के बाल तक मुंडवा सकता हूं। गर्म धरती पर दो-चार किलोमीटर पैदल भी चल सकता हूं। आज तलक कभी भगवान के द्वार पर नहीं गया पर तुम्हारी खातिर वहां भी जा सकता हूं।

इत्ती सिफारिश के बाद, उम्मीद है, तुम हमें 'निराश' न करोगे और बहुत जल्द हमारे द्वार पर दस्तक दोगे। ज्यादा इतराओ नहीं प्यारे मानसून अब आ भी जाओ।

सोमवार, 16 जून 2014

अभी-अभी तो सरकार बनी है

चित्र साभारः गूगल
अभी सरकार को बने दिन ही कित्ते हुए हैं। अभी सरकार के मंत्री लोगों ने काम को हाथ में लिया ही है। अभी किस्म-किस्म की योजनाओं-परियोजनाओं पर बातचीत और विचार-विमर्श शुरू ही हुआ है। मगर लोग हैं कि अभी से सरकार के पीछे पड़ गए हैं। सरकार के काम-काज में नुक्स निकालना शुरू कर दिए हैं। हंगामा काट रहे हैं कि सरकार ने अभी तक यह नहीं किया, वो नहीं किया। जो वायदे किए थे, उनमें से अभी तक एक भी नहीं निभाया।

कमाल है। हमारे देश के लोग जल्दी में कित्ता रहते हैं। हर सपने को रात भर में ही पूरा कर लेना चाहते हैं। चाहे जल्दबाजी में सपना टूट ही क्यों न जाए। पर जल्दी है तो है। जल्दबाजी के मारे मैंने ऐसे लोग भी खूब देखें हैं, जो उबलती चाय मुंह में डाल लेते हैं, फिर दुनिया भर में मुंह जलने की दास्तां सुनाते फिरते हैं।

अमां, थोड़ा धीरज धरो। दिमाग को थोड़ा ठंडा करो। अभी-अभी तो सरकार बनी है, अभी-अभी कैसे सारे चुनावी वायदों को पूरा कर सकती है। टाइम लगेगा, टाइम। यह भारत है, भारत। यहां घड़ी भी इंसान की फितरत और चुस्ती को देखकर अपनी चाल चलती है। और फिर सरकारी काम-काज या वायदे होते-होते ही तो हो पाएंगे। अब बस यह मत पूछना कि कब, कहां और कैसे? क्योंकि यह तो खुद सरकार और उसके मंत्रियों को भी नहीं पता होता।

गंगा की साफ-सफाई के बाद महंगाई को काबू में रखने की मंत्रणा सरकार ने शुरू तो कर दी है पर अभी इसमें भी टाइम लगेगा। महंगाई कोई मैगी थोड़े है कि पानी में डाला और दो मिनट में तैयार। इत्ते सालों में बढ़ी अनाप-शनाप महंगाई को रोकना बहुत बड़ा टास्क है। कित्ता भी जल्दी हो कम से कम पांच साल तो लग ही जाएंगे इस काम में। हमारे देश में जरा-जरा सी बात पर तो महंगाई बढ़ जाती है। लग रहा है, इस दफा मानसून भी अपने रंग महंगाई के रूप में दिखाने को तैयार बैठा है। हालांकि सकरार इससे निपटने को प्रतिबद्ध है पर गारंटी जैसे कोई बात नहीं।

अब महंगाई बढ़े या घटे हमारे देश की जनता हर हाल में एडजस्ट करना जानती है। इस हकीकत को महंगाई भी अच्छे से समझती है।

अच्छे दिनों का वायदा करके आई सरकार से अच्छा करने की उम्मीद जरूर रखें किंतु उसके सिर पर तो न सवार हों। सरकार को एक ही काम थोड़े है। इत्ता बड़ा देश है, इत्ते लोग हैं, सबको साथ लेकर चलना हंसी-खेल थोड़े है। फिर भी, जो जल्दबाजी में हैं, उनसे इत्ता ही कहा जा सकता है, प्यारे धीरज धरो। कहीं जल्दबाज में 49 दिनों की सरकार का हश्र पुन: न देखना पड़े।

