बुधवार, 7 मई 2014

बे-कंट्रोल होती जुबान

चित्र साभारः गूगल
प्यारे, जब लड़कों से 'गलती' हो सकती है तो फिर नेताओं की जुबान क्यों नहीं 'बहक' सकती? बहक सकती है, बिल्कुल बहक सकती है। जुबान का काम ही बहकना है। राजनीति में रहकर नेता की जुबान न बहके, भला ऐसा कभी हुआ है। चुनावों के दौरान नेताओं की जुबान कुछ ज्यादा ही बहक जाती है। क्या करें, उन्हें अपनी जुबान पर 'कंट्रोल' ही नहीं होता। जोश-खरोश के चक्कर में सब गड़बड़ हो जाती है। गलती जुबान की होती है, नोटिस बेचारे नेताओं को थमा दिया जाता है।

केवल जुबान की खातिर नेताओं को नोटिस थमाना या उनसे जवाब-तलब करना मुझे समझ नहीं आता। बेचारे नेताओं को पांच साल में चुनाव के दौरान ही तो मौका मिलता है, जनता से रू-ब-रू होने का, अपनी कथित उपल्बधियों को गिनाने का, दूसरे दलों-नेताओं की टांग-खिंचाई करने का, ऐसे में अगर उनकी जुबान कहीं कुछ बहक भी जाती है, तो इसे हल्के में ही लेना चाहिए। जुबान के बहाने नेताओं पर ज्यादा 'आक्रमकता' ठीक नहीं। बदजुबानी नेताओं का शगल नहीं होती, वो तो बस जरा-सा जोश 'रायता' फैला देता है।
 
नेताओं की बहकी जुबान को सुनने का अलग ही 'आनंद' है। मगर गंभीर या बुद्धिजीवि किस्म के लोग इस आनंद को महसूस नहीं कर पाएंगे। अक्सर बहकी जुबान में वे इत्ता दिलचस्प और व्यंग्यात्मक कह-बोल जाते हैं, जिसे सुनकर अच्छा-खासा मनोरंजन हो जाता है। शब्दवाण चलाने में हमारे देश के नेताओं का जवाब नहीं। एक नेता दूसरे नेता को कुछ भी या कैसा भी बोल सकता है, इत्ती छूट वे ले ही लेते हैं। कभी शहजादा, कभी कुत्ते का पिल्ला, कभी बबर शेर, कभी सांड, कभी मौत का सौदागर, कभी मादारी, कभी ड्रामेबाज, कभी भगौड़ा आदि-आदि।

नेताओं की जुबान को सुनकर अक्सर यह महसूस होता है कि राजनीति में पढ़ा-लिखा होना कोई जरूर नहीं बस जुबान या दिमाग का तेज होना चाहिए। राजनीति खुद-ब-खुद सध जाएगी।

जुबान के मामले में कुछ नेता लोग तो ऐसे हैं, जिनकी जुबान को राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा जाना चाहिए। वे जब भी जुबान खोलते हैं (चाहे कम या ज्यादा), गारंटी है, बहकते जरूर हैं। ऊपर वाले ने उनकी जुबान में कुछ ऐसा 'यंत्र' लगा कर रखा है कि जुबान का बहकना तय ही है। उन नेताओं की हमें आदत भी कुछ ऐसी पड़ चुकी है कि उनकी 'बिन बहकी जुबान' अब अच्छी भी नहीं लगती। अपने राजनीतिक-विरोधियों को वे जिस जुबान में आड़े हाथों लेते हैं, उसका कहना ही क्या प्यारे।

देखिए, नेताओं कने एक जुबान ही है, जिसे हिलाकर वे विकास भी कर सकते हैं, जन-हित के समर्थन में खड़े भी हो सकते हैं, जनता से वोट भी मांग सकते हैं, जन समस्याओं का हल भी निकाल सकते हैं, विरोधियों को लताड़ भी सकते हैं। यानी, जुबान नेताओं का बायां हाथ है। केवल जुबान के सहारे ही इत्ते सारे कामों को कर पाना, यह हमारे देश के लोकतंत्र में ही संभव है। इस नाते हमें हमारे नेताओं की जुबान पर 'फक्र' होना चाहिए नाकि उन्हें 'गरियाना'।

दरअसल, नेताओं को गरियाकर हम अपनी ही जुबान खराब कर रहे होते हैं, उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

बेहतर यही है कि हम नेताओं की जुबान के प्रति अपनी सोच को खुला रखें। न खुद गंभीर हों, न बेवजह शिकायत करें। बेचारे नेताओं कने एक जुबान ही है, जो आड़े वक्त में उनके काम आती है। वरना तो सब राजनीति है प्यारे।

बस इत्ता ध्यान रखिए, राजनीति में नेताओं की जुबान 'बे-कंट्रोल' होती है। कंट्रोल हमें खुद पर ही करना होता है।

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