रविवार, 15 जून 2014

सूरज महाराज पर एफआइआर

चित्र साभारः गूगल
अब तलक तो मैं टालता रहा। एकाध दफा प्यार व गुस्से से भी समझाया। सोचा कि सुधर जाएंगे। अक्सर मई-जून में उनके मिजाज कुछ ऐसे ही 'आक्रमक' से हो जाते हैं। तब वे न किसी की सुनते हैं, न किसी को कुछ समझते। लेकिन प्यारे 'बरदाशत' की एक सीमा होती है। भला आज के जमाने में ऐंवई कौन किसी की बरदाशत करता है? मैं कर रहा हूं, यह मेरा 'बड़प्पन' है। पर मैं मेरे बड़प्पन का 'नाजायज फायदा' किसी को भी उठाने नहीं दे सकता। चाहे वो सरकार हो या सूरज महाराज।

काफी सोचने-विचारने के बाद मैंने यह तय किया है कि मैं सूरज महाराज पर 'एफआइआर' दर्ज करवाऊंगा। क्योंकि मेरे कने अब इसके अलावा दूसरा कोई 'सहज रास्ता' नहीं बचा है। इत्ता समझाने-बुझाने के बाद भी जब कोई नहीं माने फिर भुगतने को तैयार रहे।

इधर कुछ दिनों से सूरज महाराज ने हद ही कर रखी है। न दिन में चैन लेने दे रहे हैं, न रात में चैन से सोने दे रहे। चौबीस घंटे अपने तापमानी-प्रकोप से हमारे पसीने छुड़ाते रहते हैं। कुछ काम से बाहर निकलो कि सिर पर भन्नाने लग जाते हैं। न छतरी के बस में आ पा रहे हैं न गमछे के। सड़क चलता और घर-दफ्तर में बैठा हर आदमी हर वक्त बौखलाया-सा मिलता है। मानो अभी कच्चा चबा जाएगा।

इस 46-47 डिग्री तापमान में चाहे सिर पर ठंडे पानी की बोतल उड़ेल लो या बरफ की सिल्ली क्यों न रख लो, सब बेकार। सूरज महाराज अपनी प्रचंडता से हर ठंडक के साधन और सामान की बाट लगाए हुए हैं। हालत यह है कि ठंडक न एसी में बैठकर मिल पा रही है, न फिज्र में। सबकुछ को बेदम-सा कर रखा है सूरज महाराज और गर्मी ने मिलकर।

एक तरफ सूरज महाराज की गर्मी का प्रकोप है तो दूसरी तरफ बत्ती के नखरे। अव्वल तो आती नहीं। आती है तो असर नहीं जमा पाती। एसी को छोड़िए, पंखा ही चल जाए तो गनीमत। वोल्टेज ने हाल वो बेहाल किया हुआ है कि बत्ती का होना अक्सर न होने जैसा ही लगता है। बिजली विभाग वालो से शिकायत करो तो कहते हैं कि ऊपर से ही नहीं मिल पा रही। ऊपर से वालो से शिकायत करो तो कहते हैं कि नीचे वालो ने हालत खराब कर रखी है। सरकार से कहो तो कहती है कि अपराध-बलात्कार तो रोके नहीं रुक रहे, बत्ती की बाद में देखी जाएगी!

जनता बेचारी भी क्या करे, रोज-ब-रोज बत्ती और गर्मी को लेकर सड़कों पर 'अंदोलित' होती रहती है लेकिन नतीता कुछ नहीं निकलता। हार कर कुछ हालात से समझौता कर लेते हैं, तो कुछ मुकदमें के लफड़े में पड़ जाते हैं।

इत्ते पर हमारे सूरज महाराज का दिल नहीं पिघलता। हर रोज पारे का एक नया रिकार्ड कायम कर आसमान से आग उगल रहे हैं। वो तो मेरा बस नहीं चलता, नहीं तो मैं सूरज महाराज की इस हरकत पर उन्हें जाने का कब का 'थप्पड़' जमा चुका होता। लेकिन आजकल सूरज महाराज के नजदीक भी जाना सीधा मौत को दावत देने जैसा है।

इसीलिए मैंने निर्णय लिया है कि सूरज महाराज पर एफआइआर होनी ही चाहिए। ताकि उन्हें भी तो एहसास हो कि सेर से बढ़कर सवा सेर धरती पर मौजूद है- मुझ जैसा। सूरज महाराज ऐसे सुधरने वाले नहीं। हफ्ता-दस दिन हवालात में रहेंगे, अपनी गर्मी को खुद झेलेंगे, न पंखा मिलेगा, न एसी; सारी अक्ल ठिकाने आ जाएगी। सताते वाले को जब तलक सजा न मिले हमेशा चौड़ा होकर ही घुमता है।

बहरहाल, सूरज महाराज के खिलाफ एफआइआर तैयार है। दर्ज करवाने निकल रहा हूं। उम्मीद है, गर्मी से जल्द ही राहत मिलेगी।

बुधवार, 11 जून 2014

गर्मी, तुम अभी और पड़ो

चित्र साभारः गूगल
हे! गर्मी, प्यारी गर्मी, अभी तुम और पड़ो। अभी ढंग से पड़ी ही कहां हो! पारा अभी 46-47 डिग्री के इर्द-गिर्द ही तो डोल रहा है। बात तो तब है, जब यह 50-55 डिग्री के भी पार पहुंच जाए। लोगबाग न सिर्फ बे-हाल बल्कि बे-सब्र हो जाएं। हर किसी की जुबान पर बस गर्मी हाय! गर्मी का ही नाम हो। गर्मी से निजात न एसी की ठंडक से मिले, न ठंडे पानी की बोतल से, न ठंड-ठंडा कूल-कूल पाउडर से। साथ-साथ, पहाड़ भी मैदान जैसे ही गर्म हो जाएं। पहाड़ की ठंडक 'दिव्यस्पप्न' सी लगने लगे।

एक तरफ गर्मी की मार सताए तो दूसरी तरफ बत्ती के नखरे। पूरा दिन बस बत्ती के ही इंतजार में बीत जाए। और जब आए तो ऐसी आए कि आने का अहसास तक न हो। न इनवर्टर, न बैटरी सबकुछ धरा का धरा रह जाए। बस हाथ-पंखा पास हो। उसी से गर्मी के गुस्से को शांत किया जाए।

हो सकता है, कुछ को मेरे गर्मी के समर्थन में लिखे इस लेख पर घोर आपत्ति हो। कुछ मेरे खिलाफ मिथ्या-प्रचार में भी जुट जाएं। अब हो तो हो। मुझ पर कोई फर्क  नहीं पड़ता। जब हमने प्रकृति को कहीं का नहीं छोड़ा प्यारे, फिर प्रकृति हमें क्यों छोड़े? ईंट का बदला ईंट से देने में जो मजा है, वो किसी और में नहीं। हरे-भरे पेड़ों के कटने की सजा इंसान भी तो कुछ झेले। चाहे भीषण गर्मी के रूप में, चाहे सर्दी के।

इन दिनों गर्मी हमारा 'इम्तिहान' ले रही है। देख रही है कि हम उसे किस हद तक झेल पाते हैं। देख रही है कि हम 47-48 डिग्री पारे में भी कैसे खुद को 'ठंडा' रख पाते हैं। गर्मी गर्मियों में नहीं पड़ेगी तो क्या दिसंबर-जनवरी में पड़ेगी प्यारे? होना तो यह चाहिए कि जित्ता गर्मी पड़ रही है, उत्ता ही हम 'स्ट्रांग' बने उसे झेलने के लिए। मजा तो तगड़े से मुकाबला करने में है।

गर्मी से क्या शिकायत करना? गर्मी तो पड़ेगी ही। शिकायत करनी है, तो उनसे करें, जिन्होंने गर्मी को प्रचंड होने पर मजबूर किया।

एन्जॉय गर्मी को भी किया जा सकता है, बर्शेते बिना नाक-मुंह-भौं सिकोड़े। गर्मी को गर्मी की तरह लेंगे तो गर्मी का अहसास भी न होगा। अगर समस्या मानेंगे तो गर्मी यों ही सताएगी। गर्मी में अगर बौखलाएंगे तो अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारेंगे।

इसीलिए तो मैं गर्मी से बराबर यही कह रहा हूं कि हे! गर्मी, प्यारी गर्मी अभी तुम और पड़ो। और पड़ो। और पड़ो। इत्ती पड़ो कि मेरी कुल्फी तुम्हारे तापमान से क्षणभर में पिघलकर 'गर्म पानी' बन जाए।

सोमवार, 9 जून 2014

सीरियस बनाम जोकर

चित्र साभारः गूगल
मुझे सीरियस होना नहीं आता। हालांकि कई दफा प्रयास किए सीरियस होने के, कई किताबें पढ़ीं सीरियस होने के लिए किंतु नतीजा 'सिफर' ही रहा। मुझे खूब याद है, मैं तब भी सीरियस नहीं हुआ था, जब हाईस्कूल में ही पांच दफा फेल हुआ। केवल एक विषय को छोड़कर बाकी में दस अंक से अधिक नहीं पा सका था। फेल होने पर हर बार पिताजी से पिटाई का प्रसाद मिला करता था। लेकिन मेरी फितरत ही कुछ ऐसी थी कि मैं सीरियस नहीं होता था।

तब से लेकर आज तक मैंने अपनी नॉन-सीरियस फितरत को बरकरार रखा हुआ है। दुनिया चाहे इधर से उधर हो जाए या गर्मी पारे के सारे रिकार्ड तोड़ दे या फिर सोना टूट-टूटकर कांच ही क्यों न बन जाए मगर मैं सीरियस नहीं होऊंगा। सीरियस होने को मैं अपने तईं 'श्राप' मानता हूं। और सीरियस लोगों, सीरियस विचारों, सीरियस खान-पान से कोसों दूरी बनाकर रहता हूं। ताकि सीरियसनेस के कीटाणु मेरे भीतर प्रवेश न कर सकें।
मुझे सीरियस होने से कहीं बेहतर लगता है खुद का 'जोकर' होना। जोकर का काम ही हंसना-हंसाना और मुस्कुराहट की ताजगी बिखेरते रहना है। जोकर न कभी चेहरे-मोहरे में सीरियस होता है न हाव-भाव में। जोकर के साथ न विचारधारा न झंझट रहता है न वाद की बीमारी। जोकर अपनी जोकरपंती के साथ स्वतंत्र होता है।

ठीक यही खूबियां मुझ में हैं। मैं अपनी हंसी-मजाक की आदतों के साथ आजाद हूं। कोई ऊंचा या बड़ा साहित्यकार-लेखक-विचारक नहीं बल्कि जोकर ही मेरी प्रेरणा और आदर्श है। सही मायनों में उन विधायकजी को 'जोकरों का एमडी' होने का खिताब मुझे देना था नाकि युवराज को। खामखां युवराज को ऐसा कहकर विधायकजी ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी और मार ली। जबकि 'जोकरों का एमडी' होने का प्रत्येक गुण मुझमें मौजूद है। ऐसा मेरी पत्नी भी मुझसे कई दफा कह चुकी है। वो तो यहां तक कहती है कि मेरे व्यंग्य-लेख 'जोकरनुमा' ही होते हैं।

दरअसल, समाज और देश में आज जिस तरह का माहौल है, उसे सीरियस होकर नहीं केवल जोकर बने रहकर ही आसानी से समझा जा सकता है। क्या कीजिएगा, हमारे इर्द-गिर्द अक्सर कुछ बातें होती ही 'जोकरपंती' जैसी हैं। एक नन्ही-सी बात को जब तलक तिल का ताड़ नहीं बना लिया जाता, कथित पढ़े-लिखे बुद्धिजीवियों का हाजमा ही दुरुस्त नहीं होता। कभी-कभी तो मुझे बुद्धिजीवि बिरादरी से इत्ता डर लगता है कि मैं मेरे दिमाग में बसी जरा-बहुत बुद्धि को ही निकाल बाहर करने की सोचने लगता हूं। न बुद्धि दिमाग में रहेगी न बौद्धिक बोझ तले मैं दबूंगा। इसीलिए मेरी कोशिश रहती है कि मैं बुद्धि को परे रख जोकरपंती में ही व्यस्त रहूं।

ऐसा भी नहीं है कि जोकर को कभी दर्द नहीं होता। होता है किंतु वो अपने दर्द पर व्यंग्यात्मकता का लेप लगाकर हमेशा मुस्कुराता हुआ ही दिखता है। जैसे मेरा नाम जोकर में राज कपूर ने खुद जोकर बनकर किया। प्यारे, जोकर के किरदार को निभाना उत्ता भी आसान नहीं जित्ता लोगबाग समझते हैं। अपने गम पर मुस्कुराहट की परत चढ़ाना इत्ता आसान नहीं होता। इसीलिए मेरी निगाह में जोकर 'श्रेष्ठ' है क्योंकि उसने सीरियनेस को आदत नहीं बनाया हुआ है।

मैं खुद अपनी चार दिन की जिंदगी को जोकर बनकर ही जीना-बिताना चाहता हूं। न केवल जोकरों का एमडी बल्कि पूरी जोकर बिरादरी का हिस्सा ही बना रहना चाहता हूं ताकि निजी या दुनियावी सीरियसनेस से कोसों दूर रह सकूं।

बुधवार, 4 जून 2014

मेरा प्यारा उत्तर प्रदेश

चित्र साभारः गूगल
आजकल जिसे देखो वो मेरे उत्तर प्रदेश की बुराई-खिंचाई में लगा है। जाने क्या-क्या और कैसा-कैसा कहा जा रहा है। अखबारों और चैनलों पर उत्तर प्रदेश सरकार की कानून-व्यवस्था पर तीखी बहस छिड़ी है। कोई उत्तर प्रदेश को 'अपराध प्रदेश' बता रहा है तो कोई 'जंगल राज' की संज्ञा दे रहा है। कुछ के पेट में केवल इसीलिए दर्द है क्योंकि उत्तर प्रदेश में बत्ती गुल है।

जबकि ऐसा कुछ नहीं है। मैं स्वयं मेरे प्यारे उत्तर प्रदेश से हूं। यहां का सैंतीस साल पुराना निवासी हूं। मेरे परदादा से लेकर दादा तलक उत्तर प्रदेश में रहे हैं। न कभी उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार से शिकायत रही और न ही मुझे है। मुझे सरकार के भीतर-बाहर 'शिकायत' जैसा कुछ लगता-दिखता ही नहीं फिर क्यों करूं ? खामखां, अपना और मुख्यमंत्रीजी का टाइम खराब करूं ! मेरे कने निजी परेशानियां ही इत्ती हैं, फिर क्यों अतिरिक्त परेशानी मोल लूं!

एकदम सबकुछ 'चकाचक' तो चल रहा है मेरे प्यारे उत्तर प्रदेश में। अब हिंसा-अपराध का क्या है, यह तो कभी भी कहीं भी घट सकते हैं। बेचारे मुख्यमंत्रीजी या उनके अधिकारी अब चप्पे-चप्पे पर तो मौजूद रह नहीं सकते! अरे भई इत्ता बड़ा प्रदेश है। इत्ती बड़ी जनसंख्या है। इत्ते सारे शहर-गली-मोहल्ले-गांव-कस्बे-सडक़ें-चौराहें हैं। हालांकि कोशिश उनकी पूरी रहती है कि हिंसा-अपराध न के बराबर हों फिर भी अगर कुछ छुट-पुट हो जाता है, अब इसमें सरकार या मुख्यमंत्रीजी क्या करें? अपराधियों के साथ-साथ अधिकारियों तक को इत्ता 'टाइट' किया हुआ है, फिर भी दो-चार दगा दे ही जाते हैं।

यों भी, इत्ते बड़े प्रदेश को अकेले दम पर संभालना हंसी-ठिठोली नहीं है प्यारे। भीतर तक का 'तेल' निकल आता है। यह कोई गुजरात थोड़े है कि बातें बनाईं और काम हो गया। यह उत्तर प्रदेश है, मेरा प्यारा उत्तर प्रदेश।

कुछ लोग बत्ती को लेकर ही हाय-हाय कर रहे हैं। अरे भई क्यों कर रहे हो हाय-हाय? अच्छी-खासी तो बत्ती आ रही है! दिनभर में अगर 17-18 घंटे बत्ती नहीं भी आती, तो इत्ता दुखी क्यों हो? सरकार कने जित्ती बत्ती होगी, उत्ती ही तो मिलेगी। हमारे मुख्यमंत्रीजी ने केंद्र को लिख रखा है- उधार की बत्ती के लिए। जब मिल जाएगी, तो दे दी जाएगी। मुख्यमंत्रीजी कोई खुद थोड़े ही रख लेंगे सारी बत्ती। जनता की बत्ती, जनता के हवाले।

बत्ती या सरकार को दोष देने से अच्छा है, गर्मी को दीजिए। गर्मी को बोलिए 40-44 के पार पारे को न लेकर जाया करे। हम जनता को 'प्रोब्लम' होने लगती है।

मेरे मानिए, उत्तर प्रदेश को गलत निगाह से देखने वाले चश्मे का नंबर बदल डालिए। ऐसा कुछ भी नहीं है, जैसा मेरे प्यारे उत्तर प्रदेश के बारे में कहा-बोला-लिखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश में केवल 'समाजवादी राज' है। एक दफा यहां बसकर तो देखो प्यारे- सब मालूम पड़ जाएगा।

मंगलवार, 3 जून 2014

मूर्खता की डिग्री

चित्र साभारः गूगल
मुझे मूर्खता में महारत हासिल है। मूर्खता से जुड़ी तमाम डिग्रियां हैं मेरे कने। मूर्ख मेरे 'आदर्श' हैं और मूर्खता मेरी 'प्रेरणा'। मूर्ख और मूर्खता के बीच मैं खुद को बेहद सहज महसूस करता हूं। न किसी उच्च विचार को अपने भीतर आने देता हूं न ही किसी विचारवान से नाता-रिश्ता रखता हूं। विचारवान के विचार को सहन करने की शक्ति मेरे दिमाग में नहीं है। मैं अपनी मूर्खताओं के साथ मस्त रहना ज्यादा पसंद करता हूं।

लोगों को ऐसा भ्रम है कि मूर्खें में अक्ल नहीं होती। मूर्ख सिवाय मूर्खता के कुछ नहीं कर सकते। पर मैं ऐसा नहीं मानता। चूंकि मैं खुद मूर्ख हूं इसीलिए मूर्खता की प्रत्येक अच्छाई-बुराई को बेहतर समझ सकता हूं।

बेफिक्री मूर्खें का पहला गुण है। जिस आदर्शवाद को बुद्धिजीवि लोग अपने सीने से लगाए-लगाए घुमते हैं, मूर्खें के लिए वो 'बेतुकावाद' है। अरे काहे का आदर्शवाद? जो आदर्शवाद बुद्धिजीवियों को हमेशा 'यथास्थितिवादी' बनाए रखे, उससे उचित दूरी बनाए रखना ही बेहतर। अब देखिए न, बुद्धिजीवि लोग स्मृति ईरानी की डिग्री के कैसे पीछे पड़े हुए हैं। रात-दिन बस डिग्री और डिग्री पर ही बहस छेड़े हुए हैं। डिग्री न हुई, पेट की गैस हो गई- खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। खुद जित्ते बुद्धिजीवियों कने डिग्रियां हैं, क्या वे सब के सब होशियार (काबिल) हैं! बताएं।

ज्यादा दूर क्यों जाते हो, मुझे ही देख लो न। मैं तो गर्व के साथ हर किसी से यही कहता हूं- मेरे कने मूर्खता की डिग्री है। लो अब कर लो, मेरी भी खिंचाई। लेकिन मैं बुरा नहीं मानूंगा। क्योंकि मैं जो हूं, सो हूं। मुझे मूर्खता के साथ जिंदगी को जीने में घणा आनंद आता है। मैं उन यथास्थितिवादी बुद्धिजीवियों की तरह नहीं हूं, जो बुद्धि से बाहर निकल कर दुनिया को न समझना चाहते हैं न देखना।

पिछली सरकार में एक से बढ़कर एक डिग्रीधारी मंत्री-नेता रहे, देख लीजिए, सरकार और देश को कित्ता 'काबिल' बना दिया? डिग्रीधारी अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री तक महंगाई पर काबू न पा सके और डिग्रीधारी शिक्षामंत्री ने देश के शिक्षा के स्तर को इत्ता ऊंचा, इत्ता ऊंचा उठा दिया कि अब ठीक से देखने में ही नहीं आ पाता।

अगर डिग्रियों के चक्कर में ही उलझे रहोगे तो न खुद चैन से जी पाओगे, न दूसरे को जीने दोगे। डिग्री के भ्रम से बाहर निकलकर प्रैक्टिल की दुनिया में कदम रखो प्यारे।

मुझे मेरी मूर्खता की डिग्री पर नाज है। सौ होशियारों के बीच एक मूर्ख भी तो होना चाहिए, जो भीड़ से थोड़ा अलग लगे-दिखे।

ध्यान रखियो, मूर्खें का फ्यूजर बुद्धिजीवियों (काबिलों) से अधिक ब्राइट है। जय हो।

रविवार, 1 जून 2014

मेरे कने डिग्री नहीं है

चित्र साभारः गूगल
मेरे मोहल्ले में एक मुझे छोड़कर सभी 'डिग्रिधारी' हैं। किसी के पास दो डिग्रियां हैं तो किसी के पास तीन या चार। सभी को अपनी डिग्रियों पर उत्ता ही नाज है, जित्ता अक्लमंद को अक्ल पर होता है। यही वजह है कि मोहल्ले के तमाम डिग्रिधारी मुझसे 'उचित दूरी' बनाकर रहते हैं। न मेरे घर आते हैं, न मुझे अपने घर बुलाते हैं। बीच राह कभी अगर आमना-सामना हो भी जाए, तो यों नजरें फेर लेते हैं मानो मुझसे जन्म-जन्मांतर की दुश्मनी हो। लेकिन मैं बुरा नहीं मानता। बुरा क्यों मानूं, जो चीज मेरे कने नहीं है, तो नहीं है। न ही मेरी कभी कोशिश रहेगी कि मैं डिग्री के चक्कर में पड़ूं।

हां, यह बात सही है कि मेरा शैक्षिक स्तर मोहल्ले के डिग्रिधारी बुद्धिजीवियों जित्ता 'ऊंचा' नहीं। हां, यह भी सही है कि मेरा उठना-बैठना 'लफंगों' के बीच ही ज्यादा है वनिस्पत 'काबिलों' के। बेशक मैं लेखक जरूर हूं किंतु लेखकों की तरह न रहता हूं न बोलता-चालता। दरअसल, दिखावटी और आत्ममुग्ध जिंदगी या रहन-सहन मुझे कतई पसंद नहीं। मैं जैसा अंदर से हूं, वैसा ही बाहर भी दिखना चाहता हूं। इसीलिए मैंने केवल उत्ती ही पढ़ाई की जित्ता मेरा दिमाग झेल पाया।

हालांकि परिवार वालो की तमन्ना मुझे टीचर या प्रोफेसर बनाने की ही थी लेकिन बना मैं लेखक। अमां, जो खुद ढंग से न पढ़ सका, वो बच्चों को क्या खाक पढ़ाएगा? मेरा दिमाग किताबी पढ़ाई से अधिक प्रैक्टिकल ज्ञान में ज्यादा लगा। क्योंकि दुनियादारी की तिकड़मों को समझने के लिए पढ़ाई की नहीं, प्रैक्टिकल होने की आवश्यकता ज्यादा है।

न न मैंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया कि मेरे कने डिग्री नहीं तो मैं बेहद पिछड़ा हुआ हूं। बल्कि मैं तो खुश होता हूं कि मैं डिग्रिधारी बुद्धिजीवियों के चंगुल से आजाद हूं। उनकी तरह न किंतु-परंतु में जीता हूं न ही हर वक्त इज्जत की फिक्र किया करता हूं। मेरी 'बेवकूफियां' ही मेरी डिग्री और मेरी पहचान हैं। आदमी समझदार डिग्री से नहीं, संवेदनशीलता से बनता है। और जिसके कने केवल डिग्री हो, संवेदनशीलता नहीं, उसका डिग्रीधारी होना बेकार है। बुद्धिजीवियों के बीच जित्ता बैठोगे, उत्ता ही दिमाग का कचरा करोगे।

इधर जो एक महिला सांसद की डिग्री को लेकर तमाम तरह के सवाल बुद्धिजीवि लोग उठा रहे हैं, उनसे मेरा बस यही कहना है कि डिग्री की योग्यता और दिमाग या परिश्रम की योग्यता में बहुत फर्क होता है मान्यवर। कभी-कभी बे-पढ़ा भी वो सबकुछ कर जाता है, जिसका ख्याल तक पढ़े-लिखे को कभी नहीं आता। दुनिया में जित्ते भी बड़े अविष्कार या प्रयोग हुए हैं, उनके जन्मदाता ज्यादातर 'बे-डिग्रीधारक' ही रहे हैं। डिग्री पढ़ाई-लिखाई का मानक तो हो सकती है किंतु व्यवहारिकता का नहीं।

डिग्री और डिप्लोमा पर बहस करने वाले जरा एक दफा देख तो लें अपने देश की शिक्षा का हाल। सैकड़ों की तादाद में बंदे बेरोजगार घुम रहे हैं। डिग्री पास होने के बाद भी रिक्शा ठेलने को मजबूर हैं। ऐसी डिग्री से भी क्या हासिल जो जीवन में 'डाउनफाल' ले आए।

डिग्री-डिप्लोमा पर बहस बेमानी है। जिनके कने डिग्रियां हैं, वे इतराए नहीं। और जिनके कने नहीं हैं, वे दुखी न हों मेरी तरह। डिग्री तो हाथ का मैल है प्यारे। किसान कने डिग्री नहीं होती मगर फिर भी वो फसल पैदा करके दिखाता है। अपनी मेहनत से देश के तमाम डिग्रीधारकों का पेट भरता है। फिर डिग्री पर इत्ता घमंड क्यों और किसलिए?

किसी को हो न हो किंतु मुझे खुद पर 'फर्क' है कि मेरे कने डिग्री नहीं।